डायबिटीज के विभिन्न विकारों से बचने के लिए खून में ग्लूकोज की मात्रा को नियंत्रण में रखना बहुत जरूरी है। इसीलिए डॉक्टर अपने मरीजों को बार बार शुगर नियंत्रण के लिए सलाह एवं प्रोत्साहन देते रहते हैं। अतः ग्लूकोज के बेहतर नियंत्रण के लिए निम्नांकित तथ्यों को जानना बहुत जरूरी है…
- आपके खून में ग्लूकोज का स्तर भिन्न भिन्न समय पर कैसा चल रहा है?
- आपके खान पान, और दैनिक गतिविधियों का आपके खून में ग्लूकोज के स्तर पर क्या प्रभाव पड़ रहा है?
- दवाइयों का असर कैसा हो रहा है?
- कौन कौन से जाँचें कराई जाएं?
डॉक्टर लगभग 30 वर्ष पहले मरीज के यूरिन में ग्लूकोज की मात्रा की जाँच किया करते थे। इससे डॉक्टर यह अनुमान लगाते थे कि पिछले कुछ घंटों में मरीज के खून में ग्लूकोज का क्या स्तर रहा होगा। परन्तु जल्द ही यह समझ में आ गया कि इस तरीके से हम सिर्फ अनुमान ही लगा सकते हैं, एवं समय समय पर खून में ग्लूकोज के उतार चढ़ाव को पेशाब में जाँच करके नहीं परखा जा सकता। साथ ही यूरिन में ग्लूकोज की जाँच से हाइपोग्लाइसीमिया (खून में ग्लूकोज का बहुत कम हो जाना) को भी नहीं जाना जा सकता। डायबिटीज की वजह से गुर्दे खराब होने लगते हैं, तब खून में शुगर की मात्रा बहुत अधिक होने पर भी पेशाब में शुगर नहीं आती। साथ ही मधुमेह के उपचार के लिए आईं कुछ दवाइयाँ जिन्हें SGLT 2 इन्हिबिटर कहते हैं, पेशाब में ग्लूकोज का निकास बढ़ा देती है। ऐसी स्थिति में इन दवाओं को लेने वाले मरीजों की पेशाब में ग्लूकोज अत्यधिक बढ़ी हुई होती है। चाहे खून में ग्लूकोज की मात्रा कम ही क्यों न हो। यही कारण है कि अब डॉक्टर मरीजों को पेशाब में ग्लूकोज/शुगर की जाँच करने की सलाह नहीं देते।
खून में ग्लूकोज की मात्रा एवं नियंत्रण की स्थिति जानने का एक और बहुत अच्छा टेस्ट HbA1C है। यह टेस्ट खून में पिछले 3 माह के ग्लूकोज के स्तर का औसत बताता है। अनेक शोधों में पाया गया है कि इसका सीधा संबंध मधुमेह से होने वाले विकारों से है। अर्थात HbA1C जितना ज्यादा होगा विकार होने का खतरा उतना ही ज्यादा होगा। अधिकांश डॉक्टर मरीजों को तीन से छह महीने में यह टेस्ट करने की सलाह देते हैं, और इसके अनुसार उपचार में फेर बदल करते हैं। प्रायः देखा गया है कि मरीज खून में ग्लूकोज का टेस्ट कराने के एक दो दिन पहले परहेज, नियमित दवाई आदि लेकर अच्छी रिपोर्ट आने से खुश हो जाते है, परन्तु जब HbA1C करवाया जाता है तब उनकी पोल खुल जाती है। क्योंकि बढ़ा हुआ HbA1C यह बता देता है कि पिछले तीन माह में ग्लूकोज नियंत्रण कितना खराब चल रहा था। HbA1C टेस्ट की भी कुछ सीमाएं हैं,
जैसे.. यदि खून में ग्लूकोज की मात्रा कभी बहुत कम रही हो या कभी बहुत अधिक तो भी तीन माह का औसत सामान्य के लगभग आ सकता है। परन्तु ऐसा उतर चढ़ाव वाला ग्लूकोज स्तर मरीज के लिए घातक हो सकता है। दूसरा इस टेस्ट के द्वारा दिनभर के अंदर होने वाले ग्लूकोज स्तर में उतार चढ़ाव का पता ही नहीं लगाया जा सकता। न ही इस टेस्ट द्वारा हाइपोग्लाइसीमिया को जाना जा सकता है। यह टेस्ट थोड़ा महँगा भी है। इस टेस्ट को मरीज दिन में कभी भी करवा सकते हैं। इसे करवाते समय खाली पेट या भरे पेट होने से कोई फर्क नहीं पड़ता।
ग्लूकोमीटर (SMBG): आजकल ग्लूकोमीटर काफी सस्ते एवं सटीक परिणाम देने वाले वाले उपकरण हैं, जिनसे मरीज स्वयं अपने खून में ग्लूकोज की मात्रा दिन में किसी भी समय घर बैठे देख सकता है। सही तकनीक से इसका उपयोग कर हम दिन के अलग अलग समय खून में ग्लूकोज की मात्रा की सही जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। परन्तु प्रायः देखा गया है कि मरीज सुबह खाली पेट की शुगर की जाँच कर संतुष्ट हो जाते हैं। इससे रात्रि में होने वाले ब्लड ग्लूकोज के स्तर में होने वाले उतर चढ़ाव को भी नहीं पकड़ा जा सकता, जबकि अक्सर हाइपोग्लाइसीमिया रात को 2 बजे से सुबह 6 बजे के बीच होने का खतरा सबसे ज्यादा होता है। कई ग्लूकोमीटरों की जाँच स्ट्रिप 10 रुपए से 30 रुपए तक आती है, इसलिए भी मरीज बार बार टेस्ट करने से बचते हैं। ग्लूकोमीटर द्वारा टेस्ट करने में स्वयं की उंगली में सुई चुभती होती है, जिससे होने वाल दर्द इस टेस्ट को न करने का कारण बन जाता है।
विज्ञान की प्रगति के साथ अब यह संभव है कि डायबिटीज के मरीज लगातार 15 दिन का खून में ग्लूकोज के स्तर का ग्राफ प्राप्त कर सकते हैं। इस प्रकार के उपकरण को सी .जी. एम. एस. (CGMS, कंटीन्यूअस ग्लूकोज मॉनिटरिंग सिस्टम) कहते हैं।
यह यंत्र हर पाँच से दस मिनट में ग्लूकोज की मात्रा को मापता है व अपनी मेमोरी में रिकॉर्ड कर लेता है। मरीज एक एप द्वारा अपने मोबाइल फोन पर ग्लूकोज की मात्रा को कभी भी देख सकता है। यही नहीं वह अपने पिछले दिनों के प्रतिदिन का ग्लूकोज का ग्राफ भी इसी ऐप में देख सकता है। यही जानकारी मरीज के डॉक्टर के पास इंटरनेट द्वारा भी पहुँचती रहती है।
इस रिकॉर्ड में हम हर दिन का ग्राफ अलग अलग भी देख सकते हैं, एवम् पाँच, दस या पंद्रह दिन का मिला जुला पैटर्न भी देख सकते हैं। इस उपकरण के खास फायदे निम्नानुसार हैं…
- मरीज द्वारा क्या व कितना खाने से शुगर कितना बढ़ता है? मरीज उसकी जानकारी स्वयं प्राप्त कर सकता है।
- मरीज द्वारा किए जाने वाले व्यायाम, एवं अन्य शारीरिक गतिविधियों द्वारा होने वाले ग्लूकोज स्तर के प्रभाव को भी सटीकता से जाना जा सकता है।
- इससे रात में सोते समय आपके खून में ग्लूकोज के स्तर में होने वाले उतार चढ़ाव, एवं हाइपोग्लाइसीमिया जैसी स्थितियों को भी सटीकता से जाना जा सकता है।
- ग्राफ की सहायता से डॉक्टर इंसुलिन की मात्रा, प्रकार एवं समय को ज्यादा सटीक तरह से निर्धारित कर सकते हैं।
- इससे मरीज की दवाइयाँ, खान पान, एवं व्यायाम आदि को सटीक रूप निर्धारित करने में बहुत सहायता मिलती है।
इस उपकरण में दस रुपए के सिक्के के बराबर एक सेंसर जिसके मध्य में एक बारीक सुई होती है, इस सुई को त्वचा में अंदर लगाकर सेंसर को चिपका दिया जाता है। इसको लगाकर मरीज सारे दैनिक कार्य बिना किसी परेशानी के कर सकता है, यहाँ तक कि मरीज नहा सकता है एवं तैराकी भी कर सकता सकता है। डॉक्टर एवं मरीज एक एप द्वारा अपने मोबाइल फोन या कंप्यूटर पर सेंसर द्वारा भेजा गया डाटा समय समय पर देख सकते हैं। साथ ही यह डाटा सेंसर एवं मोबाइल फोन की मेमोरी में भी स्टोर होता है।
इस उपकरण को 15 दिन तक लगाने की कीमत लगभग 3000 से 5000 रुपए तक आती है। 15 दिन में यह उपकरण 1344 बार ग्लूकोज टेस्ट करता है एवं इसके परिणाम अपने मेमोरी में स्टोर करता है। इस उपकरण का प्रचलन विदेशों में बहुत तेजी से बढ़ रहा है और सौभाग्य से यह हमारे देश में भी उपलब्ध है। इस उपकरण का अपग्रेडेड वर्जन ग्लूकोज की मात्रा कम होने (हाइपोग्लाइसीमिया) का अलार्म भी देता है।
सी .जी. एम. एस. (CGMS) उपकरण आपके मधुमेह के बेहतर नियंत्रण में बहुत सहायक है। अपने चिकित्सक से सलाह लेकर हर मधुमेही को इस उपकरण का उपयोग अवश्य करना चाहिए। खासकर वे मरीज जो इंसुलिन ले रहे हैं, या जिनके खून में ग्लूकोज के स्तर में बहुत अधिक उतार चढ़ाव आने की समस्या है। उनके लिए यह उपकरण विशेष रूप से बहुत उपयोगी है। गर्भवती महिलाएं जिन्हें डायबिटीज है उनके ग्लूकोज का नियंत्रण बहुत अच्छा होना चाहिए, ऐसी महिलाओं में भी यह उपकरण बहुत उपयोगी है।
