ज़मीन पर मौजूद सभी प्राणियों के क्रमिक विकास में भोजन की कमी एक बड़ी ताकत रहा है। दुनियाँ में कई जानवर साल के उन दिनों में जब भोजन नहीं मिल पाता, हाइबरनेशन (सुप्तावस्था) में चले जाते हैं और वातावरण के अनुकूल होने पर फिर सक्रिय हो जाते हैं।
मानव प्रजाति को भी प्राचीनकाल में बार-बार अकाल का सामना करना पड़ता था। वे व्यक्ति जो अकाल की अवस्था में भूख एवं भोजन की कमी को बर्दाश्त कर जाते थे वे ही जी पाते थे। इस तरह हम देखते हैं कि क्रमिक विकास के दौरान हमने भूखे रहना व भोजन की कमी के दिनों में जीना सीख लिया है। हमारा मेटाबॉलिज्म क्रमिक विकास में इस तरह विकसित हो गया है कि हम कई दिनों की भोजन की कमी को सह सकते हैं।
आधुनिक समय में अकाल नहीं पड़ते एवं भोजन प्रचुर मात्रा में उपलब्ध रहता है और हम इसे प्रचुर मात्रा में खाते रहते हैं। खाने की यही प्रचुरता और व्यायाम की कमी ही आज मधुमेह जैसे अनेक रोगों का मूल कारण है।
दुनियाँ के सभी धर्मों में किसी-न-किसी प्रकार का उपवास/रोज़ा रखने की परम्परा है। शायद यह परम्परा हमें अकाल के उन बुरे दिनों की याद दिलाने के लिये एवं हमारे मेटाबॉलिज्म को भोजन की कमी से अभ्यस्त रखने की एक व्यवस्था है। उपवास अनेक प्रकार के हो सकते हैं। कई धर्मों में उपवास के दौरान विशेष प्रकार के खाद्य पदार्थ खाने की छूट होती है। अक्सर देखा जाता है कि यह सभी खाद्य पदार्थ गरिष्ठ होते हैं, और उपवास के दिन अन्य दिनों की अपेक्षा ज्यादा कैलोरी खा ली जाती हैं।
रमज़ान के पवित्र माह में रोज़ा रखना मुसलमानों का फर्ज़ माना जाता है, परंतु इस्लाम में कुछ परिस्थितियों में रोज़ा न रखने की छूट दी गई है। रोज़े में सुबह सूरज निकलने से शाम को सूरज डूबने तक खाना-पीना झूठ बोलना किसी को बुरा-भला कहना, किसी भी तरह का गुनाह करना वर्जित है। इस्लाम के अनुसार रमज़ान का महीना एक तरह से वह ट्रेनिंग है जो हमें सिखाती है कि आने वाले ग्यारह महीने कैसे गुज़ारने हैं। रोज़े के पीछे एक मक़सद यह भी है कि जब हम भूखे-प्यासे रहेंगे तभी हमें किसी गरीब, मज़दूर, बेरोज़गार, परेशान हाल इन्सान की भूख व प्यास का एहसास होगा और फिर हमारे दिल में उसकी मदद करने का जज़्बा पैदा होगा। यही कारण है कि इस्लाम में यह व्यवस्था की गई है कि यदि किन्हीं हालात में मुसलमान रोज़ा नहीं रख पाता, तब कुछ गरीब, ज़रूरतमंदों को खाना खिलाकर उसका खामियाज़ा दिया जा सकता है।
डॉक्टर की उलझन:
हमारे देश में लगभग सोलह करोड़ मुसलमान हैं। एक अनुमान के हिसाब से इनमें से पचपन लाख मुसलमान मधुमेह रोगी हैं। रमज़ान के दौरान यह सभी मुसलमान दिल से रोज़ा रखना चाहते हैं। इलाज करने वाले डॉक्टर के लिये यह बड़ी उलझन की बात हो जाती है कि क्या वह मधुमेह रोगी मुसलमान मरीज़ों को रोज़ा रखने दें?
- क्या रोज़ा रखना उनके लिये स्वास्थ्य की दृष्टि से सुरक्षित है?
- डॉक्टर मरीज़ की कैसे सहायता कर सकता है?
- क्या मरीज़ घर पर अपनी बीमारी की उचित देखभाल कर सकते हैं?
- क्या रोज़ा रखने से उनकी सेहत पर कोई फायदा या नुकसान हो सकता है?
- रोज़ा रखना इस्लाम में एक फर्ज़ माना गया है परंतु यह भी कहा गया है कि वह मुसलमान जो बीमार है या जिसकी बीमारी रोज़े से बढ़ सकती है उसे रोज़ा नहीं रखना चाहिये या रोज़ा तोड़ देना चाहिये।
इसी संदर्भ में मुस्लिम धार्मिक ग्रंथ (हदीस) के अनुसार मक्का में जब मोहम्मद साहब ने मुसलमानों से कहा कि अल्लाह का आदेश है कि तुम्हें रोज़ा रखना है, उनके ये शब्द सुनते ही उसी समय सबने रोज़ा रख लिया। यहाँ तक कि माताओं ने बच्चों को दूध नहीं पिलाया। सूरज ढलने के बाद जब सबने रोज़ा खोला तो मोहम्मद साहब को पता चला कि दुधमुँहे बच्चों को दूध नहीं पिलाया गया, तो वे बहुत नाराज़ हुये और उन्होंने बताया कि रोज़ा फर्ज़ है मगर सभी पर नहीं।
इस्लाम में नीचे लिखी परिस्थितियों में रोज़ा न रखने की छूट दी जाती है :-
- शारीरिक या मानसिक रूप से दुर्बल या बीमार व्यक्ति
- सफर कर रहे मुसाफिर
- वे महिलायें जिनका मासिक धर्म चल रहा है
- गर्भवती महिलायें
- बच्चे को दूध पिलाने वाली मातायें
- अवयस्क बच्चे कुरआन में लिखा है — ‘‘अल्लाह ने अपने बंदों को सभी सहूलियतें मुहैया कराई हैं, वह उन्हें कतई मुसीबत में नहीं डालता।’’
इसी संदर्भ में बीमार व्यक्तियों को खासकर उन्हें जिनकी बीमारी रोज़े से बढ़ सकती है, रोज़े से छूट के हकदार हैं। मधुमेह मरीज़ों को इसी श्रेणी में रखा जा सकता है। जो मधुमेह मरीज़ मधुमेह के विकारों से ग्रस्त हैं, जो इंसुलिन ले रहे हैं, जिन्हें मधुमेह के साथ दिल या गुर्दे की बीमारी भी हो गई है उन्हें अपने डॉक्टर से सलाह कर, उचित जाँचें करवाकर व पूरी सावधानी से ही रोज़ा रखना चाहिये। यहाँ डॉक्टर पर बड़ी ज़िम्मेदारी आ जाती है कि वह मरीज़ को रोज़ा रखने की अनुमति दे या नहीं। यहाँ हम यह भी सलाह देंगे कि हो सके तो मधुमेह मरीज़ रमज़ान के महीने से पहले शाबान के महीने में रोज़े की ट्रायल करके देख लें।
मेडिकल दृष्टि से निम्न परिस्थितियों में रोज़ा नहीं रखना चाहिये:-
- टाईप-1 डायबिटीज़ के मरीज़, खासकर यदि उनकी शुगर कंट्रोल नहीं है।
- टाईप-2 डायबिटीज़ के मरीज़ जो इंसुलिन पर हैं या शुगर कंट्रोल बहुत खराब हो।
- मधुमेह मरीज जिन्हें दिल, गुर्दे, फेफड़े या दिमाग की बीमारी हो।
- गुर्दे या मूत्रमार्ग में पथरी हो।
- जल्दी-जल्दी हायपोग्लाईसीमिया (लो शुगर) हो जाती हो।
- यदि मरीज़ को रमज़ान के पहले तीन महीने में लो शुगर से कोमा हुआ हो।
- वे मरीज़ जो हायपोग्लाईसीमिया (लो शुगर) के लक्षण पहचानने में असमर्थ हों।
- जिन्हें हाल में ही रोज़े में लो शुगर हुई हो।
- वे मरीज़ जो उपचार ठीक से नहीं करते हों।
- गर्भवती मातायें।
- अवयस्क बच्चे।
- बूढ़े व्यक्ति ख़ासकर जो अकेले रहते हों। उपयोगी सलाह :
- अपने डॉक्टर से पूछ कर ही रोज़ा रखें।
- डॉक्टर से पूछ कर दवा व परहेज़ की पूरी जानकारी लें।
- यदि आप इंसुलिन ले रहे हैं तो सुबह की जगह शाम वाला डोज़ ज़्यादा व सुबह वाला कम लें।
- इसी प्रकार खाने की दवाइयाँ भी आपके डॉक्टर सुबह-शाम में उलट कर दे सकते हैं।
- रोज़ा शुरू होने से पहले अच्छी मात्रा में पानी व तरल पदार्थ लें। ख़ासकर गर्मी में पानी की कमी हो सकती है। डॉक्टर आपकी पेशाब बढ़ाने की दवाईयाँ रोज़े के दौरान बंद कर सकते हैं।
- डॉक्टर से लो शुगर, कीटोएसिडोसिस व शरीर में पानी की कमी के लक्षणों के बारे में जानकारी लें।
- सुबह की सैर की जगह रात को सैर करें।
- चक्कर आने, धुँधला दिखने, ठण्डा पसीना आने या डबल दिखने पर तुरंत ग्लूकोमीटर पर शुगर चेक करें। यदि यह 70 से नीचे है तो रोज़ा तोड़ दें। मीठा, फलों का रस व ग्लूकोज़ का पानी लें।
- यदि मुँह सूख रहा है, साँस तेज़ चल रही है और बार-बार पेशाब आ रही हो तो पेशाब में कीटोन चेक करें। यदि कीटोन पॉज़िटिव है तो रोज़ा तोड़ना बेहतर है और तुरंत डॉक्टर के पास जायें। क्या रोज़े से मधुमेह में फायदा होगा?
जी हाँ, यदि आपका मधुमेह अच्छा कंट्रोल में है तो रोज़ा आपके लिये फायदेमंद हो सकता है। यदि सेहरी व इफ्तार में परहेज़ बरता जाये तो मोटे मरीज़ रोज़ों में 4-5 किलो वज़न घटा लेते हैं। कोलेस्ट्रॉल व बी.पी. भी घट सकता है। परंतु यदि मधुमेह कंट्रोल अच्छा नहीं है व मधुमेह के कारण दिल व गुर्दों पर असर आ चुका है तो अच्छा होगा कि आप रोज़ा न रखें।
रोज़े के दौरान ग्लूकोमीटर से खून में शुगर देखने से रोज़ा नहीं टूटता। यह बात कई इस्लामिक देशों की मधुमेह एसोसिएशन कहती हैं। कुछ मधुमेह एसोसिएशन तो इंसुलिन का इंजेक्शन लगाने को भी रोज़े का उल्लंघन नहीं मानतीं।
अंत में हम यही कहेंगे कि अधिकांश मधुमेह रोगी सुरक्षित रूप से रोज़ा रख कर पुण्य कमा सकते हैं। ज़रूरत सावधानी की है और यह भी ज़रूरी है कि ज़्यादा बीमार व शुगर का कंट्रोल अच्छा न होने पर रोज़ा न रखने की छूट इस्लाम आपको देता है।*
