प्लास्टिक मानव इतिहास की एक बड़ी खोज है, जिसने हमारे जीवन को बहुत आसान बना दिया है। प्लास्टिक की खोज ने हमें कई तरह के उत्पादों का निर्माण करने में मदद की है।
प्लास्टिक का मजबूत, टिकाऊ, सस्ता और हल्का होना इसकी उपयोगिता को बढ़ाने का प्रमुख कारण है। प्लास्टिक बोतलों और बर्तनों का पारदर्शी हानिरहित दिखने वाला आकार वास्तव में सैकड़ों हानिकारक सिंथेटिक रसायनों का भंडार है। ये रसायन प्लास्टिक को इसकी संरचना, लचीलापन और स्थायित्व प्रदान करते हैं, साथ ही अन्य गुण भी देते हैं – वही गुण जो प्लास्टिक को सदियों तक टिकाऊ बनाते हैं, जिससे यह प्रकृति में जमा होता है और टिका रहता है।
प्लास्टिक उपयोग में जितना टिकाऊ होता है, उतने ही टिकाऊ इसके दुष्प्रभाव होते हैं।
प्लास्टिक आज लोगों की जरूरत बन चुका है। आजकल लोगों के खाने के बर्तनों से लेकर पानी की बोतल, रसोईघर में सामान को स्टोर करने वाले डिब्बे और यात्रा के लिए बैग भी प्लास्टिक के होते हैं। मॉडर्न किचन में तो प्लास्टिक के आकर्षक दिखने वाले कंटेनरों ने अपनी जगह बना ली है। किचन में मौजूद ये प्लास्टिक के कंटेनर न सिर्फ देखने में सुंदर होते हैं, बल्कि इन्हें देखभाल की जरूरत भी कम होती है। इसलिए लोग अपनी सहूलियत के हिसाब से खुलकर प्लास्टिक के कंटेनर का इस्तेमाल करते हैं।
प्लास्टिक हमारे जीवन में इस तरह शामिल हो चुका है कि इसकी मौजूदगी अब हमारे खून में भी दर्ज होने लगी है। विभिन्न शोधों से पता चला है कि बच्चों से लेकर बड़ों के खून में माइक्रो प्लास्टक के कण मौजूद हैं।
यह कहना गलत नहीं होगा कि, अब प्लास्टिक से मानव का खून का रिश्ता बन चुका है।
आइए जानते हैं कि, प्लास्टिक हमारे पर्यावरण को दूषित करते हुए हमारे शरीर में किस तरह प्रवेश कर रहा है?
*आजकल प्लास्टिक से बनी विभिन्न वस्तुएं जैसे पानी के पाइप्स, टंकियां, विभिन्न कंटेनर, बोतल और बर्तनों का इस्तेमाल काफी बढ़ गया है।
*प्लास्टिक के पैकेजिंग मटेरियल ट्रांसपोर्टेशन और रख रखाव के दौरान खाद्य और पेय पदार्थों से घिस घिस कर उनमें मिल जाता है।
*पानी एवं अन्य पेय पदार्थों की बोतलों और कंटेनरों में धूप और गर्मी से भी प्लास्टिक लीच होकर इन पदार्थों में मिल जाता है।
*माइक्रोवेव में प्लास्टिक के बर्तनों में रखकर खाना गर्म करने पर भी तेजी से प्लास्टिक खाने में मिल जाता है।
*पानी की सप्लाई और स्टोर के लिए प्लास्टिक के पाइप और टंकियों से भी पानी में प्लास्टिक मिल जाता है, अधिक गर्मी के दौरान और धूप में यह प्रक्रिया तेज हो जाती है।
इस तरह हमारे खाने पीने की चीजों में प्लास्टिक कण शामिल होकर शरीर में प्रवेश कर जाते हैं।
*हवा में भी माइक्रोप्लास्टिक के कण शामिल होते हैं जो कई स्रोतों से उत्पन्न होते हैं, जैसे कि कपड़ा, यातायात, अपशिष्ट प्रबंधन, भवन और निर्माण कार्य, और औद्योगिक उत्सर्जन आदि से। हवा में मौजूद माइक्रोप्लास्टिक सांस के द्वारा हमारे शरीर में प्रवेश कर जाते हैं।
हाल के वर्षों में हुई शोधों में पाया गया है कि मनुष्य पहले की तुलना में बहुत अधिक मात्रा में माइक्रोप्लास्टिक को सांस के माध्यम से ग्रहण कर रहे हैं, खा रहे हैं और पी रहे हैं।
धीरे धीरे इन माइक्रो प्लास्टिक कणों की मात्रा हमारे खून में बढ़ती रहती है और शरीर के प्रमुख अंगों में जमा होकर कई तरह से हमारे स्वास्थ्य को हानि पहुंचाती हैं।
प्लास्टिक के कंटेनर कितने ही उपयोगी हों, या दिखने में कितने भी आकर्षक क्यों न लगे, लेकिन स्वास्थ्य के लिए बहुत ही ज्यादा नुकसानदायक होते हैं। विभिन्न शोधों के अनुसार प्लास्टिक हर तरह से सेहत के लिए नुकसानदायक ही साबित होता है। अधिकांश प्लास्टिक में बिस्फेनॉल ए (BPA) और फथलेट्स जैसे हानिकारक रसायन होते हैं। ये रसायन शरीर के हार्मोनल संतुलन को बिगाड़ सकते हैं, जिससे मधुमेह, प्रजनन संबंधी समस्याएं, मोटापा और यहां तक कि कैंसर जैसी घातक बीमारी हो सकती है। इन माइक्रो प्लास्टिक कणों को एंडोक्राइन डिसरप्टर (EDC) के नाम से भी जाना जाता है। क्योंकि इनका दुष्प्रभाव एंडोक्राइन सिस्टम पर सर्वाधिक होता है। प्लास्टिक निर्माण में 16,000 से अधिक रसायनों का उपयोग किया जाता है, और आजकल उपयोग किए जाने वाले 1,000 से अधिक औद्योगिक रसायन संदिग्ध एंडोक्राइन डिसरप्टर केमिकल (EDC) हैं।
आइए जानते हैं हमें प्लास्टिक के बर्तनों के हमारे स्वास्थ्य पर क्या दुष्प्रभाव हो सकते हैं?
विभिन्न शोधों के अनुसार, प्लास्टिक के बर्तन और कंटेनर का इस्तेमाल करने की वजह से कई बीमारियों का खतरा रहता है।
जैसे……
- प्लास्टिक का अंतःस्रावी तंत्र पर दुष्प्रभाव।
शोध के अनुसार, प्लास्टिक के पर्यावरण में प्रवेश करने से पहले, इसके अंदर के रसायन पानी की बोतलों और अन्य खाद्य कंटेनरों से निकलकर शरीर में प्रवेश कर सकते हैं और मानव स्वास्थ्य को खतरे में डाल सकते हैं। विशेष रूप से, प्लास्टिक में पाए जाने वाले अंतःस्रावी-विघटनकारी रसायन (EDC) होते हैं।
जैसा कि इनके नाम से पता चलता है, ये रसायन अंतःस्रावी (हार्मोन) प्रणाली पर दुष्प्रभाव डालते हैं।
बिस्फेनॉल (BPA), पॉलीफ्लोरोएल्काइल पदार्थ (PFAS), और फ़थलेट्स आदि प्रमुख EDC रसायन हैं, जो प्लास्टिक की वस्तुओं में पाए जाते हैं। ये इलेक्ट्रॉनिक्स से लेकर कालीन और पेंट से लेकर सौंदर्य प्रसाधनों तक, प्लास्टिक से बनी हर चीज में पाए जाते हैं।
इन सिंथेटिक EDC की संरचना और आकार कई हार्मोन जैसे एस्ट्रोजन, टेस्टोस्टेरोन और थायरॉयड हार्मोन के समान होता है। इसलिए एक बार जब वे शरीर के अंदर पहुंच जाते हैं, तो अंतःस्रावी तंत्र को अव्यवस्थित देते हैं। और विभिन्न हार्मोन संबंधी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है।
अधिकांश EDC लिपोफिलिक होते हैं, जिसका अर्थ है कि वे वसा के साथ मिल सकते हैं, इसलिए ये पसीने के साथ त्वचा के माध्यम से, और खाने के जरिए तेल और वसा के माध्यम से हमारे शरीर में प्रविष्ट हो जाते हैं।
आमतौर पर शरीर का अंतःस्रावी तंत्र अच्छी तरह से एक मशीन की तरह काम करता है। यह तंत्र चरणों की एक श्रृंखला शुरू करता है जहां अंतःस्रावी ग्रंथियां पूरे शरीर में फैले रिसेप्टर्स तक पहुंचने के लिए सटीक समय पर सटीक मात्रा में कुछ हार्मोन निर्मित करती हैं। वह सटीकता जरूरत के हिसाब से किसी रसायनिक क्रिया को ट्रिगर करने या रोकने के लिए महत्वपूर्ण होती है। लेकिन सिंथेटिक EDC इस सामान्य कार्यप्रणाली की नकल करते हैं, और इसे बाधित करते हैं, या बढ़ा देते हैं।
“यदि आप शरीर में किसी ऐसे रसायन को प्रवेश कराते हैं, जो वहां नहीं होना चाहिए, तो यह एक रिसेप्टर को सक्रिय कर सकता है, जिससे संकेतों का ऐसा क्रम शुरू हो सकता है, जो उस समय नहीं होना चाहिए।”
इस दोषपूर्ण संकेत का प्रभाव गंभीर और खतरनाक हो सकता है क्योंकि अंतःस्रावी तंत्र प्रजनन से लेकर विकास, चयापचय, प्रतिरक्षा और मस्तिष्क के विकास तक सब कुछ नियंत्रित करने में मदद करता है।
गर्भावस्था और भ्रूण और शिशु विकास की अवधि को EDC के प्रभावों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील माना जाता है। इससे कई प्रजनन संबंधी परेशानियां, भ्रूण विकास, और शिशु विकलांगता होने का खतरा बढ़ जाता है।
- डायबिटीज और मोटापा..
प्लास्टिक के बर्तनों का अधिक इस्तेमाल करने से डायबिटीज का खतरा बढ़ जाता है। दरअसल, प्लास्टिक को बनाने के लिए ऐसे रसायनों का इस्तेमाल होता है, जो शरीर में ब्लड शुगर का लेवल तेजी से बढ़ता है। जो लोग प्लास्टिक के बर्तनों का ज्यादा इस्तेमाल करते हैं, उन्हें डायबिटीज का खतरा ज्यादा रहता है। कुछ EDCs ग्लूकोज बनाने वाले एंजाइम को बढ़ाते हैं, और इंसुलिन स्रावित करने की पैंक्रियाज की क्षमता को कम करते हैं
ओबेसोजेन्स ऐसे रसायन हैं जो शरीर में प्रवेश कर सामान्य लिपिड चयापचय को बाधित कर सकते हैं, जिससे मोटापा हो सकता है।
डायबिटोजेन्स ऐसे रसायन हैं जो शरीर में प्रवेश कर β-कोशिकाओं को मार सकते हैं या उनके कार्य को बाधित कर सकते हैं तथा सामान्य मेटाबॉलिज्म में बाधा उत्पन्न कर सकते हैं, जिससे मधुमेह हो सकता है
जब EDCs हार्मोन और उनके रिसेप्टर्स के बीच कनेक्शन को ब्लॉक करते हैं, तो वे एंडोक्राइन सिस्टम के उन हिस्सों को “रीप्रोग्राम” करते हैं जो मेटाबॉलिज्म, ऊर्जा संतुलन और भूख को नियंत्रित करते हैं। EDCs ग्लूकोज (चीनी) के प्रति संवेदनशीलता और लिपिड (वसा अम्ल) के मेटाबॉलिज्म को बदल देते हैं, जो मोटापे का बड़ा कारण है।
थायरॉयड ग्रंथि द्वारा उत्पादित हार्मोन शरीर की कोशिकाओं के दैनिक चयापचय को नियंत्रित करते हैं। प्लास्टिक के साथ सौंदर्य प्रसाधन और सुगंधित पदार्थ, औद्योगिक अपशिष्ट और कीटनाशकों में पाए जाने वाले EDC थायरॉयड की सामान्य प्रक्रियाओं को बाधित कर सकते जिससे दैनिक मेटाबॉलिज्म विकृत होकर मोटापे का कारण बनते हैं। पो
अध्ययनों से पता चला है कि कुछ EDC शरीर की भूख पर नियंत्रण में बाधा डालते हैं और फैट टिश्यू में फैट भंडारण को बढ़ाते हैं, जैसे कि एल्युमीनियम के डिब्बे से लेकर पानी की बोतलों तक कई उपभोक्ता उत्पादों में पाया जाने वाला रासायनिक BPA। कई शोधों में पाया गया है कि गर्भ में BPA के संपर्क में आने से जीवन में बाद में मोटापा हो सकता है।
- अस्थमा
जिन लोगों को सांस से जुड़ी बीमारी है या किसी को सांस लेने में तकलीफ होती है। ऐसे लोगों के लिए प्लास्टिक से बनीं चीजों का इस्तेमाल करना ज्यादा खतरनाक है। प्लास्टिक से बनीं वस्तुओं में फेथलेट रसायन पाया जाता है। यह रसायन अस्थमा का मुख्य कारण बनता है। डॉक्टर के अनुसार इस फैथलेट के कारण सांस की नली में सूजन का खतरा भी होता है। - ब्लड प्रेशर और हृदय रोग .
प्लास्टिक में बिस्फेनॉल ए (बीपीए) जैसे केमिकल का उपयोग अधिक मात्रा में किया जाता है। बीपीए के कारण एस्ट्रोजन हार्मोन प्रभावित होता है। इससे ब्लड प्रेशर और हृदय रोग का खतरा बढ़ जाता है। साथ ही माइक्रो प्लास्टिक कण हमारी रक्तवाहिकाओं में जमा होकर एथेरोस्क्लेरोसिस को बढ़ाने का काम करते हैं, जिससे रक्त वाहिकाएं अवरुद्ध हो सकती हैं जिससे गंभीर हृदय रोगों का खतरा बढ़ जाता है। - कैंसर
कैंसर के ऐसे कई मामले देखे गए हैं जिनमें रोगी कम उम्र का होने के साथ, उन्होंने कभी गुटका, सिगरेट ,पान व शराब का सेवन नहीं किया था। खुशहाल जीवन के साथ कभी कोई बड़ी बीमारी नहीं हुई। फिर अचानक से तबियत बहुत बगड़ने पर जांच में कैंसर जैसी बड़ी बीमारी होना पाया गया। और बहुत महंगे इलाज के बाद इनमें से कई मरीजों की मृत्यु हुई।
इस विषय पर रिसर्च में पाया गया कि, इन मामलों से पीड़ित सभी लोग हमेशा प्लास्टिक बोतल से पानी पिया करते थे, प्लास्टिक के बर्तनों में गर्म खाना, और चाय आदि का सेवन करना इनका आम रूटीन रहा था।
अक्सर देखा गया है लोग प्लास्टिक की थैलियों में दुकान से गरम चाय गरम सब्जी या अन्य समान मंगवाते हैं, और वही खाते पीते रहते हैं। यही धीरे धीरे आपके शरीर में कैन्सर का कारण बनाता है।
इसके अलावा माइक्रोप्लास्टिक कण और इसके साथ पाए जाने वाले हानिकारक रसायन एंडोक्राइन डिसरप्टर (EDC) के रूप में एवं अन्य रूप से विभिन्न गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं पैदा करते हैं।
प्लास्टिक हमारे जीवन और पर्यावरण का ऐसा हिस्सा बन चुका है कि इससे दूर रह पाना या बच पाना बहुत कठिन हो गया है। पर फिर भी हमें इसका कम से कम स्तेमाल करने का प्रयत्न करना चाहिए। खास तौर से हमें अपनी खाने पीने की चीजों के लिए प्लास्टिक के बर्तनों का उपयोग बंद ही कर देना चाहिए। इस तरह जहां जहां प्लास्टिक का उपयोग रोक सकें रोकना चाहिए, जिससे इसके दुष्प्रभावों से बचा जा सके।
