लिपिड प्रोफाइल टेस्ट

शरीर को अपनी विभिन्न कार्य प्रणालियों के लिए वसा (Lipids) की ज़रूरत होती है। स्नायु तंत्र (Nervous System) ख़ासकर दिमाग़ की कार्यप्रणाली के लिए वसा की अहम भूमिका रहती है। शरीर को कई हार्मोन बनाने के लिए कोलेस्ट्रॉल (Cholesterol) चाहिए। शरीर की लगभग सभी कोशिकाओं (Cell) की बाहरी दीवार में भी वसा रहती है।
वसा (Lipids) के दो प्रकार के होते हैं :–
(1) ट्राइग्लिसराइड (Triglyceride)
(2) कोलेस्ट्रॉल (Cholesterol)

ट्राइग्लिसराइड में एक ग्लिसरॉल की रीढ़ होती है जिस पर तीन फैटी एसिड लगे होते हैं। इन फैटी एसिड के प्रकार के अनुसार हम सैचुरेटेड या अनसैचुरेटेड (Saturated or Unsaturated) वसा को वर्गीकृत करते हैं।
दूसरी ओर कोलेस्ट्रॉल एक षट्कोणीय अणु होता है, जिसके कोणों पर लगे रासायनिक समूहों में परिवर्तन द्वारा कई नए रसायन और हार्मोनों का निर्माण शरीर करता है।
तो इस प्रकार हम देखते हैं कि लिपिड दो प्रकार के होते हैं और ये दोनों ही शरीर की सभी कोशिकाओं की ज़रूरत हैं। इन्हें शरीर के सभी भागों में खून द्वारा पहुँचाया जाता है। पर यहाँ समस्या यह आती है कि वसा पानी में अघुलनशील है और खून का आधार पानी ही है।
खून में वसा को लाने-ले जाने के लिए एक विशेष व्यवस्था प्रकृति ने कर रखी है। इसमें लिपिड व प्रोटीन को मिलाकर छोटे-छोटे पैकेट बनाए जाते हैं जो वसा को लाने-ले जाने के लिए वाहन का काम करते हैं। इन पैकेटों को लाइपोप्रोटीन कहते हैं और ये मुख्य रूप से लिवर में बनाए जाते हैं।
हम जो भी वसा का सेवन करते हैं (तेल, घी, चर्बी व अनाज आदि में न दिखने वाली) वह आँतों में पचकर पहले लिवर में पहुँचती है। यहाँ उसकी पैकेजिंग कर उसे लाइपोप्रोटीन में रखा जाता है और खून में छोड़ दिया जाता है।

भोजन में कोलेस्ट्रॉल के मुख्य स्रोत गैर-शाकाहारी भोजन ही हैं जैसे दूध व दूध से बने पदार्थ (Dairy Products), अंडे का पीला भाग व मांस। जबकि ट्राइग्लिसराइड सभी प्रकार के वनस्पति तेलों, अनाज, घी, मक्खन एवं चर्बी युक्त मांसाहारी भोजन से प्राप्त होता है। शरीर स्वयं भी कोलेस्ट्रॉल बनाता है।
खून में वसा को ले जाने वाले लाइपो-प्रोटीन कई प्रकार के होते हैं। इनका वर्गीकरण (Classification) इनके घनत्व (Density) के अनुसार होता है। इनका घनत्व इनमें मौजूद कोलेस्ट्रॉल, ट्राइग्लिसराइड व प्रोटीन के अनुपात के अनुसार बदलता है।
मुख्य रूप से लाइपोप्रोटीन तीन प्रकार के होते हैं :–
1- LDL कोलेस्ट्रॉल (Low Density Lipoprotein – Cholesterol)
2- HDL कोलेस्ट्रॉल (High Density Lipoprotein – Cholesterol)
3- VLDL कोलेस्ट्रॉल (Very Low Density Lipoprotein – Cholesterol)
विभिन्न प्रकार के लाइपोप्रोटीन शरीर में अलग-अलग काम करते हैं। LDL कोलेस्ट्रॉल (LDL-C) का मुख्य काम कोलेस्ट्रॉल व ट्राइग्लिसराइड को ले जाकर शरीर के विभिन्न अंगों व खून की नलियों में छोड़ना है। ये उस प्रकार के ट्रक हैं जो माल (कोलेस्ट्रॉल) ले जाकर गंतव्य पर गिरा आते हैं।
यही वे वाहन हैं जो दिल व दिल की नलियों में भी कोलेस्ट्रॉल जमा कर देते हैं जो आगे जाकर नलियों को चोक कर हार्ट अटैक का खतरा पैदा कर देते हैं। इसी कारण LDL कोलेस्ट्रॉल को खतरनाक कहा जाता है। इसके खून में बढ़ने पर इसे कम करना अत्यंत आवश्यक है और इसके लिए दवाइयाँ लेनी ही चाहिए।

दूसरी ओर HDL कोलेस्ट्रॉल लाइपोप्रोटीन का काम शरीर के विभिन्न ऊतकों (Tissues) और खून की नलिकाओं में जमा कोलेस्ट्रॉल व ट्राइग्लिसराइड को निकाल कर वापस लाने का है। ये नगर निगम के उन ट्रकों जैसे हैं जो कूड़ा-कर्कट उठा कर शहर की सफाई में महत्वपूर्ण योगदान करते हैं।
तो यह साफ है कि यदि HDL कोलेस्ट्रॉल लाइपोप्रोटीन अधिक होगा तो धमनियों की सफाई अच्छे से होती रहेगी और हार्ट-अटैक व पैरालिसिस होने का खतरा कम हो जाएगा। परंतु यदि यह कम हो तो इन बीमारियों का खतरा बढ़ जाएगा।
लिपिड प्रोफाइल टेस्ट से हम खून में मौजूद वसा व लाइपोप्रोटीन की मात्रा की जाँच करते हैं। इस टेस्ट को लिपिडोग्राम भी कहते हैं। सामान्यतः इस टेस्ट में खून में मौजूद कोलेस्ट्रॉल एवं ट्राइग्लिसराइड (स्वतंत्र तथा लाइपोप्रोटीन में मौजूद) की मात्रा तथा विभिन्न लाइपोप्रोटीनों की मात्रा का पता लगाया जाता है।
लिपिड प्रोफाइल टेस्ट से किसी व्यक्ति में हृदय रोग या पैरालिसिस होने के खतरे का काफ़ी सही अनुमान लगाया जा सकता है। साथ ही खून में वसा कम करने वाली दवाइयों के सही चयन के लिए भी यह टेस्ट बहुत ज़रूरी है।
मधुमेह के मरीजों, जिन्हें हार्ट-अटैक व पैरालिसिस का खतरा पहले से ही बहुत बढ़ा हुआ रहता है, यह टेस्ट बहुत ज़रूरी है। शोध द्वारा पता चला है कि अकेले शुगर कंट्रोल से मधुमेही मरीजों में हार्ट-अटैक का खतरा बहुत ज़्यादा कम नहीं किया जा सकता।
इसके लिए कोलेस्ट्रॉल और बी.पी. कंट्रोल करना ज़्यादा ज़रूरी माना गया है।

किसे कराना चाहिए लिपिड प्रोफाइल टेस्ट?
● सभी मधुमेह के रोगियों को साल में दो बार।
● यदि आप मेटाबोलिक सिंड्रोम के दायरे में हैं।
● यदि आपको हाई बी.पी. है।
● यदि आपको इस्केमिक हृदय रोग है।
● यदि आप मोटे हैं और तीस साल की उम्र पार कर चुके हैं।
● उन सभी व्यक्तियों को जिनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि में मधुमेह, हृदय रोग, हाई बी.पी. या कोलेस्ट्रॉल की गड़बड़ी है।
● यदि आपको धूम्रपान की लत है।
● यदि आपकी जीवनशैली शारीरिक श्रम रहित और तनावपूर्ण है।
उपरोक्त सभी व्यक्तियों को साल में दो बार लिपिड प्रोफाइल टेस्ट अवश्य करना चाहिए।

लिपिड प्रोफाइल टेस्ट कराते समय क्या ध्यान रखें?
आजकल पैथोलॉजी टेस्ट करने वाली लैब की बाढ़-सी आ गई है, जिनमें से कई टेस्ट की गुणवत्ता पर ध्यान नहीं देतीं। आइए देखें क्या बातें ध्यान देने की हैं।
लिपिड प्रोफाइल टेस्ट रात के 8–10 घंटे खाली पेट रहने के बाद सुबह 7–9 बजे कराना चाहिए। भारी वसा युक्त भोजन व शराब पीने के बाद खून में वसा खासकर ट्राइग्लिसराइड की मात्रा 10 से 12 घंटे तक बढ़ी रह सकती है।
यदि आपके कोलेस्ट्रॉल और अन्य वसा के प्रकार बढ़े हुए आते हैं तो इसका एक महत्वपूर्ण कारण थायरॉयड हार्मोन की कमी (Hypothyroidism) भी हो सकता है। ऐसी अवस्था में थायरॉयड के इलाज से ही लिपिड प्रोफाइल की गड़बड़ी कुछ ही हफ्तों में ठीक हो सकती है।

यदि हम हार्ट अटैक के खतरे और इलाज की दृष्टि से देखें तो सबसे महत्वपूर्ण है खून में LDL कोलेस्ट्रॉल की मात्रा। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि अधिकतर लैब LDL कोलेस्ट्रॉल को मापती नहीं हैं, बल्कि एक फॉर्मूला का प्रयोग कर अनुमानित मात्रा निकाल देती हैं।
यह फॉर्मूला निम्नानुसार है :–
● LDL Cholesterol = Total Cholesterol – (HDL Cholesterol + VLDL Cholesterol)
● VLDL Cholesterol = Triglyceride / 5
यदि ट्राइग्लिसराइड की मात्रा 300 mg/dl से अधिक हो तो यह फॉर्मूला सही अनुमान नहीं देता। LDL कोलेस्ट्रॉल को सीधे मापना महँगा टेस्ट है।
आप लैब से यह अवश्य जाँच करें कि वे Direct LDL – Cholesterol टेस्ट कर रहे हैं या नहीं। आपके डॉक्टर आपके LDL कोलेस्ट्रॉल को केंद्र बिंदु बनाकर ही दवा का निर्धारण करते हैं।

रिपोर्ट का क्या अर्थ है?
जैसा कि हम पहले ही कह चुके हैं कि इस टेस्ट से हम हृदय रोग खासकर हार्ट अटैक और ब्रेन अटैक (पैरालिसिस) के खतरे का अनुमान लगाने व रोकथाम के लिए इलाज की नीति बनाने में मदद करते हैं।
यदि आप मधुमेह के मरीज हैं तो आपके LDL कोलेस्ट्रॉल का स्तर 100 mg/dl से कम रहना चाहिए। यदि यह इससे अधिक है तो दवाइयों द्वारा इसे 100 से नीचे लाना चाहिए।
स्टैटिन ग्रुप की दवाइयाँ इसमें बहुत कारगर हैं और इनके प्रयोग से हार्ट अटैक का खतरा लगभग 50% तक कम हो जाता है।
ताज़ा शोधों में यह कहा गया है कि यदि मधुमेही व्यक्ति को हृदय रोग हो चुका है या वह धूम्रपान करता है या उसे हाई बी.पी. भी है तो LDL कोलेस्ट्रॉल को 70 mg/dl से भी नीचे रखना चाहिए।

HDL कोलेस्ट्रॉल को दिल का दोस्त कहा जाता है। इसका बढ़ा हुआ होना आपको हार्ट अटैक से बचाता है। इसकी मात्रा पुरुषों में 40 mg/dl से अधिक होनी चाहिए तथा महिलाओं में 50 mg/dl से अधिक होनी चाहिए। नियमित व्यायाम HDL कोलेस्ट्रॉल को बढ़ाने का अच्छा उपाय है। भोजन में ओमेगा–3 फैटी एसिड की मात्रा बढ़ाने से भी HDL कोलेस्ट्रॉल बढ़ता है। इसके लिए भोजन में मछली, सूखे मेवे और सरसों के तेल का प्रयोग करना उपयुक्त होगा। धूम्रपान या तंबाकू का सेवन HDL कोलेस्ट्रॉल को कम करता है। मधुमेह में ट्राइग्लिसराइड की मात्रा खून में अधिकतर बढ़ी हुई पाई जाती है। खून में ग्लूकोज़ पर अच्छा नियंत्रण रखने से यह अपने आप कम हो सकती है। ट्राइग्लिसराइड का बढ़ा होना भी हृदय रोग का खतरा बढ़ाता है।

जब ट्राइग्लिसराइड का स्तर 500 mg/dl से ऊपर हो जाता है तो पैंक्रियाज में सूजन आ सकती है जिससे पैंक्रियाटाइटिस नामक खतरनाक बीमारी भी हो सकती है। शराब के सेवन से ट्राइग्लिसराइड की मात्रा बढ़ जाती है। ट्राइग्लिसराइड को कम करने के लिए फेनोफाइब्रेट नामक दवा का प्रयोग किया जाता है। हार्ट अटैक के खतरे (Risk Factor) का अनुमान लगाने का एक और फॉर्मूला है :–
Total Cholesterol ÷ HDL Cholesterol
यदि यह 5 से अधिक आता है तो खतरा बहुत ज़्यादा है। परंतु LDL कोलेस्ट्रॉल की मात्रा का हृदय रोग से सबसे अधिक संबंध होता है।
तो दोस्तों आज हमने आपको लिपिड प्रोफाइल जाँच की विस्तृत जानकारी देने का प्रयास किया। यदि आप मधुमेह के रोगी हैं और आपके दिल में दिल का ज़रा भी ख़याल है तो ज़रूर साल में दो बार यह जाँच कराएँ।

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