जो नादान समझते हैं कि सबकी डायबिटीज़ एक सी होती है, या कि होनी चाहिये, वे कभी डायबिटीज़ वाले अफ़सर को देखें। निहारें कभी आला अफ़सर की डायबिटीज़ के जलवे। न तो वो कोई ऐरा-गैरा मरीज़ है और न ही उसकी डायबिटीज़ हम-आप जैसों वाली तुच्छ सी डायबिटीज़। वो आला अफ़सर है और टायलेट में भी नहीं भूल पाता कि वह अफ़सर है। माना कि वह बीमार है, पर अफ़सर भी तो है। अफ़सरी स्वयं एक बीमारी बन गयी है उसके व्यक्तित्व की। वह अफ़सरी ढोता भी है और अफ़सरी पर सवार भी रहता है। वह कोई मौका नहीं छोड़ता यह बताने का कि वह अफ़सर है। वह सारी दुनिया को मातहत समझता है और समझता है कि दुनिया के हर आदमी के खिलाफ वह ऐक्शन ले सकता है। उसका बस चले तो वह डायबिटीज़ को सस्पेंड कर दे, ब्लड-सुगर के इन्क्रीमेंट रुकवा दे या कभी शुगर रिपोर्ट ज़्यादा बताये तो ग्लूकोमीटर को थानेदार द्वारा ज़ब्त करवा दे। वह डायबिटीज़ को भी अपना मातहत मानता है – डॉक्टर तो उसके मातहत हैं ही। वह चाहता है कि वह दवाई ले न ले, दवाई के पहले रसगुल्ले खाये या बाद में, घूमे पर कार में – फिर भी यह डॉक्टर की नैतिक, कानूनी तथा संवैधानिक ज़िम्मेदारी बनती है कि उसकी डायबिटीज़ को ठीक करके उसकी रिपोर्ट अफ़सर को सबमिट करे।
आला अफ़सर सर्वज्ञात है – यह तथ्य हम जानते हैं। तभी तो वह आज कृषि विभाग का सेक्रेट्री होकर कृषि वैज्ञानिकों को दिशा निर्देश दे सकता है, तो कल शिक्षा विभाग का सेक्रेट्री बनकर बता सकता है कि शिक्षा कहाँ गलत है। सो ऐसा सतत् भ्रम का शिकार प्राणी है वह कि जिसे लगता है कि वह डॉक्टर से ज़्यादा जानता है। यह समझ लें कि आला अफ़सर यदि डॉक्टर के पास आया है, तो वह अपनी बीमारी के विषय में जानने – ठीक होने नहीं आया है। वह तो डॉक्टर का ज्ञान बढ़ाने के लिये आया है। कर्तव्य है उसका। आला अफ़सर चाहता है कि डायबेटोलॉजिस्ट उसके ज्ञान से लाभ उठायें। सो जब तक अन्य मरीज़ बाहर बैठे अपने नम्बर की प्रतीक्षा में सूख रहे होते हैं, तब तक वह अंदर बैठकर डॉक्टर को अपने डायबिटीज़ के ज्ञान से तरबतर कर रहा होता है। उसने इन्टरनेट से डाउनलोड करवाया है। दफ़्तर में मातहतों को काम दे रखा है कि कम्प्यूटर पर सर्फ़िंग करें और लायें नायाब मोती। वे लाते हैं। बहुत से तो वह खुद ही डुबकी मारके ले आता है।
आला अफ़सर यदि रात के ग्यारह बजे भी फ़्री हुआ है, तो चाहता है कि डॉक्टर को फोन करके उससे अपनी डायबिटीज़ के बारे में लंबा बतियाये। डॉक्टर तो साले फ़्री रहते ही हैं। काम क्या है उनको। उनके न बीवी, न बच्चे। अपनी डायबिटीज़ के बारे में वह सब कुछ बता देना चाहता है। यदि सोते-सोते, सपने में भी उसे किसी गोली के बारे में कन्फ़्यूज़न लगे तो वह जागकर रात दो बजे भी डॉक्टर को फोन कर सकता है कि नीली वाली गोली को खाने के बाद लेना ठीक होगा या पहले? वह हँसकर कहता है कि भाई, हम तो डॉक्टर से पूछे बिना कुछ नहीं करते। डॉक्टर जानता है कि उसका टेटुआ अफ़सर के हाथ में है। वह सरकारी डॉक्टर का ट्रान्सफ़र करा सकता है, प्राइवेट नर्सिंग होम पर छापा डलवा सकता है और बड़े से बड़े डॉक्टर को उसकी औकात दिखा सकता है। वह, जो मंत्रियों के आगे घिघियाता है, नेताओं के समक्ष हें – हें करता है, अपने से बड़े अफ़सर की कार का दरवाज़ा खोलने को तत्पर रहता है – वह इन सबका बदला डॉक्टर से ले सकता है। इसी चक्कर में डॉक्टर को तत्पर रहना पड़ता है कि उसकी डायबिटीज़ के अंतहीन बोरिंग किस्से को, बार-बार सुने और सिर भी न धुने। अफ़सर अपनी डायबिटीज़ का पिछले पन्द्रह साल का पूरा रिकार्ड फाइल में धरे हैं और चाहता है कि डॉक्टर सारे काम छोड़कर उस फाइल का एक-एक पन्ना आद्योपान्त पढ़े-गुणे ओर उससे डिस्कस भी करे। तबकी ब्लड सुगर, जब सन अस्सी में अफ़सर जगदलपुर में कलेक्टर था, और तब का ईसीजी जब सन पच्चासी से वह डेपुटेशन में दिल्ली में था। सब धरे हैं। सब देखें डॉक्टर। डॉक्टर खूब जानता है कि इन परचों का अधिकांश अब अप्रासंगिक है। पर क्या तो वह कहे और क्या तो वो करे। बंदर तलवार लेकर घूम रहा है और डॉक्टर से अपेक्षा है कि वो खुद को भी बचाये और बंदर को भी।
अफ़सर बता रहा है कि देश के किस-किस नामी डायबेटोलॉजिस्ट को वो दिखा चुका है। वह जिस भी नये शहर जाता है – घूमने, दौरे पर या यूं ही – वहीं के सर्वश्रेष्ठ डॉक्टर को दिखाकर राय लेता है। सुनता सबकी है और करता अपनी है। फिर यह भी पूछता जाता है कि उसकी डायबिटीज़ कोई क्यों ठीक नहीं कर पा रहा? वह होम्योपैथी का हिमायती है, ऐलोपैथी का आलोचक है, आयुर्वेद से प्यार करता है, नेचुरोपैथी का सपोर्टर है, यूनानी दवाओं का इतिहास जानता है। वह चाहता है कि ऐलोपैथिक डॉक्टर उसे सजेस्ट करे कि होम्योपैथी ठीक रहेगी या आयुर्वेदिक? खाता वह ऐलोपैथिक दवाइयाँ ही है, पर अहसान-सा जता कर। वो हमेशा पूछता रहता है कि भाई, और कौन-सी नयी दवाई आई है डायबिटीज़ की? बताता है कि उसके अमेरिका वाले भाई ने कहीं किसी जर्नल में कोई नई दवा का कोई अच्छा सा नाम पढ़ा था – तो क्या वो अपने यहाँ आ गई है? आ गई हो, तो हमें दिला दें। कीमत की परवाह न करें। अफ़सर के लिये सरकार चुकाने बैठी है। जितने का बिल हो री-इम्बर्स करेगी सरकार। सरकारी कार लेकर अफ़सर का ड्राइवर दस बार आकर दस जगह फार्म पर दस्तखत कराके ले जायेगा। वह पचास-सौ की दवाई के लिये हजार का सरकारी पैट्रोल जलायेगा। अधिकार है उसका।
आला अफ़सर चाहता है कि उसका जो भी होना हो, उसके बंगले पर ही हर चीज़ का इंतज़ाम हो सके तो बेहतर। बंगले पर आकर डॉक्टर देखले, सिस्टर बंगले से ब्लड सैंपल ले जाये और बाद में डॉक्टर उस रिपोर्ट को लेकर यदि बंगले पर आकर डिस्कस कर ले, तो फिर क्या कहने! अफ़सर का बस चले तो आपरेशन तथा ऐनीमा से लेकर पोस्टमार्टम तक बंगले पर ही हो। सत्ता के दर्प में तप रहा है अफ़सर। अफ़सरी उसे लू की भांति लग गयी है। वह मानने को तैयार नहीं है कि बीमारी यह देखकर नहीं आती कि तू किस पोस्ट पर है और कहाँ-कहाँ तक तेरी पहुँच है। वह समझने को तत्पर नहीं कि डॉक्टर के सामने सभी मरीज़ बराबर हैं और सारे मरीज़ों का हक डॉक्टर पर उतना ही है। वह मानने को तैयार नहीं कि ऐसा न करके वह अपनी ही हानि करता है। डॉक्टर तो मजबूर है, जैसे कि पूरी दुनिया ही मजबूर है तेरी अफ़सरी के सामने। पर तू अपनी तो सोच यार। कहीं तो अफ़सर से वापस आदमी हो जाया कर। कहीं तो यह भुला कि तू अफ़सर है। कम से कम अपने शरीर और अपनी डायबिटीज़ को तो अफ़सरी से बख्श! जब तू डॉक्टर के पास जाये, तो डायबिटीज़ का मरीज़ बनकर पहुँच। अफ़सरी को यदि थोड़ी देर के लिये डॉक्टर के चेंबर के बाहर छोड़ आये, तो कैसा रहे बॉस?
- डॉ. ज्ञान चतुर्वेदी
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