साथियों यदि आप टाइप 2 डायबिटीज के मरीज हैं, तो आपने मैटफॉर्मिन नाम की दवाई का उपयोग अवश्य ही किया होगा। यह दवाई टाइप 2 डायबिटीज में सबसे पहले उपयोग की जाने वाली दवाई है। विश्व की सभी डायबिटीज से संबंधित संस्थाएँ अपने दिशा निर्देश में यही कहती हैं कि आहार व्यायाम एवम् दिनचर्या सुधारने के बाद टाइप 2 डायबिटीज में मैटफॉर्मिन को पहले क्रम में रखनी चाहिए। यह दवाई अनेक नामों से अनेक कंपनियों द्वारा बाजार में बेची जाती है, एवम् यह मधुमेह की दूसरी दवाइयों के साथ कॉम्बिनेशन में भी उपलब्ध है।
मैटफॉर्मिन का इतिहास
मैटफॉर्मिन को रासायनिक रूप में बायगुआनाइड (Biguanide) वर्ग में रखा गया है। फ्रांस के वैज्ञानिकों ने इस तरह के रसायन एक पौधे से प्राप्त किए थे जिसका नाम Galiga Officinalis है। और यह बताया था कि, इन रसायनों से खून में ग्लूकोज की मात्रा कम होती है। 1957 में इन्ही रसायनों को परिष्कृत करके मैटफॉर्मिन को ईजाद किया व इसे पहली बार मधुमेह के उपचार में उपयोग किया। अधिकांश देशों में यह दवाई 1958 से टाइप 2 डायबिटीज के उपचार में उपयोग हो रही है। परंतु अमेरिका में 1972 से 1995 तक कुछ विवादों के कारण यह दवाई प्रतिबंधित रही। 1995 के बाद अमेरिकी चिकित्सकों ने भी इस दवाई की उपयोगिता को स्वीकार किया, और इसे टाइप 2 डायबिटीज के उपचार में प्रथम क्रम (first line) में रखा।
अनेक बड़े बड़े शोधों में पाया गया कि मैटफॉर्मिन न केवल खून में ग्लूकोज की मात्रा घटाती है, बल्कि मरीज में हार्ट अटैक एवम् लकवा होने की संभावना को भी कम करती है। वजन कम करने में भी सहायक है। एवम् इससे लो शुगर होने का खतरा भी नहीं रहता। नए शोध बताते हैं कि मैटफॉर्मिन कैंसर होने का खतरा भी कम करती है। WHO द्वारा मैटफॉर्मिन को एसेंशियल मेडिसिन की लिस्ट में रखा गया है। एवम् इसे टाइप 2 डायबिटीज के इलाज में आधारभूत दवा माना गया है।
कैसे काम करती है मैटफॉर्मिन?
इंसुलिन रेजिस्टेंस को टाइप 2 मधुमेह होने का सबसे बड़ा कारण माना जाता है। इस अवस्था में इन्सुलिन की कार्यक्षमता में कमी आ जाती है एवम् ग्लूकोज को नियंत्रित रखने के लिए इन्सुलिन बनाने वाली बीटा सेल्स को सामान्य से बहुत ज्यादा इन्सुलिन बनानी पड़ती है। मैटफॉर्मिन इंसुलिन रेजिस्टेंस को कम करके उपलब्ध इन्सुलिन की कार्यक्षमता को बढ़ाती है। इन्सुलिन रेजिस्टेंस मधुमेह ही नहीं बल्कि मधुमेह के साथ ही मोटापे, महिलाओं में PCOS की बीमारी एवम् फैटी लिवर की बीमारी का भी कारण है। इन बीमारियों से ग्रस्त मरीजों को अक्सर आगे जाकर टाइप 2 डायबिटीज भी हो जाती है। इन बीमारियों में भी चिकित्सक मैटफॉर्मिन का उपयोग करते हैं।
मैटफॉर्मिन लेने के लाभ
- खून में ग्लूकोज की मात्रा कम करना।
- लो शुगर का खतरा न होना।
- वजन कम करना।
- खून में खराब कोलस्ट्रॉल को कम करना।
- हार्ट अटैक एवम् पक्षाघात का खतरा कम करती है।
- कैंसर की संभावना को कम करना।
- फैटी लिवर के मरीजों में लिवर की चर्बी कम करना।
किन किन बीमारियों में उपयोग की जाती है मैटफ़ॉर्मिन?
- टाइप 2 डायबिटीज:
मैटफ़ॉर्मिन डायबिटीज की प्रथम क्रम की दवाई है, जिसे बीमारी की शुरुआत से अंत तक दिया जाता है। अनेक प्रकार की अन्य दवाइयाँ भी मैटफ़ॉर्मिन के साथ जोड़कर दी जा सकती हैं। मैटफ़ॉर्मिन इन्सुलिन बनाने वाली बीटा सेल्स को उत्प्रेरित करके काम नहीं करती, अतः यह माना जाता है कि इसके लेने से बीटा सेल्स ज्यादा लंबे समय तक काम करती रहती हैं।
- प्री डायबिटीज:
प्री डायबिटीज वह अवस्था है जिसमें व्यक्ति की ब्लड ग्लूकोज की मात्रा सामान्य से अधिक होती है, पर डायबिटीज के निदान की सीमा से थोड़ा नीचे होती है। ये वह व्यक्ति होते हैं, जिनके परिवार में डायबिटीज अनुवांशिक एवम् वजन सामान्य से ज्यादा है। ऐसे मरीज भविष्य में आगे जाकर पूर्ण रूप से डायबिटीज से ग्रस्त हो जाते हैं। यदि इस अवस्था में व्यक्ति अपना वजन कम कर ले, एवम् अपनी दिनचर्या में आहार व व्यायाम पर ध्यान दे तो डायबिटीज होने को टाला जा सकता है। इस श्रेणी के व्यक्ति जो खासकर मोटे भी हैं, उनमें मैटफ़ॉर्मिन का उपयोग करने से डायबिटीज को टालना संभव है।
- PCOS:
यह लड़कियों व महिलाओं में पाई जाने वाली कॉमन बीमारी है। इसमें मासिक धर्म अनियमित हो जाता है। चेहरे पर बाल एवम् मुँहासे व वजन भी बढ़ जाता है। इन्सुलिन रेजिस्टेंस को इस बीमारी का भी जनक माना जाता है। इस बीमारी से ग्रस्त महिलाओं में गर्भ धारण में भी मुश्किल आती हैं एवम् महिलाओं में संतान हीनता का एक मुख्य कारण है। इस बीमारी में भी मैटफ़ॉर्मिन को बहुत उपयोगी पाया गया है।
- जीडीएम (GDM):
गर्भावस्था में पहली बार होने वाली मधुमेह को जीडीएम कहते हैं। ऐसी अधिकांश महिलाओं में अनुवांशिक रूप से रिश्तेदारों में डायबिटीज होती है। अधिक उम्र में गर्भ धारण करने पर भी जीडीएम का खतरा बढ़ जाता है। ऐसी महिलाओं को डिलीवरी के बाद डायबिटीज ठीक हो जाती है, परंतु भविष्य में डायबिटीज होने का खतरा बहुत अधिक होता है। गर्भावस्था में जीडीएम होने पर मां एवम् बच्चे पर अनेक दुष्प्रभाव होते हैं। अबॉर्शन का खतरा बढ़ जाता है, या बच्चा मृत पैदा होने का खतरा बढ़ जाता है। जीडीएम के उपचार के लिए इन्सुलिन का उपयोग करना पड़ता है। GDM के लिए मुँह से दी जाने वाली दवाइयों में मैटफ़ॉर्मिन अकेली दवाई है।
कब नहीं देनी चाहिए मैटफ़ॉर्मिन:
टाइप 1 डायबिटीज में।
किसी बड़े ऑपरेशन के पहले जिसमें जनरल एनेस्थीसिया दिया जाता है।
यदि क्रिएटिनिन की मात्रा सीरम में 1.6 mg/DL से अधिक हो।
ऊतकों में ऑक्सीजन की कमी की संदिग्धता में, जैसे हार्ट अटैक, या सेप्सिस में।
गंभीर गुर्दा रोग में।
मैटफ़ॉर्मिन के प्रतिकूल प्रभाव:
सामान्यतः मैटफ़ॉर्मिन के प्रतिकूल प्रभाव पेट एवम् पाचन तंत्र संबंधी होते हैं जैसे, डायरिया, मरोड़ (Cramps), अरुचि, मिचली (Nausea), उल्टी आना आदि होते हैं।कभी कभी लैक्टिक एसिडोसिस भी हो सकता है, और इसका खतरा लिवर एवम् गुर्दे की बीमारी में बढ़ जाता है। इससे जी मिचलाना, खून की कमी, लो ब्लड प्रेशर, अनियमित धड़कन, आदि लक्षण होते हैं। यह खतरनाक हो सकता है। अतः लिवर एवम् गुर्दे के मरीज सावधानी रखें।
मैटफ़ॉर्मिन के फॉर्मुलेशन एवम् डोज:
मैटफ़ॉर्मिन हमारे देश में विभिन्न कंपनियों द्वारा कई ब्रांड नामों से उपलब्ध है। इसकी 500, 850, एवम् 1000 मिलीग्राम की गोलियाँ बाज़ार में उपलब्ध हैं। आजकल मैटफ़ॉर्मिन के एक्सटेंडेड रिलीज फॉर्मुलेशन उपलब्ध हैं, जिससे मैटफ़ॉर्मिन के प्रतिकूल प्रभाव काफी कम हो जाते हैं, साथ ही लंबे समय तक ब्लड ग्लूकोज नियंत्रण में कारगर है। यह मधुमेह की दूसरी अन्य दवाइयों के साथ कॉम्बिनेशन में भी उपलब्ध है।
