पिछले लेख में हमने जाना कि शक्कर के चक्कर में दुनिया किस तरह उलझती जा रही है। इस लेख में समझेंगे कि, इस चक्कर से निकलने के क्या उपाय हो सकते हैं?
दुनिया भर में बढ़ते चीनी के उपाभोग और उससे जुड़ी स्वास्थ्य समस्याओं (डायबिटीज, मोटापा और हृदय रोग) के कारण चीनी के उपभोग को कम करने के लिए विभिन्न उपाय किए जा रहे हैं।
इसी दिशा में कदम उठाते हुए, कई देशों में प्रोसेस्ड मीठे खाद्य पदार्थों में होने वाले चीनी के उपयोग पर टैक्स लगाया जाता है। जर्मनी में चीनी कर (sugar tax) एक बड़ा राजनैतिक मुद्दा बन चुका है। जर्मनी की सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ जर्मनी और अलायंस के राजनेताओं सहित अन्य समर्थकों ने तर्क दिया कि मीठे पेय पदार्थों पर टैक्स लगाने से चीनी का उपभोग कम किया जा सकता है, जिससे मोटापे और टाइप 2 डायबिटीज (T2D) को रोकने में मदद मिल सकती है। वहीं आलोचक इसे लेकर खाद्य उद्योग के लिए संभावित आर्थिक नुकसान के बारे में चेतावनी देते हैं।
जिन देशों में चीनी टैक्स लगाया गया है, वहां देखा गया है कि निर्माता अक्सर टैक्स की सीमाओं से नीचे रहने के लिए अपने उत्पादों में सुधार (reformulate) करते हैं। अतः कंपनियां मीठे पेय पदार्थों में स्वीटनर्स (मधुरक) या चीनी के विकल्पों का उपयोग बढ़ाते हुए चीनी की मात्रा को कम करती हैं। दशकों से इन शुगर फ्री यौगिकों को चीनी के स्वस्थ विकल्पों के रूप में बढ़ावा दिया गया है, खास तौर पर मोटापे या डायबिटीज से पीड़ित व्यक्तियों में।
वर्तमान में नॉन-न्यूट्रिटिव स्वीटनर्स (NNSs) और चीनी के अन्य विकल्पों की एक बड़ी श्रृंखला उपलब्ध है। जिन्हें पॉलीओल्स (polyols) के रूप में भी जाना जाता है।
NNSs: जैसे कि एस्पार्टेम, सुक्रालोज़, सैकरीन और एसेसल्फेम पोटैशियम, ये पदार्थ बहुत कम या बिना किसी कैलोरी के तीव्र मिठास प्रदान करते हैं। चीनी के अन्य विकल्प, जिसमें एरिथ्रिटोल, जाइलिटोल और सॉर्बिटोल शामिल हैं, यौगिक के आधार पर इनमें कम मात्रा में ऊर्जा (कैलोरी) होती है। इनमें से कुछ आंतों द्वारा आंशिक रूप से ही अवशोषित होते हैं, जबकि अन्य आंत के सूक्ष्म जीवों द्वारा किण्वित (fermented) हो जाते हैं। चीनी के इन सभी विकल्पों के तात्कालिक या अल्पकालिक स्वास्थ्य लाभ भली भांति सिद्ध किए जा चुके हैं। खास तौर पर डायबिटीज और मोटापे में। क्योंकि इनके सेवन से खून में शुगर का स्तर नहीं बढ़ता, साथ ही ये बहुत कम या न के बराबर कैलोरी प्रदान करते हैं।
भले ही इनके तात्कालिक लाभ अच्छी तरह से स्थापित हैं। फिर भी यदि इन यौगिकों का सेवन अधिक मात्रा में किया जाता है, तो ये शरीर में हानिकारक प्रभाव भी पैदा कर सकते हैं। अतः विभिन्न शोध इन नए स्वीटनर्स के लाभ की धारणाओं को चुनौती दे रहे है। मेटाबॉलिज्म पर, आंत के सूक्ष्म जीवों (gut microbiome) पर, और कार्डियोवस्कुलर स्वास्थ्य पर इनके संभावित दुष्प्रभावों की ओर भी ध्यान बढ़ रहा है।
नॉन-न्यूट्रिटिव स्वीटनर्स के तात्कालिक लाभ:
एपेटाइट (Appetite) में प्रकाशित एक अध्ययन में पाया गया कि स्टीविया ने, सुक्रोज की तुलना में, भोजन के बाद ग्लूकोज या इंसुलिन के स्तर को नहीं बढ़ाया। अन्य अध्ययनों के अनुसार भी नॉन-न्यूट्रिटिव स्वीटनर्स अल्पकालिक रूप से फायदेमंद हो सकते हैं। विशेष रूप से अधिक वजन वाले व्यक्तियों में।
नॉन-न्यूट्रिटिव स्वीटनर्स के दीर्घकालिक (Long Term) प्रभाव: इन स्वीटनर्स के दीर्घकालिक प्रभाव अभी तक अस्पष्ट है। द बीएमजे (The BMJ) में प्रकाशित एक समीक्षा (systematic review) ने निष्कर्ष निकाला कि, नॉन-न्यूट्रिटिव स्वीटनर्स के शुरुआत में मधुमेहियों और मोटे लोगों में लाभ दिखाई देते हैं। पर ये दीर्घकालिक रूप से शरीर के वजन या मेटाबॉलिज्म में स्थाई सुधार नहीं दर्शाते।
कई अन्य अध्ययनों (prospective cohort studies) में स्वीटनर के उपयोग और डायबिटीज, हृदय रोगों और मृत्यु दर के बढ़ते जोखिम के बीच संबंध पाया गया है । इन परिणामों के आधार पर शोधकर्ताओं ने आगाह किया कि ये ये स्वीटनर्स मेटाबॉलिक और जैविक क्रियाओं के बीच गंभीर प्रभाव डाल सकते हैं। यह प्रभाव मेटाबॉलिक डीकपलिंग (Metabolic decoupling) के रूप में हो सकते हैं। मेटाबॉलिक डीकपलिंग अंगों के सामान्य कार्य और उससे जुड़ी ऊर्जा खपत (मेटाबॉलिज्म) के बीच का तालमेल टूटना या असंतुलन होना है। मीठे स्वाद वाले खाद्य पदार्थ या पेय जिनमें कोई ऊर्जा स्रोत नहीं होता है, उनके उपयोग से शरीर के विभिन्न रेगुलेटरी तंत्र बाधित हो सकते हैं। और ये compensatory eating behaviors को बढ़ावा दे सकते हैं।
आंतों के माइक्रोबायोम पर प्रभाव (Microbiome Effects):
2014 में नेचर (Nature) में प्रकाशित एक अध्ययन में पाया गया कि कृत्रिम स्वीटनर्स का अत्यधिक उपयोग आंतों के माइक्रोबायोम्स में बदलाव के माध्यम से ग्लूकोज इनटोलरेंस (glucose intolerance) पैदा कर सकते हैं।
न्यूट्रिएंट्स (Nutrients) नामक पत्रिका में प्रकाशित कुछ अध्ययनों के अनुसार सैकरीन, सुक्रालोज़ और एस्पार्टेम के उपयोग से आंतों की बैक्टीरियल विविधता में बदलाव और अनियंत्रित मेटाबॉलिज्म, शॉर्ट-चेन फैटी एसिड का कम उत्पादन और प्रो-इंफ्लेमेटरी सिग्नलिंग पाथवेज का सक्रिय होना पाया गया है। हालांकि इन निष्कर्षों के नैदानिक (clinical) महत्व पर अभी और जांच की आवश्यकता है।
एरिथ्रिटोल, जिसे लंबे समय से मेटाबोलिकली निष्क्रिय और अपेक्षाकृत हानिरहित माना जाता था, नेचर मेडिसिन (Nature Medicine) में प्रकाशित एक अध्ययन में पाया गया है कि उच्च प्लाज्मा एरिथ्रिटोल स्तर कुछ खास कार्डियो वैस्कुलर घटनाओं के बढ़ते जोखिम से जुड़ा हुआ है।
यह प्लेटलेट एक्टिवेशन में वृद्धि और थ्रोम्बोसिस (रक्त का थक्का जमना) के बढ़ते जोखिम से संबंधित है।
अध्ययनों में पाया गया है कि जाइलिटोल भी इसी तरह के प्रभाव पैदा कर सकता है, हालांकि उपलब्ध डेटा अभी सीमित है।
स्वीटनर्स की तुलना
एस्पार्टेम: यह सबसे व्यापक रूप से अध्ययन किए गए NNSs में से एक है। पब्लिक लाइब्रेरी ऑफ साइंस मेडिसिन (PLOS Medicine) में प्रकाशित शोध के अनुसार इसका कैंसर होने के साथ संबंध नहीं पाया गया है। जबकि WHO की कैंसर रिसर्च एजेंसी (IARC ) ने अपने शोध में एस्पार्टेम को संभावित कार्सिनोजेनिक रसायन की श्रेणी में रखा है। जिसका आधार लिवर कैंसर एवं एस्पार्टेम के बारे में प्रकाशित कुछ रिपोर्ट्स से है। हालांकि, संभावित मेटाबॉलिक और माइक्रोबायोम प्रभावों पर अभी और शोध की जरूरत है।
सुक्रालोज़ और सैकरीन: शोधों के अनुसार इनका आंतों के सूक्ष्म जीवों पर दुष्प्रभाव पाया गया है। एसेसल्फेम पोटैशियम मेटाबॉलिज्म पर असर कर सकता है।
स्टीविओल ग्लाइकोसाइड्स (स्टीविया): कई अध्ययनों में ग्लूकोज होमियोस्टैसिस और ब्लड प्रेशर पर स्टीविया के हल्के लाभकारी प्रभाव देखे गए हैं। साथ ही इसकी अधिक अनुकूल मेटाबॉलिक प्रोफाइल भी पाई गई है। कुछ शोध अन्य स्वीटनर्स की तुलना में माइक्रोबायोम पर कम प्रभाव का भी सुझाव देते हैं। हालांकि, ठोस दीर्घकालिक डेटा की कमी है, अतः अभी भी यह शोध के दायरे में बना हुआ है।
आहार संबंधी विकल्प: वर्तमान में, किसी भी स्वीटनर या चीनी के विकल्प को पूरी तरह से जोखिम-मुक्त नहीं माना जा सकता है। जबकि कई शोध प्राकृतिक मिठास वाले खाद्य पदार्थों, विशेष रूप से फलों के सेवन का समर्थन करते हैं। विभिन्न अध्ययनों ने फलों के नियमित सेवन को डायबिटीज के खतरे को कम करने वाला माना है। द बीएमजे (The BMJ) में शोधकर्ताओं की एक रिपोर्ट में पाया है कि बेरीज, सेब और अंगूर का डायबिटीज पर सुरक्षात्मक प्रभाव होता है, जबकि फलों के रस यह प्रभाव नहीं दिखाते हैं। शोधकर्ताओं ने इनमें से कुछ लाभों का श्रेय फूड मैट्रिक्स (food matrix) को दिया है, जैसे कि डाइटरी फाइबर, पॉली फीनोल्स और सूक्ष्म पोषक तत्व, जो ग्लूकोज के अवशोषण को नियंत्रित कर सकते हैं। माइक्रोबायोम के लिए लाभकारी हैं। ताजे और साबुत फल भोजन के बाद ग्लूकोज के स्तर में होने वाली तेज वृद्धि (spikes) को कम कर सकते हैं।
चीनी के उपयोग को कम करने के लिए एक अन्य रणनीति में चीनी की लालसा (sugar cravings) को धीरे-धीरे कम करना शामिल है। अमेरिकन जर्नल ऑफ क्लिनिकल न्यूट्रिशन (American Journal of Clinical Nutrition) में प्रकाशित शोध से पता चलता है, कि स्वाद की सीमाएं (taste thresholds) कुछ ही हफ्तों में अनुकूलित हो सकती हैं। इसके विपरीत, शहद या एगेव सिरप जैसे विकल्पों में ग्लूकोज और फ्रुक्टोज अत्याधिक मात्रा में पाया जाता है, अतः इनकी प्राकृतिक और सकारात्मक छवि के बावजूद कोई महत्वपूर्ण मेटाबॉलिक लाभ नहीं देते।
स्वीटनर्स का उपयोग केवल एक अस्थायी उपाय के रूप में करें। अल्पावधि में, वे चीनी और कैलोरी की मात्रा को कम करने में मदद कर सकते हैं। परन्तु, ये दीर्घकालिक रूप से संतुलित आहार का स्थान नहीं सकते।
चीनी की लालसा में कमी करना: कम चीनी खाने से व्यक्ति के स्वाद की आदत अनुकूलित होने लगती है और मीठा कम खाने की प्रवृत्ति बढ़ने लगती है।
प्राकृतिक खाद्य पदार्थ चुनें: साबुत फल अन्य स्वीटनर्स की तुलना में मेटाबॉलिज्म के लिए अधिक फायदेमंद होते हैं, क्योंकि उनमें फाइबर और फाइटोकेमिकल्स होते हैं।
यदि स्वीटनर का उपयोग कर रहे हैं, तो स्टीविया पसंदीदा विकल्प प्रतीत होता है, वर्तमान निष्कर्ष बताते हैं कि स्टीविया का मेटाबॉलिक प्रोफाइल सबसे अनुकूल है, हालांकि ठोस दीर्घकालिक डेटा की अभी भी कमी है। इसलिए संयम पूर्वक उपयोग करें।
उपरोक्त शोधों और तथ्यों के अनुसार हमने जाना कि शक्कर के चक्कर से बचने के लिए सबसे अच्छा उपाय मीठे की लालसा कम करते जाना एवं साबुत फलों से मिठास की इच्छा पूरी करना है वह भी संयम के साथ। अन्य कोई भी विकल्प पूरी तरह सुरक्षित नहीं हैं।
