हृदय रोग विशेषज्ञ से बातचीत

डॉ. स्कंद कुमार त्रिवेदी , वरिष्ठ हृदय रोग विशेषज्ञ, D M CARDIOLOGY

इस लेख में प्रस्तुत हैं देश के प्रसिद्ध कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. स्कंद कुमार त्रिवेदी जी से बातचीत के कुछ अंश। डॉ. त्रिवेदी भोपाल के प्रसिद्ध बंसल हॉस्पिटल के कार्डियोलॉजी विभाग के प्रमुख है, एवं मध्यप्रदेश के कई गंभीर हृदय रोगियों के जीवन रक्षक बने हुए हैं।

आइए जानते हैं डॉ. त्रिवेदी जी द्वारा हृदय रोगियों के लिए बताई गई महत्वपूर्ण जानकारी एवं सलाह…

प्रश्न :- डॉ. साहब हम अक्सर सुनते हैं, कि किसी को हार्ट-अटैक हो गया या किसी की मृत्यु हार्ट-अटैक कि वजह से हो गई। यह हार्ट-अटैक क्या होता है? और क्या यह सचमुच जानलेवा हो सकता है?


डॉ. त्रिवेदी :- हार्ट या दिल माँसपेशियों से बना एक पम्प है, जो सारे शरीर में रक्त प्रवाह का संचालन करता है। शरीर के सभी अंगों को जीवित रहने के लिए एवं सुचारू रूप से कार्य करने के लिए ऑक्सीजन, ग्लूकोज़ व कई अन्य महत्वपूर्ण तत्वों कि निरंतर जरूरत रहती है। यह सभी खून द्वारा ही विभिन्न अंगों को पहुँचाये जाते हैं। इस प्रकार हम देखते हैं कि जीवित रहने का आधार निरन्तर रक्त प्रवाह ही है। इस रक्त प्रवाह को निरन्तर जारी रखने का काम जो पम्प करता है वह दिल ही है। हृदय को काम करने के लिए स्वयं ऑक्सीजन एवं ग्लूकोज कि ज़रूरत होती है। हृदय की माँसपेशियों में खून पहुँचाने का काम कोरोनरी आर्टरीज़ (Coronary Arteries) नामक रक्त नलिकाएँ करती हैं। यह कोरोनरी नलिकाएँ यदि किसी कारणवश चोक हो जाएँ एवं हृदय कि मासपेशियों को खून पहुँचना बन्द हो जाए तो ऐसी स्थिति को “हार्ट-अटैक” कहते हैं। ऐसी स्थिति में मरीज को छाती में तीव्र दर्द होता है। बेचैनी एवं घबराहट महसूस होती है तथा पसीना भी आता है। यदि हृदय के बड़े भाग में खून पहुँचना बंद हो जाये तो वहाँ की माँसपेशियाँ निष्क्रिय हो जाती हैं। इससे हृदय खून पम्प नहीं कर पाता और मरीज का ब्लड प्रेशर गिरने लगता है, एवं उसकी मृत्यु भी हो सकती है। सही समय पर इलाज न मिलने से हार्ट-अटैक के बाद लगभग 15% मरीजों की मृत्यु कुछ ही घंटों में हो सकती है। समय से उचित इलाज करने पर इस मृत्यु दर को लगभग आधा किया जा सकता है। आप सोच रहे होंगे कि कोरोनरी रक्त नलिकाओं में रुकावट क्यों आ जाती है। लगातार ब्लड प्रेशर के बढ़े रहने से यह नलिका सख्त व मोटी हो जाती है। कोलेस्ट्राल के बढ़े रहने से इनकी अंदरूनी सतह पर वसा के थक्के जम जाते हैं एवं मधुमेह में शुगर बढ़े होने से इन्हीं के ऊपर खून के थक्के भी जमने लगते हैं। यहीं सब प्रक्रियाएँ धीरे-धीरे नलिकाओं को सिकोड़ देती हैं। ऐसी किसी भी जगह पर एकाएक खून के जम जाने से नलिकाएं पूरी तरह चोक हो जाती हैं, एवं मरीज को “हार्ट-अटैक” हो जाता है।
यदि “हार्ट-अटैक” होने के 3-4 घंटे के अंदर ही खून के थक्के घुलने कि दवाईयाँ मरीज को दी जायें तो रुकावट दूर की जा सकती है, एवं हृदय कि माँसपेशियों को बचाया जा सकता है।

प्रश्न :- एंजाइना एवं हार्ट-अटैक में क्या फर्क है?

डॉ. त्रिवेदी :- हार्ट-अटैक में कोरोनरी नलिका पूरी तरह चोक हो जाती है। परन्तु यदि यह रुकावट आंशिक हो तो इसे एन्जाइना कहते हैं। यदि रुकावट आंशिक है, तो दिल की मांसपेशियों को अधिक कार्य करने पर खून की कमी महसूस होने लगती है। ऐसे में मरीज को अधिक दूर तक चलने, सीढ़ी चढ़ने आदि से छाती में दर्द, बेचैनी, पसीना एवं साँस फूलना आदि महसूस होता है, परन्तु आराम करने पर उसे ठीक लगने लगता है। इस प्रकार हम देखते है कि एन्जाइना में माँसपेशियों में खून की कमी अस्थायी होती है एवं माँसपेशियों में कोई स्थायी खराबी नहीं होती। दूसरी तरफ हार्ट-अटैक में माँसपेशियाँ हमेशा के लिए मृत हो सकती हैं। एन्जाइना का अटैक ज्यादा से ज्यादा 10-20 मिनिट के लिए होता है। यदि दर्द 20 मिनिट से अधिक समय के लिए बना रहे, तो यह हार्ट-अटैक का लक्षण हो सकता है।

प्रश्न :- हार्ट-अटैक के प्रमुख लक्षण क्या हैं? क्या मधुमेह रोगी मरीजों में लक्षण अलग हो सकते हैं?

डॉ. त्रिवेदी :- आमतौर पर हार्ट-अटैक के प्रमुख लक्षण सीने के बीचों-बीच तीव्र दर्द होना एवं पसीना आना है। यह दर्द बायें हाथ में जबड़ों में, दोनों हाथों में एवं कंधों में, भी महसूस किया जा सकता है। अधिकांश मरीजों में घबराहट, चक्कर, जी मचलाना या उल्टी होना जैसे लक्षण भी साथ हो सकते हैं। कुछ मरीज दर्द को पेट के ऊपरी भाग में भी महसूस करते हैं। जिसे एसिडिटी समझ कर नज़र अंदाज कर देते हैं। कई मरीजों को साँस लेने में दिक्कत हो सकती है। ब्लड प्रेशर के अधिक गिर जाने पर मरीज बेहोश भी हो सकता है।
मधुमेह के मरीजों में न्युरोपैथी कि वजह से कई बार सीने में दर्द महसूस नहीं होता और ना ही इन मरीजों को, एन्जाइना का दर्द महसूस होता है। ऐसी स्थिति में हार्ट-अटैक के निदान एवं उपचार में देरी हो सकती है। मधुमेह के मरीज अक्सर बेचैनी घबराहट चक्कर एवं उल्टी जैसे लक्षण के साथ अस्पताल आते हैं। जहाँ ई.सी.जी. करने पर मालूम पड़ता है कि उन्हें हार्ट-अटैक हो गया है।

प्रश्न :- डॉ. साहब यह सभी लक्षण शुगर कम हो जाने पर भी हो सकते हैं? मरीज यह कैसे पहचाने कि उन्हें हाइपोग्लाइसीमिया है या हार्ट-अटैक?

डॉ. त्रिवेदी :- आपने बिल्कुल सही कहा कि दोनों स्थितियों के लक्षणों में काफी समानता होती है। यदि मरीज के पास ग्लूको-मीटर है, तो वे स्वयं अपनी शुगर चैक कर सकते हैं। नहीं तो मरीज 3-4 चम्मच शक्कर खालें। यदि मरीज के लक्षणों में शक्कर खाने से तेजी से सुधार नहीं होता तो यह लक्षण हार्ट-अटैक के हो सकते हैं।

प्रश्न :- क्या यह सही है, कि मधुमेह के मरीजों में हार्ट-अटैक का खतरा ज्यादा होता है?

डॉ. त्रिवेदी :- जी हाँ, मधुमेह के मरीजों में हार्ट-अटैक होने का खतरा गैर मधुमेह लोगों से 3-4 गुना ज्यादा होता है। टाइप-2 मधुमेह में हाई बी.पी. एवं कोलेस्ट्राल कि गड़बड़ी अधिकांश मरीजों में देखी जाती है। यह 3 चीजें मिलकर मधुमेह रोगी मरीजों में हार्ट-अटैक का खतरा कई गुना बढ़ा देती हैं। हार्ट-अटैक के अलावा मधुमेह के मरीजों में दिमाग को खून ले जाने वाली नलियों के चोक होने पर पैरालिसिस (लकवा) होने का खतरा भी ज्यादा रहता है। इसी प्रकार पैरों के रक्त नलिकाओं कि रुकावट के कारण गैंगरीन होने का खतरा भी ज्यादा रहता है।

प्रश्न :- मधुमेह के अलावा और कौन-सी परिस्थितियाँ हार्ट-अटैक से खतरे को बढ़ाती हैं?

डॉ. त्रिवेदी :-
हार्ट-अटैक की संभावनाओं को बढ़ाने वाली स्थितियाँ (RISK FACTOR) –
हाई बी.पी. (हाइपरटेंशन)
मधुमेह
खून में वसा के अनुपात में गड़बड़ी
मोटापा
व्यायाम की कमी
धूम्रपान या तम्बाखू का सेवन
गरिष्ठ एवं वसा युक्त भोजन
अनुवांशिकता-खून के रिश्ते में मधुमेह, हाई बी.पी. या हृदय रोग का होना
पेट पर वसा कि अधिक मात्रा (तोंद)
मानसिक तनाव / मनोरंजन की कमी

प्रश्न :- यदि ऑफिस में किसी को सीने दर्द होने लगे और हार्ट-अटैक का अंदेशा हो तो उसके साथियों को क्या करना चाहिए?

डॉ. त्रिवेदी :- मरीज को हवादार जगह पर लेटा कर पूर्ण आराम कराना चाहिए
300 एम.जी. कि ऐस्प्रिन कि गोली मरीज को मुँह से दें।
यदि उपलब्ध हो तो एक सॉरबिट्रेट कि गोली जुबान में नीचे रख चूसने को कहें।
बिना देर किये मरीज को ऐसे अस्पताताल पहुँचायें, जहाँ हृदय रोग विभाग एवं (ICCU) गहन हृदय रोग चिकित्सा इकाई हो।
मरीज को ले जाते समय इस बात का ध्यान रखें कि मरीज को स्वयं सीढ़ी चढ़ना-उतरना न पड़े, न ही चलना पड़े।
यदि संभव हो तो सुसज्जित एम्बुलेंस द्वारा ही मरीज को अस्पताल पहुँचायें।

प्रश्न :- अस्पताल में हार्ट-अटैक का ईलाज कैसे करते हैं? सामान्य रूप से मरीज को कितने दिन तक अस्पताल में रखते हैं?

डॉ. त्रिवेदी :- यदि मरीज के सीने में दर्द उठने के बाद चार-छः घंटे में अस्पताल पहुँच जाता है तो उपचार का मुख्य सिद्धांत बंद कोरोनरी नलिका की रुकावट दूर कर हृदय की माँसपेशियों को मृत होने से बचाना होता है। खून के थक्के, जिससे रुकावट आयी है को घोलने के लिये कई दवाईयाँ हैं, जैसे एस्प्रिन, क्लोपिडोग्रेल और नस में इंजेक्शन से दी जाने वाली स्ट्रेप्टोकाइनेज व यूरोकाइनेज। कोरोनरी नलिका को चौड़ी करने वाली दवाईयाँ जो नाइट्रेट ग्रुप में आती है। (जैसे सारबिट्रेट) भी दी जाती हैं, इन्हें मुँह में जीभ के नीचे रख कर चूसने को दिया जा सकता है एवं नस में ड्रिप से भी। जिन अस्पतालों में कैथ लैब की सुविधा हो वहाँ मरीज की इमरजेंसी एंडियोप्लास्टी कर भी रुकावट को दूर किया जा सकता है।
अस्पताल पहुँचते ही मरीज को पूर्ण आराम के लिये गहन चिकित्सा इकाई में रखा जाता है। उसे दर्द कम करने के इंजेक्शन दिये जाते हैं।

यदि मरीज बहुत तनाव में है या डरा हुआ है तो उसे तनाव कम करने व नींद की दवाईयाँ भी दी जाती हैं। दिल की माँसपेशियों का नुकसान कम-से-कम हो इसके लिये यह जरूरी है कि मरीज के दिल को कम-से-कम काम करना पड़े। अतः पूर्ण आराम आवश्यक होता है साथ-ही-साथ मरीज की ऑक्सीजन भी दी जा सकती है। हार्ट-अटैक के बाद मृत्यु का एक बड़ा कारण दिल की गाति में गड़बड़ होना है। इसीलिये मरीज की हृदय गति पर मानिटर के जरिये निरंतर निगरानी रखी जाती है व जरुरत पड़ने पर गति नियमित रखने की दवाएँ भी दी जाती हैं।
आधुनिक चिकित्सा में हार्ट-अटैक के तुरंत बाद कोरोनरी एंजियोप्लास्टी से रुकावट दूर कर दिल को पूरी तरह बचा लेने पर ज्यादा जोर दिया जा रहा है। यदि कोई बड़ा विकार न आये तो हार्ट-अटैक के बाद 6-7 दिन में मरीज घर जा सकता है।

प्रश्न :- कोरोनरी एंजियोप्लास्टी क्या है? क्या हार्ट-अटैक के बाद सभी मरीजों को यह करवानी पड़ती है?

डॉ. त्रिवेदी :- दिल की कोरोनरी नलिकाओं में आयी गड़बड़ी या रुकावट को जानने के लिये एक महीन ट्यूब को पैर या हाथ की धमनियों की मार्फत हम कोरोनरी नलिकाओं तक ले जा सकते हैं। इस ट्यूब द्वारा एक विशेष डाई डाल कर हम कोरोनरी नलिकाओं में रक्त प्रवाह को निरंतर एक्स-रे मॉनीटर पर देख सकते हैं। इससे रुकावट व उसके सही स्थान का पता चल जाता है। इस प्रक्रिया को एंजियोग्राफी कहते हैं। कोरोनरी नलिकाओं में रुकावट वाली जगह उसी ट्यूब के माध्यम से एक गुब्बारा (Baloon) पहुँचाया जाता है, जिसे फुलाकर रुकावट को खोल दिया जाता है एवं कोरोनरी नलिका को चौड़ा कर दिया जाता है। इस प्रक्रिया को एंजियोप्लास्टी कहते हैं। इस प्रक्रिया में कोई चीरा-फाड़ी या टाँकों की जरूरत नहीं होती। रुकावट खोलने के बाद उस स्थान पर एक धातु कि जाली का छल्ला (STENT) भी लगाया जाता है, जिससे नलिका उस स्थान पर फिर से बंद ना हो जाये।


हार्ट-अटैक के बाद सभी मरीजों को एंजियोप्लास्टी की जरूरत नहीं होती। कुछ विशेष जाँचों के बाद विशेषज्ञ यह निर्णय लेते हैं, कि किस मरीज में एंजियोप्लास्टी कि जरूरत है या फिर उन्हें दवाईयाँ ही दी जायें। कुछ लोगों को बायपास ऑपरेशन की भी जरूरत पड़ सकती है।

प्रश्न :- बायपास ऑपरेशन के बारे में कुछ बतायें। यह किन परिस्थितियों में जरूरी हो जाता है?

डॉ. त्रिवेदी :- यह एक जटिल शल्य क्रिया है, जिसमें बंद कोरोनरी नलिकाओं में रुकावट के आगे दूसरी धमनियों या नसों द्वारा जोड़ कर रक्त प्रवाह फिर से शुरू कर दिया जाता है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में यह ऑपरेशन अब बहुत सुरक्षित हो गया है और इसमें मृत्यु की संभावना पेट पर किये जाने वाले किसी भी दूसरे ऑपरेशन जैसी ही है। अक्सर बायपास ऑपरेशन तभी किया जाता है जब एंजियोप्लास्टी द्वारा रुकावट को दूर नहीं किया जा सके या अनेक जगह रुकावट हो। कई विशेषज्ञों का मानना है कि बायपास आपरेशन मधुमेह रोगी मरीजों में एंजियोप्लास्टी से अच्छा विकल्प है।

प्रश्न :- डॉ. साहब आप मधुमेह रोगियों को हार्ट-अटैक से बचने के लिये क्या सलाह देंगे?

डॉ. त्रिवेदी :-
मधुमेह पर नियंत्रण रखें।
बी.पी. पर नियंत्रण रखें।
समय-समय पर लिपिड प्रोफाईल की जाँच करायें। यदि कोलेस्ट्राल की गड़बड़ निकले तो जीवन भर उसकी दवाएँ लें।
यदि डॉक्टर कहे तो ऐस्प्रिन की गोली भी नियमित रूप से लें।
नियमित व्यायाम करें।
मानसिक तनाव से बचें। मनोरंजन के लिये समय निकालें।
धूम्रपान व तंबाकू का सेवन कतई ना करें।
साल में एक बार हृदय की जाँच करवायें। यदि कोई गड़बड़ निकले तो जाँचें और परामर्श और जल्दी करवायें।

प्रश्न :- क्या हार्ट-अटैक के बाद सामान्य जीवन एवं कार्यक्षमता संभव है?

डॉ. त्रिवेदी :- जी हाँ, अधिकांश मरीज नियमित उपचार लेते हुए अपनी पुरानी कार्यक्षमता से जीवन जी सकते हैं। कुछ को बायपास ऑपरेशन या एंजियोप्लास्टी की जरूरत हो सकती है जिसके बाद वे लगभग सामान्य स्तर पर आ जाते हैं। सावधानियाँ, नियमित दवाई और जीवन शैली में बदलाव आदि से एक सामान्य व दीर्घ जीवन संभव है।


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