सारे विश्व में मधुमेह एक तेजी से बढ़ती हुई बीमारी बन चुकी है। हमारे देश में भी यह समस्या अती विकट है। विभिन्न संस्थानों द्वारा किए गए अध्ययनों के आधार पर भारत में मधुमेहियों का प्रतिशत विश्व के अन्य देशों से कहीं अधिक है। इसीलिए भारत को विश्व का डायबिटीज कैपिटल भी कहा जाता है। दुनिया के कुल मधुमेहियों के लगभग 17 प्रतिशत केवल भारत में ही हैं।
मधुमेह के मुख्य रूप से 5 प्रकार होते हैं।
1. टाइप 1 डायबिटीज
2. टाइप 2 डायबिटीज
3. GDM
4. लाडा (LADA)
5. मोडी (MODY)
1. टाइप 1 डायबिटीज : यह मुख्यतः बच्चों में होने वाली डायबिटीज है, जिसमें पैंक्रियाज में पाई जाने वाली बीटा सेल्स इंसुलिन निर्मित नहीं कर पाती, या नष्ट हो जाती हैं। अतः इस तरह के मधुमेहियों में इंसुलिन का पूर्णतः अभाव होता है। और ये मरीज इंसुलिन इंजेक्शन पर निर्भर रहते हैं।
2. टाइप 2 डायबिटीज : इस प्रकार की मधुमेह में मरीज के शरीर में इंसुलिन कम बनता है, साथ ही इंसुलिन की कार्यक्षमता कम होने लगती है। जिससे खून में ग्लूकोज का स्तर सामान्य से अधिक रहने लगता है।
3. GDM : इसे जेस्टेशनल डायबिटीज मेलिटस के नाम से जाना जाता है। यह महिलाओं में गर्भावस्था के दौरान रक्त शर्करा बढ़ने के लक्षण के तौर पर देखा जाता है। यह बच्चे के जन्म के बाद ठीक हो जाता है। परन्तु अक्सर यह देखा गया है कि जीडीएम से पीड़िती महिलाओं में से अधिकांश को बाद में टाइप 2 मधुमेह हो जाता है।
4. लाडा (LADA): इसे आजकल टाइप 1.5 मधुमेह भी कहते हैं, इसे टाइप 1 और टाइप 2 मधुमेह के बीच का एक प्रकार माना जाता है। यह टाइप 1 मधुमेह की तरह ऑटोइम्यून प्रभाव के कारण उत्पन्न होती है, जो खासकर युवा एवं वयस्क लोगों को होती है । यह धीरे-धीरे टाइप 2 मधुमेह की तरह विकसित होता है, लेकिन समय के साथ इंसुलिन की आवश्यकता होती है। यह अंततः टाइप 1 मधुमेह ही हो जाता है।
5. मोडी (MODY): (Maturity-Onset Diabetes of the Young) एक दुर्लभ, वंशानुगत प्रकार का मधुमेह है जो अक्सर किशोरों या युवाओं में शुरू होता है। यह जीन में म्यूटेशन के कारण होता है, जिससे बीटा सेल्स विकृत हो जाती हैं। इंसुलिन ठीक से नहीं बन पाता या खराब गुणवत्ता का इंसुलिन बनता है।
सभी तरह के मधुमेह के सामान्य लक्षण जैसे बार बार भूख, प्यास एवं पेशाब लगना, कमजोरी, थकान, वजन कम होना, DKA आदि तो परेशान करने वाले हैं हीं, साथ ही अगर मधुमेह को नियंत्रित नहीं रखा गया तो यह गंभीर और घातक बीमारियों का कारण बन सकती है। जैसे ब्लड प्रेशर, हार्ट अटैक, लकवा, आँखें खराब होना, किडनी खराब होना, बार बार इन्फेक्शन होना एवं उसका ठीक न होना, डायबिटिक कोमा, एवं कैंसर आदि।
मधुमेह को ठीक तो नहीं किया जा सकता परन्तु इसको नियंत्रित जरूर किया जा सकता है। मधुमेह को नियंत्रित रखकर मरीज सामान्य एवं सुरक्षित जीवनयापन कर सकता है। आधुनिक चिकित्सकीय विकास के कारण मधुमेह की विशेष जांचें, नियंत्रण के लिए उपकरण एवं विशिष्ट दवाएं तथा इंसुलिन उपलब्ध हैं, जिससे ब्लड ग्लूकोज नियंत्रित रखना पहले की अपेक्षा काफी आसान हो गया है।
कुछ प्रारंभिक टाइप 2 मधुमेहियों को छोड़कर अन्य सभी प्रकार के मधुमेहियों को इंसुलिन इंजेक्शन की आवश्यकता होती है। यदि टाइप 2 मधुमेह के मरीज भी इंसुलिन इंजेक्शन लेना स्वीकार करते हैं तो यह उनके लिए टेबलेट लेने से ज्यादा सुरक्षित और लाभकारी होता है। अतः यहां पर हम इंसुलिन से जुड़ी खास जानकारियों पर चर्चा करेंगे।
इंसुलिन इंजेक्शन के प्रकार :
शॉर्ट एक्टिंग इंसुलिन इंजेक्शन:
इस प्रकार के इंसुलिन शरीर में कम समय के लिए काम करते हैं, अतः इनको मुख्य भोजन के ठीक पहले लेना होता है।
लॉन्ग एक्टिंग इंसुलिन इंजेक्शन:
इस प्रकार के इंसुलिन इंजेक्शन लेने पर शरीर में धीरे धीरे काम करते हैं, एवं लगभग 24 घंटे तक काम कर सकते हैं।
प्रीमिक्स इंसुलिन इंजेक्शन:
इस तरह के इंजेक्शन में उपरोक्त दोनों प्रकार के इंसुलिन का मिश्रण होता है।
मधुमेह को एक जीवन शैली से जुड़ी बीमारी के रूप में पहचाना जाता। इसे नियंत्रित रखने में संयमित जीवनशैली की भी प्रमुख भूमिका होती है। जैसे नियमित व्यायाम, संतुलित आहार, एवं नियमित दवाइयां लेना आदि।
मधुमेह नियंत्रण आसान है, यह मरीज के हाथ में ही है। उसे केवल चिकित्सक के द्वारा समझाई गई जीवन शैली अपनाना और नियमित दवाइयां लेना होता है। परन्तु अक्सर देखा गया है कि बड़ी संख्या में मरीज लापरवाही बरतते हैं, मनमानी करते हैं, या चिकित्सक की सलाह को ठीक से नहीं समझते हैं। जिससे वे मधुमेह जनित घातक विकारों से पीड़ित हो जाते हैं। अंत में इसका दोष चिकित्सक और इलाज पर थोप देते हैं।
अतः जीवन शैली में लापरवाही से हुई बीमारी के इलाज में भी ऐसे लोग लापरवाही वाला रवैया ही रखते हैं।
अक्सर देखा जाता है कि इंसुलिन इंजेक्शन के रखरखाव से लेकर उसके लेने के तरीके, इंजेक्शन लगाने का स्थान (site), लेने के समय, मात्रा, एवं नीडल बदलने आदि में गलतियां एवं लापरवाहियां बहुतायत से की जाती हैं। जो अंततः आपके ब्लड ग्लूकोज के नियंत्रण को नकारात्मक रूप से प्रभावित करते हैं।
आइए जानते हैं ये क्या लापरवाहियां एवं गलतियां हैं?
इंसुलिन इंजेक्शन लेने में लापरवाहियां :
इंसुलिन इंजेक्शन लेने से संबंधित लापरवाहियां निम्नांकित हैं:-
1. चिकित्सक की समझाइश पर ध्यान न देना।
2. इंजेक्शन लेना भूल जाना।
3. खाने के पहले या बाद में लेने का ध्यान न रखना
4. अपनी मर्जी से इंसुलिन इंजेक्शन लगाना बंद कर देना।
5. अपनी मर्जी से कम या अधिक इंसुलिन लेना।
6. इंजेक्शन लेने के समय को ध्यान न रखना आदि।
7. इंसुलिन के रखरखाव का ध्यान न रखना।
8. अपने दैनिक इंसुलिन की मात्रा भूल जाना।
9. अधिक मीठा खाने पर डोज स्वयं बढ़ा लेना।
10. व्रत या खाना न खाने की स्थिति में स्वयं से इंसुलिन की खुराक छोड़ कर देना।
11. कई मरीज रोज रोज इंजेक्शन लगानेसे चिढ़कर इसे अक्सर बंद कर देते हैं।
12. बच्चों को इंसुलिन इंजेक्शन लगाना एक बड़ी चुनौती होती है, साथ ही माता पिता बच्चे की जिद के आगे कमजोर पड़ जाते हैं और इंसुलिन देना बंद कर देते हैं।
इस तरह की लापरवाहियों से अनियमित इंसुलिन खुराक के कारण मधुमेह नियंत्रण ठीक से नहीं हो पाता।
इंसुलिन इंजेक्शन लेते समय होने वाली गलतियां:-
इंसुलिन लगाते समय होने होने वाली गलतियां निम्नांकित हैं:-
1. चिकित्सक द्वारा बताए गए निर्धारित जगह के अलावा शरीर में गलत जगह पर इंसुलिन इंजेक्शन लगाना।
2. इंजेक्शन या इंसुलिन पेन को आड़ा टेढ़ा या तिरछा लगाना।
3. इंजेक्शन को लगाने के बाद तुरंत निकाल लेना, 5 से 10 सेकंड न रुकना।
4. पेन या इंजेक्शन में गलत मात्रा सेट करना या हो जाना।
5. नीडल को पूरी गहराई तक न चुभाना।
6. कई दिनों तक इंसुलिन पेन या इंजेक्शन की नीडल न
बदलना।
7. इंसुलिन को निर्धारित तापमान पर न रखने से उसकी गुणवत्ता खराब हो सकती है और असर कम हो सकता है।
8. बहुत ठंडा इंसुलिन इंजेक्ट करने पर दर्द हो सकता है।
उपरोक्त गलतियों के कारण इंसुलिन की दी जाने वाली उचित मात्रा शरीर में नहीं पहुंच पाती। जिससे मधुमेह नियंत्रण पर खराब असर पड़ता है। इंसुलिन इंजेक्शन/ पेन की नीडल लंबे समय तक न बदलने से इंसुलिन लगाने में दर्द होना एवं इन्फेक्शन का खतरा भी बढ़ जाता है।
इंसुलिन इंजेक्शन के रखरखाव और उपयोग के तरीके को लेकर शहरों की अपेक्षा गांव के मरीजों को ज्यादा चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।
गांवों में एक बड़ी आबादी के पास रेफ्रिजरेटर की व्यवस्था नहीं होती जिससे गर्मियों में इंसुलिन के रखरखाव में परेशानी होती है। साथ ही गांवों में बिजली कटौती की वजह से भी रेफ्रिजरेटर निरंतर चालू नहीं रह पाता।
शहर से दूर दराज के गांवों में मेडिकल स्टोर उपलब्ध न होने के कारण अक्सर इंसुलिन इंजेक्शन नहीं मिल पाता जिससे कुछ अंतराल तक इंसुलिन इंजेक्शन लेना छूट जाता है।
गांवों में शिक्षा और जागरूकता की कमी के कारण भी इंसुलिन इंजेक्शन लगाने के लेकर बहुत सी गलतियां होती हैं। साथ ही लापरवाहियां होने की संभावना भी शहरों की अपेक्षा गांव में अधिक होती हैं।
उपरोक्त गलतियों और लापरवाहियों के कारण मधुमेह नियंत्रण में बाधाएं आती हैं, जिससे मधुमेह से होने वाले घातक विकारों से बच पाना मुश्किल हो जाता है। अतः मरीज को इसके गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं।
क्या सावधानियां रखें?
इंसुलिन इंजेक्शन का रखरखाव :-
बंद इंसुलिन: फ्रिज में 2 से 8 डिग्री के बीच रखें। इसे जमने से बचाएं। फ्रीजर में न रखें
खुला इंसुलिन: एक बार खोलने के बाद, इसे कमरे के तापमान पर रखें। सीधी धूप से बचाएं। यह कमरे के तापमान पर एक महीने तक ठीक रह सकता है।
फ्रीज हुए या जमे हुए इंसुलिन का उपयोग न करें, क्योंकि यह निष्क्रिय हो जाता है।
इस्तेमाल की जाने वाली इंसुलिन को इंजेक्शन लगाने से पहले कमरे के तापमान पर लाना स्थानीय जलन को कम करने में मदद कर सकता है।
यात्रा के दौरान थर्मल केस का स्तेमाल करें। हमेशा एक अतिरिक्त शीशी या पेन साथ रखें।
हर बार उपयोग करने से पहले ध्यान से देखें, इंसुलिन में गांठें या बर्फ के कण दिखाई देने पर उसका उपयोग न करें।
अगर आपका ब्लड शुगर स्तर अचानक बढ़ जाता है तो इंसुलिन की गुणवत्ता में कमी हो सकती है।
इंसुलिन इंजेक्शन की मात्रा:
हमेशा चिकित्सक द्वारा बताई गई निर्धारित मात्रा में ही इंसुलिन लें। अपनी मर्जी से इसे कम या अधिक न करें।
हाइपोग्लाइसीमिया या ब्लड ग्लूकोज के प्रभावी नियंत्रण न होने की स्थिति में चिकित्सक से सलाह लेकर ही इंसुलिन की मात्रा में परिवर्तन करें।
शरीर में इंसुलिन इंजेक्शन लगाने के स्थान या अंग:
चिकित्सक या इंसुलिन सलाहकार के बताए अंगों (site) पर ही इंसुलिन लगाएं। इंसुलिन इंजेक्शन साइट मुख्यतः पेट में नाभि के आसपास, एवं जांघों में सामने की तरफ मोटी चमड़ी पर निर्धारित की जाती है। हमेशा इंसुलिन इंजेक्शन अलग अलग जगह पर लगाएं। बार बार एक ही जगह पर न लगाएं। इंसुलिन इंजेक्शन साइट चार्ट उपलब्ध हैं, इनका ध्यानपूर्वक स्तेमाल करें।
इंसुलिन इंजेक्शन लेने के तरीके:
पेन में या इंजेक्शन में इंसुलिन की निर्धारित मात्रा सावधानी से लोड करें।
इंसुलिन इंजेक्शन या पेन को चमड़ी में सीधा (90डिग्री पर) इंजेक्ट करें। इंजेक्ट करने के बाद सुई को कुछ देर लगभग 10 की गिनती तक चमड़ी में चुभा कर रखें, जिससे इंसुलिन की पूरी मात्रा शरीर में प्रवेश कर जाए।
इंसुलिन पेन या इंजेक्शन की नीडल 3 से 4 दिन में अवश्य बदल लें। इससे दर्द में राहत मिलती है से एवं इन्फेक्शन का खतरा टल जाता है।
इंसुलिन इंजेक्शन लेने का समय:
भोजन के समय लेने वाले इंसुलिन इंजेक्शन को चिकित्सक द्वारा समझाये गए निर्धारित समय पर पहले या बाद में लें।
24 घंटे तक असर बनाए रखने वाले लॉन्ग एक्टिंग इंसुलिन को प्रतिदिन निर्धारित समय पर ही लें। समय का विशेष ध्यान रखें।
इस तरह उचित मात्रा, उचित तरीके, उचित समय पर एवं उचित साइट पर ध्यानपूर्वक गुणवत्ता युक्त इंसुलिन इंजेक्शन नियमित लेने से मधुमेह नियंत्रण सत प्रतिशत प्रभावी होता है। इस तरह मधुमेह मरीज एक सामान्य, सुरक्षित एवं दीर्घ जीवन जी सकते हैं।