पाठको आपको ज्ञात ही होगा कि हमारे शरीर में ग्लूकोज की मात्रा नियंत्रित करने के लिए सबसे महत्वपूर्ण हार्मोन “इन्सुलिन” पैन्क्रियाज में बनता है। किसी भी व्यक्ति को डायबिटीज तभी होती है जब पैन्क्रियाज व्यक्ति की जरूरत के अनुसार इंसुलिन नहीं बना पाती। पैन्क्रियाज शरीर में पेट के ऊपरी हिस्से में पीछे की तरफ पाया जाता है, व इसकी बनावट कॉमा (,) जैसी होती है। इसके चौड़े भाग के आसपास डियोडिनम (आँत का ऊपरी हिस्सा) लिपटा होता है।
पैन्क्रियाज के कार्य :-
पैन्क्रियाज मुख्य रूप से दो प्रकार के काम करता है…..
- बाह्य स्रावी कार्य (Exocrine Functions)
पैन्क्रियाज हमारे भोजन के पाचन में उपयोगी जरूरी एंजाइम्स का निर्माण करता है, यह पैन्क्रियाटिक रस के रूप में पैन्क्रियाटिक डक्ट द्वारा छोटी आँत में पहुँचाया जाता है। यह एंजाइम्स बहुत शक्तिशाली होते हैं एवं पाचन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यदि किसी कारण यह एंजाइम्स पैन्क्रियाटिक रस ले जाने वाली नालियों से लीक हो जाए तो ये पैन्क्रियाज को ही नष्ट करने लगते हैं। यह अक्सर पैन्क्रियाटाइटिस में होता है। इस प्रक्रिया को ऑटो डाइजेसन ऑफ पैन्क्रियाज कहते हैं। - अंतः स्रावी कार्य (Endocrine Functions)
पैन्क्रियाज में कोशिकाओं के कई छोटे-छोटे गुच्छे होते हैं जिन्हें आईलेट ऑफ लैंगरहैंस कहते हैं। इन गुच्छों में मौजूद बीटा सेल्स शरीर के लिए इंसुलिन का निर्माण एवं सीक्रिशन करते हैं। बीटा सेल्स खून में मौजूद ग्लूकोज की मात्रा को लगातार मापते रहते हैं, एवं उसी के अनुसार इंसुलिन का सीक्रिशन कम व ज्यादा करके खून में ग्लूकोज की मात्रा का नियंत्रण करते हैं। इन्हीं गुच्छों में एक अन्य प्रकार की कोशिकाएं अल्फा सेल्स भी होती हैं, जिनका काम ग्लूकोगॉन नामक हार्मोन बनाना है। ग्लूकोगॉन खून में ग्लूकोज की मात्रा कम होने पर उसे तुरंत सामान्य स्तर पर लाने का काम करता है। इस तरह हम देखते हैं कि पैन्क्रियाज खून में ग्लूकोज की मात्रा के नियंत्रण के लिए इंसुलिन एवं ग्लूकोगॉन नामक हार्मोन्स द्वारा एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
पैन्क्रियाटाइटिसः
किसी भी कारण से पैन्क्रियाज ग्रंथि में सूजन आ जाने की स्थिति को पैन्क्रियाटाइटिस कहते हैं। जैसा कि हमने पहले भी बताया है कि, इसी स्थिति में पैन्क्रियाज में बनने वाले एंजाइम्स स्वयं पैन्क्रियाज को ही नष्ट करने लगते हैं। एकाएक आने वाली अल्पकालिक सूजन को एक्युट पैन्क्रियाटाइटिस कहते हैं। जबकि लंबे समय तक एवं बार बार आने वाली सूजन को क्रोनिक पैन्क्रियाटाइटिस कहते हैं।
पैन्क्रियाटाइटिस के हर अटैक में पैन्क्रियाज द्वारा बनाए गए एंजाइम्स पैन्क्रियाज में अंदर ही रिस कर क्रियाशील हो जाते है। जिससे पैन्क्रियाज की कोशिकाएं नष्ट होने लगती हैं। इस प्रक्रिया को पैन्क्रियाज का ऑटो डाइजेसन कहते हैं

पैन्क्रियाटाइटिस के कारण :
- पित्ताशय (Gall Bladder) में पथरी – गॉल ब्लैडर लिवर से आने वाले रस को अपने में एकत्रित करके समय समय पर छोटी आँत में पहुँचाता है। गॉल ब्लैडर से रस ले जाने वाली एवं पैन्क्रियाज से रस ले जाने वाली नली साथ साथ छोटी आँत में खुलती हैं। इसी कारण गॉल ब्लैडर में मौजूद पथरी बाईंल डक्ट से आगे आकर पैन्क्रियाटिक डक्ट में घुस सकती है। पैन्क्रियाटिक डक्ट पथरी द्वारा अवरुद्ध होने पर पैन्क्रियाज में सूजन व ऑटो डाइजेसन की प्रक्रिया शुरू हो जाती है।
- अत्यधिक शराब का सेवन : शराब (alcohol) पैन्क्रियाज के ऊतकों (tissues) को नुकसान पहुँचता है जिससे पैन्क्रियाटाइटिस होना एक आम बात है।
- ट्राई ग्लिसराइड बहुत अधिक होनाः यदि खून में ट्राई ग्लिसराइड की मात्रा 500mg/dl से ऊपर हो तो यह पैन्क्रियाटाइटिस का कारण बन सकता है।
- खून में कैल्शियम की मात्रा अधिक होना : खून में कैल्शियम की मात्रा अधिक होना भी पैन्क्रियाटाइटिस का एक कारण है। ऐसा अक्सर एक हार्मोन संबंधी बीमारी हाइपरपैराथायरायडिज्म में देखा जाता है।
- पैन्क्रियाज के कैंसर : पैन्क्रियाज के कैंसर काफी घातक एवं जानलेवा कैंसर हैं, और इसके कारण भी पैन्क्रियाटाइटिस की शुरुआत हो सकती है।
- मधुमेह एवं मोटापा : ऐसा देखा गया है कि मधुमेह के मरीजों में एवं मोटे व्यक्तियों में पैन्क्रियाटाइटिस होने का खतरा सामान्य लोगों की तुलना में दोगुना होता है।
- सिस्टिक फाइब्रोसिस : यह एक आनुवंशिक बीमारी है जो पश्चिमी देशों में बहुतायत से देखी जाती है।
- पेट में चोट लगना अथवा पेट की सर्जरी।
- गॉल ब्लैडर स्टोन के लिए ERCP नामक जाँच से भी कभी कभी पैन्क्रियाटाइटिस हो जाता है।
पैन्क्रियाटाइटिस के लक्षण :
पैन्क्रियाटाइटिस के अटैक के समय मरीज को पेट के ऊपरी भाग में बहुत तीव्र दर्द होता है, यह दर्द अक्सर पीठ की तरफ भी जाता है। इसी के साथ अधिकांश मरीजों को उल्टियां भी होती हैं। कई मरीज चक्कर महसूस करने लगते हैं। डॉक्टर द्वारा परीक्षण करने पर ऊपरी पेट को छूने से दर्द होता है एवं मरीज का ब्लड प्रेशर गिर सकता है। क्रोनिक पैन्क्रियाटाइटिस एवं बार बार होने वाले पैन्क्रियाटाइटिस में मरीज का वजन कम होने लगता है। पैन्क्रियाज में बनने वाले एंजाइम्स की कमी के कारण भोजन पचता नहीं है एवं मरीजों को बदबूदार तेल युक्त मल (Foul smelling and oily stool) होता है। अधिकतर मरीजों को विटामिन एवं मिनरल्स की भी कमी होने लगती है। पैन्क्रियाटाइटिस में आइलेट ऑफ लैंगरहैंस के नष्ट होने के कारण मरीज को तत्काल अथवा आगे चलकर मधुमेह भी हो जाता है। अनेक शोधों में बताया गया है कि पैन्क्रियाटाइटिस के बाद पाँच साल में 30 से 50 प्रतिशत मरीजों को डायबिटीज हो जाती है।
पैन्क्रियाटाइटिस का इलाज :
पैन्क्रियाटाइटिस का अटैक होने पर मरीज को अस्पताल में भर्ती करना लगभग आवश्यक हो जाता है। मरीज को मुँह से खाने पीने की मनाही कर दी जाती है। दर्द निवारक दवाइयाँ इंजेक्शन द्वारा दी जाती हैं। पैन्क्रियाज अथवा उसके आस पास इंफेक्शन न हो उसके लिए एंटीबायोटिक दी जाती हैं। मरीज के पानी, कैलोरीज, विटामिन्स की जरूरत ड्रिप द्वारा पूरी की जाती है। सामान्यतः मरीज को लगभग एक हफ्ते अस्पताल में रहना पड़ता है। पैन्क्रियाज में बनने वाले एंजाइम्स की कमी को देखते हुए मरीज को पैन्क्रियाटिक एंजाइम्स के कैप्सूल अथवा गोलियाँ खाने के साथ लंबे समय तक दी जाती हैं। मरीज को डायबिटीज होने पर अधिकांश मरीजों को इंसुलिन दी जाती है।
पैन्क्रियाटाइटिस के कॉम्प्लिकेशन :
1 . पैन्क्रियाटाइटिस के अटैक के दौरान लीक हुए पैन्क्रियाटिक रस न केवल पैन्क्रियाज बल्कि आस पास के ऊतकों को भी नष्ट कर तरल बना देते हैं। यह तरल पदार्थ पैन्क्रियाज के आस पास जमा होकर एक सिस्ट बना देते हैं जिसे स्युडो सिस्ट कहते हैं। सिस्ट के अंदर इंफेक्शन होने का खतरा हमेशा बना रहता है, अतः ऐसा होने पर इसका इलाज सर्जरी द्वारा करना पड़ता है।
- कुपोषण : पैन्क्रियाटाइटिस से पाचक एंजाइम्स की कमी हो जाती है, जिससे पाचन क्रिया बुरी तरह प्रभावित होती है एवं शरीर में पोषक तत्वों की कमी हो जाती है। एवं वजन कम होने लगता है। विभिन्न प्रकार के संक्रमण होने का खतरा बढ़ जाता है। बार बार पैन्क्रियाटाइटिस अटैक आने पर पैन्क्रियाज के कैंसर होने का खतरा भी रहता है।
- मधुमेह : जैसा हम पहले ही बता चुके हैं कि पैन्क्रियाटाइटिस से होने वाली ऑटो डाइजेसन की प्रक्रिया से आइलेट ऑफ लैंगरहैंस भी नष्ट हो जाते हैं जिसके कारण इंसुलिन की कमी हो जाती है एवं खून में ग्लूकोज की मात्रा बढ़ने लगती है। वयस्क लोगों में टाइप 2 मधुमेह के बाद पैन्क्रियाटाइटिस जनित मधुमेह दूसरा सबसे बड़ा कारण है।
यदि ऐसे व्यक्ति जिसे पहले से मधुमेह है उसे पैन्क्रियाटाइटिस हो जाए तो उसका ग्लूकोज नियंत्रण बुरी तरह बिगड़ जाता है। और उसे नियंत्रित करने के लिए इंसुलिन की आवश्यकता होती है।
साथियों हमने देखा कि पैन्क्रियाटाइटिस एक गंभीर रोग है शराब का सेवन न करके, मधुमेह नियंत्रण में रखकर, एवं मोटापे से बचकर इसके होने की संभावना को टाल सकते हैं। जिन्हें पैन्क्रियाटाइटिस हो चुकी है, उन व्यक्तियों में मधुमेह की संभावना बहुत बढ़ जाती है, एवं पैन्क्रियाटाइटिस जनित मधुमेह से बचने के लिए अक्सर इंसुलिन का सहारा लेना पड़ता है।
