डायबिटीज के अजीब उपचारों का मायावी संसार ” झूठी आशा, बड़ी निराशा “





डायबिटीज के मुख्यतः दो प्रकार टाइप 1 और टाइप 2 होते हैं। दोनों ही तरह की डायबिटीज के नियंत्रण के लिए जीवन भर नियमित दवाइयाँ और इंसुलिन लेना पड़ता है।
जीवन भर तक रोज दिन में 2 या 3 बार दवा लेना, साथ ही नियमित और अनुशासित जीवन शैली अपनानी होती है। वह भी ऐसी समस्या के लिए जिससे खास तकलीफ या दर्द महसूस नहीं होता। डायबिटीज के लक्षण दर्द रहित होने के कारण ही लोग इससे उत्पन्न होने वाले जानलेवा विकारों (complications) का अंदाजा नहीं लगा पाते। इसीलिए ज्यादातर मरीज शुरुआत में डायबिटीज को बहुत हल्के में लेते हैं। पर डॉक्टर्स द्वारा बताए गए संभावित खतरों और डायबिटीज के कुछ मामूली लक्षणों कारण मानसिक रूप से डरे और परेशान रहते हैं। तथा इस समस्या को जड़ से दूर करने की ख्वाहिश रखते हैं। इसलिए कई तरह के भ्रम और लापरवाहियों के भंवर में फंस जाते हैं।

वस मरीज की इसी मनःस्थिति के कारण शुरू होता है डायबिटीज के अजीब उपचारों का मायावी संसार। डायबिटीज को जड़ से तो खत्म करने के मनमोहक प्रचारों का जाल, और भ्रामक वादों का चारा सोशल मीडिया, प्रिंट मीडिया, और नेशनल टेलीविजन पर बहुतायत से डाला जाता है।

इस चारे में चक्कर में पड़ते हैं वह बेचारे, जो अपनी डायबिटीज की बीमारी को या तो स्वीकार नहीं करते, या समझते नहीं, या अपने डॉक्टर की सलाह नहीं मानते। साथ ही अपने दिमाग में अपलोड करने लगते हैं सोशल मीडिया का ज्ञान। इन सभी चक्करों में अच्छा खासा समय बीत जाता है और डायबिटीज अपना खेल कर जाती है।
डायबिटीज के अपने खास दर्दनाक लक्षण नहीं होते जिससे उसे आप हल्के में लेने की गलती सकते हो। पर इससे उत्पन्न विकारों के लक्षण बहुत दर्द भरे, और खतरनाक होते हैं। जैसे, अंधत्व, कोमा, किडनी खराब होना, गैंग्रीन, एम्प्युटेशन, लकवा, हार्ट अटैक, और क्या कुछ नहीं। देखा जाए तो आपके द्वारा लापरवाहियों, और भ्रम पर किए गए निवेश का परिणाम आपको बीमारियों के खजाने के रूप में मिल ही जाता है।

अब बात करते हैं उन खास डायबिटीज के उपचार के लुभावने प्रचारों की, जिनके जाल में फंस कर मरीज मधुमेह नियंत्रण का बहुमूल्य समय और अपने बहुमूल्य अंग खो देते हैं।

इसके प्रमुख कारण हैं बीमारी पर यकीन न होना, जागरूकता की कमी, लापरवाही, भ्रम, डर, जल्दबाजी, और अंधविश्वास। यह मनोस्थिति मरीज को गलत दिशाओं में भटका सकती है। जो अक्सर निम्नानुसार होता हैं…

  • कई मरीज शुरुआत में यकीन ही नहीं करते कि उन्हें डायबिटीज हो चुकी है, और इलाज में टालमटोल करते है। अजीब है पर यह देखा गया है कि, कई मरीज अक्सर आगे जाँचें करवाने से भी बचने लगते हैं।
  • फिर जब डायबिटीज के कारण जब कुछ अन्य परेशानियां होने लगती हैं तब जाकर मरीज मानता है कि उसे डायबिटीज हो चुकी है, और अब कुछ इलाज कराना ही पड़ेगा। पर इस स्थिति में भी कई मरीज दवाइयों, उचित जाँचों और खान पान में लापरवाही करना नहीं छोड़ते।
  • लापरवाहियों की वजह से डायबिटीज ठीक से नियंत्रित नहीं होती और मरीज कई भ्रम पाल लेता है, बार बार डॉक्टर बदलता है। साथ ही मरीज के मन में डायबिटीज के जल्दी नियंत्रण और उसे जड़ से खत्म करने की प्रबल इच्छा बनी रहती है।
  • इस तरह डर, परेशानी और जल्दबाजी के कारण मरीज इंटरनेट, सोशल मीडिया, और अन्य स्रोतों से प्राप्त इलाज के भ्रामक विज्ञापनों के चक्कर में पड़कर कई मरीज ऊंटपटांग उपचार स्वयं के ऊपर अपनाने लगते है।
  • गांव एवं शहरों के कई मरीज आज के आधुनिक जमाने में भी झाड़ फूंक, टोने टोटके, के झांसे में आ जाते हैं।
    इस तरह मरीज अपने डायबिटीज के उपचार का शुरुआती बहुमूल्य समय गंवा देते हैं।

मधुमेह के उपचार में लापरवाही के दुष्परिणामों को समझने के लिये कुछ उदाहरण प्रस्तुत हैं :

  1. गुप्ता जी बैंक में अधिकारी हैं। कुछ दिनों में उनका वजन अचानक कम होने लगा। अक्सर सुस्ती और थकावट महसूस करने लगे। एक दिन गुप्ता जी की कॉलोनी में एक स्वास्थ्य शिविर का आयोजन हुआ, जहाँ पर उन्होंने अपनी शुगर की जाँच कराई तो पता चला कि उन्हें डायबिटीज है। उन्होंने यकीन नहीं किया और धीरे धीर एक साल बीत गया।

अब गुप्ता जी को अनियंत्रित डायबिटीज के कारण होने वाली कुछ समस्याएं होने लगीं, जैसे नजर धुंधली होना, पेशाब में बार बार इन्फेक्शन होना आदि। इन समस्याओं के लिए डॉक्टर्स से परामर्श किया तो उन्हें बताया गया कि उनके खून में ग्लूकोज की मात्रा कई दिनों से काफी बढ़ी हुई है जो कि HbA1c जाँच से पता चली। इसीलिए यह समस्याएं हो रही हैं। साथ ही नेत्र चिकित्सक से उनके रेटीना की जाँच कराई जिससे पता चला कि उनकी एक आँख के रेटीना में डायबिटीज के कारण खराबी आना शुरू हो गई है।

गुप्ता जी ने अंततः खुद को डायबिटीज होना स्वीकार किया। पर अब उन्हें बीमारी की चिंता और डर के साथ हमेशा के लिए दवाइयाँ खाने की उलझन के कारण मानसिक तनाव होने लगा। और गुप्ता जी लग गए डायबिटीज को जड़ से खत्म करने के तरीकों की खोज में। इसका नतीजा यह हुआ कि गुप्ता जी ने कई बार डॉक्टर बदले, इलाज में लापरवाहियां करने के साथ कई घरेलू नुस्खे अपने ऊपर अपनाए। कई हर्बल दवाएं लीं।
यहां तक तो सब ठीक ठाक था। पर आगे गुप्ता जी ने लुभावने प्रचारों के चक्कर में पड़कर कुछ पारंपरिक उपचार के तरीकों से बनी कुछ भस्में, जो कि विभिन्न हैवी मेटल से बनती हैं लेना शुरू किया। इनसे डायबिटीज तो नियंत्रित नहीं हुई पर इन भस्मों में पाई जाने वाली हैवी मेटल ने गुप्ता जी की किडनियों पर खराब असर डाला। इसका नतीजा यह हुआ कि अब गुप्ता जी को डायलिसिस कराने की नौबत आ गई।

  1. पाठक जी प्राइवेट कंपनी में एक बड़े अफसर हैं, उनकी पत्नि स्थानीय स्कूल में शिक्षिका हैं। पाठक दम्पत्ति के दो बच्चे हैं। 16 साल की एक लड़की एवं 12 साल का लड़का अमन।

अमन कुछ दिनों से कमज़ोर-सा हो गया था वह बार-बार पानी पीता एवं बार-बार खाना माँगता था और बार बार पेशाब जाता था। एक दिन उसे बुखार आया साथ में उसे पेट दर्द व उल्टियाँ भी होने लगीं। पाठक दम्पत्ति बच्चे को लेकर अस्पताल भागे। इलाज के साथ कुछ जरूरी जाँचों के बाद डॉक्टर्स ने बताया कि अमन को डायबिटीज है। इलाज के बाद अमन की हालत में सुधार हुआ, और वे बच्चे को लेकर घर आ गए। पर पाठक दंपत्ति यकीन नहीं कर पा रहे थे कि उनके बच्चे को डायबिटीज है। अतः उन्होंने अमन के इलाज के लिए कई बार डॉक्टर बदले। साथ ही कुछ घरेलू उपायों के साथ झाड़ फूंक भी कराते रहे। कुछ अनुष्ठान भी किए। पर बच्चे की हालत में कुछ खास सुधार नहीं हुआ।

कुछ दिनों बाद रात के समय बच्चे की हालत तेजी से बिगड़ने लगी और अब वह ज़ोर-ज़ोर से साँस भी लेने लगा। अगले दिन सुबह माता-पिता अमन को लेकर फिर अस्पताल पहुँचे। अस्पताल पहुँचते-पहुँचते अमन को बेहोशी भी आने लगी। उसकी साँस तेज़ चल रही थी। आँखें अंदर धँस गई थीं, जु़बान सूख गई थी। डॉक्टर ने जाँच करके बताया कि बच्चे की खून में शुगर की मात्रा में 445 है एवं पेशाब में कीटोन्स की मात्रा बहुत बढ़ गई है। यह अमन के टाईप-1 मधुमेह होने की शुरुआत थी जो DKA के रूप में प्रकट हुई। और अमन डायबिटिक कोमा में जाने ही वाला था, जो उसके लिए जानलेवा हो सकता था।

डायबिटीज के कई मरीज अक्सर इन लापरवाहियों, भ्रम, और लुभावने प्रचारों के शिकार होते हैं। इन प्रचारों का मायावी संसार मधुमेही को बड़ी बड़ी उम्मीदें देता है। पर अंत में मरीज को भारी निराशा ही हाथ लगती है। अनियंत्रित डायबिटीज से जो नुकसान होना होता है वह तो होता ही है। उससे कहीं अधिक नुकसान ऊंटपटांग इलाजों से होता है।
डायबिटीज के मरीजों को इन झूठे अप्रमाणित तरीकों से आशा नहीं लगानी चाहिए। बल्कि पूरी जागरूकता के साथ डायबिटीज उपचार के उचित, प्रमाणित और कारगर तरीकों पर ही भरोसा रखना चाहिए। ताकि उचित समय पर डायबिटीज पर प्रभावी नियंत्रण किया जा सके।

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