सूखे मेवे, गिरियाँ (Dried fruits / Nuts) और मधुमेह

भारतीय परिवेश में सूखे मेवे एवं गिरियों का शुरू से ही बहुत महत्व रहा है। कई साधु-संतों के बारे में यह चर्चित रहता था और है भी कि वे कुछ भी पका हुआ नहीं खाते, केवल दूध, फल, सूखे मेवों एवं गिरियों पर ही जीवित रहते हैं। यह कैसे संभव है? यह रहस्य सूखे मेवे और गिरियों के बारे में विस्तार से जानने के बाद उजागर होगा। दरअसल इस समूह में दो अलग-अलग वस्तुएँ आती हैं, सूखे मेवे जैसे किशमिश, मुनक्का, अंजीर, खजूर आदि एवं गिरियाँ जिनमें काजू, बादाम, पिस्ता, अखरोट आदि आते हैं।

कुछ समय पहले तक इन वस्तुओं के बारे में बहुत सारी भ्रांतियाँ थीं :-

  • इनमें कोलेस्ट्रॉल बहुत होता है।
  • हृदय रोग के मरीजों के लिए यह घातक होते हैं।
  • मोटापा कम करना हो तो इन्हें हाथ भी न लगाएँ।
  • मधुमेही लोगों में यह शक्कर की मात्रा बहुत बढ़ा देते हैं। आदि-आदि

आज हम गिरियों (Nuts) के बारे में बात करेंगे।
वनस्पति शास्त्र की दृष्टि से गिरियाँ (NUTS) एक प्रकार का फल है जिनका निर्माण एक ही कोष से होता है। इनका बाहरी आवरण कड़क होता है, परन्तु अन्दर से ये मुलायम एवं स्वादिष्ट होते हैं। इनका उपयोग खाने के लिये एवं तेल निकालने के लिये किया जाता है। यद्यपि अखरोट, पिस्ता, बादाम का तेल अत्यन्त मँहगा पड़ता है इसीलिए इनके तेल बहुत अधिक प्रचलित नहीं है। छिलकों के साथ सभी गिरियाँ लगभग एक साल तक रखी जा सकती है। छिली हुई गिरियाँ जैसे बादाम, अखरोट आदि को ठण्डे स्थान पर तेज़ रोशनी से बचाकर रखने चाहिए ताकि इनके पौष्टिक तत्व नष्ट न हों।

पौष्टिकता :
इन गिरियों का पौष्टिक मूल्य बहुत ही अच्छा होता है और यह लगभग आइडियल भोज्य पदार्थ माने जा सकते हैं। इनमें पानी की मात्रा बहुत कम होती है अतः इनमें सभी पौष्टिक तत्व सघन (Condensed) रूप में होने का कारण प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं।

प्रोटीन – लगभग सभी गिरियाँ पौष्टिक तत्वों से भरपूर हैं। इनसे हमें भरपूर मात्रा में प्रोटीन 18-40 प्रतिशत प्राप्त होता है। इनमें पाए जाने वाले प्रोटीन का प्रकार ऐसा होता है कि यदि इसे दूध या अनाज के साथ उपयोग किया जायेगा तो उसकी गुणवत्ता और अधिक बढ़ जाती है।

वसा (Fats) – इनमें लगभग 40 -60 प्रतिशत वसा मिलती है और इसी कारण से इन्हें लेकर इतनी अधिक भ्रांतियाँ थीं कि यह मोटापे या हृदय की बीमारी के लोगों के लिए घातक होता है क्योंकि यह माना जाता है कि वसा खून में कोलेस्ट्राल को बढ़ाएगी। परन्तु यह सत्य नहीं है जो वसा गिरियों में पाई जाती है वह अनसैचुरेटेड वसा होती है। दरअसल अनसैचुरेटेड वसा में भी इनमें मोनो एवं पॉली अनसैचुरेटेड वसा की मात्रा अधिक होती है जो कि वसा (FATS) का सर्वाधिक अच्छा रूप मानी जाती हैं। यह वसा खून में पहुँचकर खराब वसा को कम करने में सहायक होती है, तथा अच्छी वसा के स्तर को संतुलित रखने में मदद करती है। जैसा कि आपको ऊपर बताया कि इनमें जो वसा मिलती है वह केवल वनस्पति जन्य वसा है। इसका अर्थ है कि इनमें कोलेस्ट्रॉल तो होता ही नहीं है। कोलेस्ट्रॉल तो मांसाहारी पदार्थों से प्राप्त वसा में पाया जाता है जबकि गिरियाँ शाकाहारी पदार्थ हैं। अतः जो वसा इनसे प्राप्त होती है वह कोलेस्ट्रॉल तो हो ही नहीं सकती।

कार्बोज़ – गिरियों में प्रोटीन एवं वसा की मात्रा का प्रतिशत ज्यादा होने के कारण, इनमें कार्बोज़ का अनुपात बहुत कम हो जाता है। अतः मधुमेहयों के लिए गिरियाँ लाभदायक होती हैं। कैलोरी – लगभग सभी गिरियाँ ऊर्जा देने में सक्षम हैं और अधिक मात्रा में कैलोरी देती हैं। लगभग 100 ग्राम गिरियों से 650 कैलोरी तक ऊर्जा मिलती है।

विटामिन – गिरियाँ (NUTS) विटामिन-बी ग्रुप एवं अन्य कई विटामिनों का अच्छा स्रोत होती हैं। आपकी रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिये विटामिन-ई भी इनमें बहुत अच्छी मात्रा में पाया जाता है। परन्तु इनमें विटामिन-ए, विटामिन बी-12, विटामिन डी एवं विटामिन सी नहीं होते। मिनरल्स :-
कई आवश्यक लवण (मिनरल्स) हमें इनसे प्राप्त होते हैं।
आयरन सॉल्ट्स – खून बनाने के लिये, कार्य करने की क्षमता बढ़ाने के लिये।
मैग्नेशियम – ऊर्जा प्रदान करने के लिये।
ताँबा – खून बनाने के लिये, नर्व्स की सही कार्य प्रणाली के लिये, विटामिन सी के सही उपयोग के लिये।
जिंक – कई हारमोन्स बनाने एवं उनके सही कार्य करने के लिये आवश्यक, बालों को स्वस्थ रखने के लिये।
और भी अन्य खनिज हमें सूखे मेवों एवं गिरियों से प्राप्त होते हैं।

प्रसिद्ध गिरियों (नट्स) में पाए जाने वाले पोषक तत्वों (मैक्रोज़ और माइक्रोस) की विस्तृत पोषण तालिका नीचे दी गई है। यह प्रति 100 ग्राम (g) अनसाल्टेड और कच्चे गिरियों (नट्स) पर आधारित है:–

ग्लाइसेमिक इंडेक्स :–
सभी गिरियों की ग्लाइसेमिक इंडेक्स बहुत कम होती है। अतः इनके सेवन से खून में ग्लूकोज की मात्रा तेजी से नहीं बढ़ती। इसलिए यह डायबिटीज के मरीजों के लिए सुरक्षित और पौष्टिक आहार हैं। कुछ प्रसिद्ध गिरियों की ग्लाइसेमिक इंडेक्स निम्नांकित है।
1.बादाम(Almonds) बादाम का ग्लाइसेमिक इंडेक्स लगभग 15 होता है।

  1. अखरोट (Walnuts) अखरोट का ग्लाइसेमिक इंडेक्स भी मात्र 15 होता है। ओमेगा-3 फैटी एसिड से भरपूर अखरोट न केवल शुगर के स्तर को स्थिर रखता है, बल्कि दिल की सेहत और दिमागी विकास के लिए भी बेहतरीन माना जाता है।
  2. मूंगफली (Peanuts) मूंगफली का ग्लाइसेमिक इंडेक्स 13 से 15 के बीच होता है। यह सबसे कम जीआई वाले नट्स में से एक है।
  3. पिस्ता (Pistachios) पिस्ता का ग्लाइसेमिक इंडेक्स 15 से 28 के आसपास होता है।
  4. काजू (Cashews) काजू का ग्लाइसेमिक इंडेक्स 22 से 25 के बीच होता है।
  5. हेजलनट्स (Hazelnuts) हेजलनट्स का ग्लाइसेमिक इंडेक्स 15 से 25 के मध्य होता है।

कुछ सूखे मेवे जैसे बादाम खाने से गले में खराश महसूस होती है वह इनके छिलकों में पाए जाने वाले जटिल टैनिन के कारण होती है। बादाम भिगोने से यह छिलका आसानी से निकल जाता है तथा यह पचने के लिए अति उत्तम हो जाते हैं।

गिरियाँ (Nuts) उपरोक्त खूबियों के कारण एक संतुलित, संपूर्ण, पौष्टिक, और स्वास्थ्यवर्धक आहार होती हैं। अतः केवल इनके सहारे मनुष्य स्वस्थ जीवन जी सकता है। इससे आपको पता चल गया होगा कि, हमारे ऋषि-मुनि सूखे मेवे, दूध और ताज़े फल खाकर केवल प्रकृति द्वारा दी गई इस बहुमूल्य सौगात के बल पर आसानी से वर्षों तक तपस्या कर सकते थे।

प्रोटीन के लिए अक्सर माँसाहारी भोज्य पदार्थों के सेवन पर जोर दिया जाता है, परन्तु यह पूर्णरूप से संतुलित आहार नहीं है, एवं इसके कुछ स्वास्थ्य संबंधी जोखिम भी हैं। ऐसे में माँसाहारी भोज्य पदार्थों के स्थान पर लगभग 25 ग्राम गिरियों का उपयोग किया जाये तो यह भरपूर प्रोटीन के साथ अच्छी वसा, लो कार्ब, भरपूर फाइबर, विटामिन और मिनरल्स युक्त संतुलित आहार का उत्तम विकल्प है। भारतीय परिवेश में मधुमेही के लिये लगभग 10-15 ग्राम पर्याप्त होगा।

आइए कुछ खास गिरियों की अलग से बात करें….

मूँगफली : आर्थिक दृष्टि से इतनी सस्ती और आम आदमी का मेवा कही जाने वाली यह गिरी पौष्टिकता की दृष्टि से बाकी मँहगी गिरियों जैसी ही होती है। परन्तु आपको हैरानी होगी कि मूँगफली में ओलिक एसिड नाम के वसीय अम्ल होते हैं जो कि कोलेस्ट्रॉल कम करने में सहायक हैं। इनमें एक रेस्वेराट्रोल नामक फाइटोकेमिकल (Phytochemical called Resveratrol) पाया जाता है। यह अच्छा एंटीऑक्सीडेंट और रोग प्रतिरोधक तत्व है जो हृदय की बीमारियों से तो बचाता ही है, साथ ही कैंसर से लड़ने की क्षमता भी प्रदान करता है। यह देखा गया है कि इसका घुलनशील रेशा इसमें पाए जाने वाले मैग्नेशियम के साथ मिलकर खून की शर्करा एवं इंसुलिन के बीच संतुलन कायम करने में बहुत मददगार है। इसमें नायसीन नामक विटामिन-बी भी बहुत अच्छी मात्रा में पाया जाता है और यह भी ऊपर बताए गए कार्यों में सहायक है, साथ ही त्वचा, पाचनक्रिया एवं मानसिक संतुलन बनाए रखने के काम आता है। परन्तु याद रखें कि केवल 100 ग्राम से ही 600 कैलोरी मिल जाएंगी।

ध्यान रखें कि मूँगफली को खरीदकर बहुत अधिक समय के लिये बन्द करके न रखें अन्यथा इनमें एक प्रकार की फफूँद लग सकती है। कभी-भी मूँगफली से यदि बासी बदबू आए तो बिल्कुल उपयोग न करें। मूँगफली में मौसम की नमी से भी एक प्रकार का फफूँद लगता है। जब भी खरीदें तो अच्छी प्रकार की खरीदें। इसमें लगी फफूँद लीवर के लिये हानिकारक होती है। क्या आप जानते हैं कि मूँगफली के तेल के अलावा मूँगफली का दूध एवं दही भी बनाया जाता है। मूँगफली पीसकर नमक के साथ पौष्टिक एवं स्वादिष्ट चटनी बना सकते हैं। बच्चों के लिए सादे मक्खन के स्थान पर पनीर के साथ मिक्स करके डबलरोटी पर लगाने में अत्यन्त पौष्टिक नाश्ता बनता है।

बादाम : इनमें बाकी तत्वों के साथ विटामिन-ई एवं विटामिन-बी अधिक अच्छी मात्रा में पाया जाता है। साथ ही जो वसीय अम्ल एवं जिस प्रकार के शर्करा इनमें पायी जाती है (1/2 सुक्रोस, 3/4 पैन्टोसन्स एवं 1/7 रेशेयुक्त तत्व) शायद इन्हीं के कारण हमारे पूर्वज इन्हें दिमाग के लिये उपयोगी मानते थे।

तिल : मुख्यतः दो प्रकार की है काली एवं सफेद।
इसमें हमें विटामिन-बी समूह, विटामिन-ए, कैल्शियम अन्य लवण बहुत अच्छी मात्रा में मिलते हैं। इसमें 55-60 प्रतिशत वसा होती है, इसीलिए इसमें इतनी अच्छी प्रकार से तेल निकाला जाता है। इसमें फोसफोरस, अमीनो अम्ल मिथियोनीन एवं नायसीन खासकर बहुत अच्छी मात्रा में पाए जाते हैं।
इसमें लैसीथीन भी अच्छी मात्रा में पाया जाता है जो खून में खराब वसा को कम करने में सहायक होता है।

उपयोग: एक ओर इनके बहुत से फायदे हैं, दूसरी ओर इनमें अच्छी प्रकार की वसा अधिक मात्रा में होने के कारण ये अधिक कैलोरी देते हैं। तो प्रश्न यह उठता है कि इन्हें कितनी मात्रा में उपयोग करना चाहिए?
अक्सर देखा गया है कि मुख्य भोजन के अंतरालों में भूख लगने पर बिस्किट, चूड़ा, मिक्सचर, सेब, आदि खाए जाते हैं। पर इन्हें खाने से वो संतृप्ति नहीं मिलती जो गिरियाँ खाने से मिल सकती है। अतः दस रुपए के किसी भी मैदे की वस्तु के स्थान पर आप 5 से 10 नट्स का उपयोग करें और घर में भी सब को आदत डाल दें। किसी भी आम परिवार में 700-1000 रु. तक के बिस्कुट, कोला, मिक्सचर आदि महीने भर में आ जाते हैं। यदि इसी राशि का कुछ हिस्सा आप इन गिरियों के लिए रखें तो पौष्टिकता भी मिलेगी और आप ठाठ से अपने मिलने वालों को कह सकेंगे कि हम बिस्कुट नहीं मेवा खाते हैं। याद रखें कि औसतन एक बिस्कुट भी आपको 30 कैलोरी देता ही है।

साथ ही गिरियों को अपने मुख्य भोजन (मेजर मील) के साथ समावेश करें। इस तरह लगभग 15 से 25 ग्राम गिरियाँ प्रतिदिन सेवन करना उचित है।

खरीदते समय यह ध्यान दें कि कच्ची गिरियाँ खरीदेंगे तो बेहतर है क्योंकि बाज़ार से भुनी या नमक लगी इन वस्तुओं में यह डर रहता है कि कई बार खराब दाने भी मिला दिए जाते हैं। घर में रखते समय इन्हें ठण्डे स्थान पर, तेज़ रोशनी से बचा कर रखें।

तो अब इन गिरियों को ‘न’ कहना छोड़ दीजिये और ऊपर बताई गई मात्रा में इनका उपयोग शुरू कर दीजिए और हाँ यह बिल्कुल दिमाग से निकाल दे कि यह गरम होती हैं और इनका उपयोग केवल सर्दी में करना है। बताई गई मात्रा में इनका उपयोग आप पूरा साल कर सकते हैं।

इस भाग में हमने गिरियों के बारे में जाना, अगले भाग में मेवों (ड्राई फ्रूट्स) के बारे में जानेंगे।

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