आजकल दुनिया भर में हो रही बीमारियों की घटनाएं, जैसे अचानक हार्ट अटैक से मौत, डायबिटीज के बढ़ते मामले, कैंसर के फैलने की रफ्तार बढ़ना, किडनी, लिवर, हड्डी, जोड़ों की समस्याएं, मोटापा और भी कई बीमारियों की घटनाएं हैं। साथ ही मीडिया के माध्यम से इनकी तेज गति से फैलती खबरें और सूचनाएं रोज रोज झकझोरती रहती हैं।
इनका डर मेरे अवचेतन मन पर इतना फैल चुका है कि शरीर के किसी भी अंग में होने वाली मामूली असहजता या तकलीफ होने पर किसी भयंकर बीमारी की शंकाओं के कारण कई दिनों तक ठीक से नींद नहीं आती।
इस समस्या से तंग आकर एक दिन मैने ठाना कि, अब चाहे सारे काम छूट जाएं पर स्वास्थ्य पर ध्यान देकर ही रहूंगा। और हर वह उपाय करूंगा जिससे जीवन भर स्वस्थ रह पाऊं। संकल्प ले लिया और शुरू हो गया जानकारी इकट्ठा करने के लिए। इसके लिए सबसे आसान, सुगम, और सस्ता रास्ता सोशल मीडिया और इंटरनेट को चुना। जब सोशल मीडिया पर उपलब्ध जानकारियों से रूबरू हुआ तो मन में कई तरह के विचित्र कन्फ्यूजन पैदा होने लगे, जितना पढूं उतना डर और उलझन बढ़ती जाए। कई पन्ने पढ़ने और वीडियो देखने के बाद एहसास हुआ कि मेरा स्वस्थ रह पाना बहुत मुश्किल है, या असंभव है। अगर किसी तरह स्वस्थ रह गया तो यह चमत्कार से कम नहीं होगा।
इन जानकारियों के कारण अब हालत यह हो गई है कि, पलक झपकने, सांस लेने, उठने– बैठने, सोने –जागने, पीने–खाने, टीवी मोबाइल देखने जैसी छोटी छोटी बातों में गंभीर बीमारियों के अनजाने रिस्क फैक्टर नजर आने लगे। खतरे क्या अब तो हर कदम पर मौत की आहट सुनाई देने लगी। मेरी मनोदशा की झलक कुछ इस प्रकार हो गई है….
8 से 10 घंटे बैठे रहकर काम करने से कई मेटाबोलिक और हृदय रोग के खतरे हैं, उनसे बचने के लिए ऑफिस में स्टैंडिंग डेस्क पर खड़े रह कर काम करने का सोचा तो, अगले लेख ने चेताया कि लंबे समय तक खड़े रहकर काम करने से, पैर की नशों में सूजन (Varicose veins), ओस्टियो आर्थराइटिस और एड़ी में हील स्पर होने का खतरा होता है। तो क्या अब उछल कूद मचाकर काम करूं?
अक्सर वीकेंड पर सुबह देर तक सोने की आदत थी, सोशल मीडिया पर उपलब्ध ज्ञान दाताओं ने बताया कि अगर ऐसा करोगे तो सोशल जेटलेग हो जाएगा। मतलब अगर रोज सुबह 6 बजे उठते हो और हफ्ते में एक दो दिन 9 बजे उठोगे, तो नींद का बायोलॉजिकल क्लॉक बिगड़ जाएगा और गंभीर स्वस्थ समस्याएं पैदा हो जाएंगी। और अब हालत यह है कि जरा लेट उठने का डर बड़े अपराध की तरह लगने लगा। और अलार्म से पहले ही नींद खुल जाती है। कई बार तो इसी डर में देर रात तक नींद नहीं आती।
कुछ वीडियो बताते हैं, की खाना खाते वक्त हर निवाले को 32 बार चबाओ। अरे भई, मुंह है या मिक्सर ग्राइंडर? फिर भी जब इस सलाह पर अमल करना चाहा तो पता चला ऑफिस में लंच के समय 1 रोटी खत्म करने में ही लंच का समय खत्म हो गया।
एक वीडियो में इंटरमिटेंट फास्टिंग (12 से 15 घंटे भूखे रहना) के बारे जानकारी लेकर उसके लाभ समझ ही रहा था, तभी स्क्रॉल किया तो नया वीडियो दिखा, उसमें बताया गया हर 2 घंटे में खाना खाओ, इससे शुगर नियंत्रण में रहेगी। एक और वीडियो दिखा जिसमें बताया गया कि लंबे समय खाली पेट रहने से एसिडिटी, पेट में छाले (पेप्टिक अल्सर) और पित्ताशय में पथरी होने का खतरा हो सकता है।
फोन, टीवी या कंप्यूटर की स्क्रीन से आंखों की रोशनी जाने का खतरा, और नींद डिस्टर्ब होने का भी खतरा होता है। मेलाटोनिन हार्मोन की गड़बड़ी भी इसी वजह से होती है। इन चीजों से खतरों की डरावनी चेतावनी भरे ढेरों लेख और वीडियो हैं। पर फोन न देखो तो दुनिया से कट जाने का स्ट्रेस, कंप्यूटर न चलाएं तो नौकरी कैसे हो, टीवी न देखें तो मनोरंजन के स्वस्थ लाभ से वंचित रहें। एक तरफ कुआं तो दूसरी तरफ खाई। अब क्या करें भाई?
एक ज्ञान पानी पीने के बारे में मिला, कम पानी पीने से डीहाइड्रेशन हो जाएगा, स्किन रूखी रूखी हो जाएगी, पाचन ठीक से नहीं होगा, किडनी रूठ जाएगी, किडनी और पेशाब की थैली में पथरी होने का भी खतरा है। इन सारी धमकियों के चलते बहुत सारा पानी पीना शुरू कर दिया। तब से पाचन तंत्र और किडनी की खुशी का तो पता नहीं, पर अब आधा समय ऑफिस और आधा समय टॉयलेट में बीत रहा है। इससे बॉस चिड़ा हुआ है, और बॉस के प्रेशर के डर में ब्लैडर का प्रेशर झेलना पड़ रहा है।
एक सलाह मिली अगर व्यायाम के लिए समय नहीं मिल रहा तो पैदल चलो, सीढ़ियां चढ़ो उतरो, इससे दिल और दिमाग स्वस्थ रहेंगे। वहीं दूसरी सलाह मिली ज्यादा सीढ़ियां चढ़ने उतरने से घुटने खराब हो जाएंगे। अब दिल–दिमाग को बचाएं या घुटनों को?
शरीर को स्वस्थ रखने के लिए फल सब्जियां, डेयरी प्रोडक्ट खाने की सलाह मिली ही थी कि अगले वीडियो में बताया, फल, सब्जियां, अनाज, दूध दही सब जहर है। मतलब ये चीजें सीधे जहर नहीं हैं, पर इनके उत्पादन और रख रखाव के लिए इनमें खतरनाक केमिकल्स मिलाए जाते हैं, इन्हें प्लास्टिक में पैक किया जाता है। यह सच भी है? तो अब क्या करें? अमृत भी जहर मिलाकर परोसा जा रहा है, तो यह स्वास्थ्य को बचाएगा या बीमार करेगा?
किसी ने बोला शाकाहारी भोजन में प्रोटीन कम होता है, अतः सप्लीमेंट लो, और मैने शुरू भी कर दिए। तभी एक दिन टीवी पर रिसर्च न्यूज दिखी, जिसमें प्रोटीन सप्लीमेंट की वजह से किडनी खराब होने के मामले सुनामी की तरह बढ़ते बताए गए। तब से पेट में मामूली गैस का दर्द होने पर मन कांप उठता है, कि कहीं किडनी तो फैल नहीं हो रही।
एक पत्रिका के हेल्थ कॉलम में पढ़ा कि फैट खतरनाक है, यह दिल की नशों में जमा होकर हृदय घात दिला सकता है, स्ट्रोक का कारण बन सकता है। वहीं उसी पत्रिका के डाइट कॉलम में पढ़ा कि फैट तो हमारे भोजन के प्रमुख 3 घटक में से एक है, शरीर की हर कोशिका की झिल्ली फैट के बिना बन ही नहीं सकती, यह मस्तिष्क, तंत्रिका तंत्र, आँखों, स्किन और यहाँ तक कि खून और दिल के लिए भी अत्यंत जरूरी है। मेरा तो दिमाग ही चकरा गया! क्या जो जरूरी है, वही जहर है।
सब बताते हैं नमक खाओ तो बीपी बढ़ने का खतरा होता है, हड्डियां कमजोर होती हैं। वहीं स्वास्थ्य विशेषज्ञ बताते हैं आयोडीन वाला नमक जरूरी है, एवं नमक न लेने से डीहाइड्रेशन हो सकता है। और मन भी कहता है नमक बिना जिंदगी बेस्वाद है।
किसी बाबा ने बताया प्राणायाम करो, तनाव कम होगा, हृदय रोग का खतरा कम होगा। वहीं दूसरी खबर पढ़ी जिसमें बताया हवा में इतना रासायनिक जहर और माइक्रोप्लास्टिक है, कि किसी भी पल यह आपको कोई भी गंभीर बीमारी देने के लिए तैयार है। अब प्राणायाम करते वक्त जब सांस अंदर लेता हूं तो प्रदूषण नाम का यमराज फेंफड़ों में नाचता दिखाई देता है।
तनाव कम करने के लिए जब ध्यान मेडिटेशन करने बैठा तो दिनभर के क्रिया कलाप पर ध्यान गया, कितने घूंट कम पानी पिया? निवाले को केवल 31 बार ही चबाया। कितने कदम चला? कहीं कम तो नहीं चला? कहीं ज्यादा सीढ़ियां तो नहीं चढ़ लीं? पता नहीं घुटने कितने घिस गए? अरे आज पेन किलर भी तो ली थी, कही किडनी के आस पास ही तो नहीं पड़ी? कुछ दिन से सब्जियाँ कम खा रहा हूँ, कहीं विटामिन्स तो कम नहीं हो गए शरीर में? कभी इन्हीं सब्जियों द्वारा शरीर में पहुँचे जहर के आंकड़े मन में घूमने लगते हैं! जिस मेडिटेशन से तनाव कम होना था, उसी से तनाव बढ़ गया, कार्टिसोल हार्मोन का स्तर बढ़ गया, ध्यान करते करते ही बीपी बढ़ गया।
इस तरह जब चारों ओर ध्यान से देखा तो लगा, शहर हो यह गांव हर तरफ बीमारियों और मौत का खौफ नजर आया। कोई जगह स्वास्थ्य की दृष्टि से सुरक्षित महसूस नहीं हो रही थी। फिर सोचा स्वस्थ रहने का संकल्प लिया है, तो चलो चलकर जंगल में ही रहते हैं। जंगल में जीवन बिताने के लिए जानकारी जुटाना चालू की, कि जंगल में रहने के क्या फायदे और नुकसान हैं। तो पहले नुकसान पता चले, वहां खतरनाक जानवर होते हैं, जहरीले सांप बिच्छू भी पाए जाते हैं, और कई तरह की बीमारियाँ फैलाने वाले जीव जंतु और मच्छर भी होते हैं जिनसे मलेरिया डेंगू होने का खतरा है। अतः पता चला स्वस्थ रहना तो दूर वहां जिंदा रहना ही मुश्किल है।
फिर मैंने देखा, मैं स्वस्थ हूँ, मेरे आस पास के लोग भी स्वस्थ ही हैं। अतः ये हिदायतें मुझे कॉमेडी शो जैसी लगने लगीं। ये सलाह और ज्ञान सामान्य जन की आजादी पर हमले जैसे लगने लगा। और सोचा, कि ये हेल्थ एक्सपर्ट केवल डरने के लिए पैदा हुए हैं।
इस बात का मेरे मन पर नकारात्मक असर पड़ा और मैने स्वास्थ्य की परवाह करना ही छोड़ दिया। इससे कई गलत आदतें जीवन में शामिल हो गईं। हमारे पर्यावरण, भोजन, पानी और हवा में मिले जहर के आगे धूम्रपान, शराब, अनियमित दिनचर्या, आदि कम खतरनाक लगने लगे।
अब क्या था, जो दुनिया और पर्यावरण द्वारा जहर मिल रहा था वह तो ग्रहण कर ही रहा था, साथ ही शराब, धूम्रपान, आलस्य, अनियमित जीवन शैली जैसी जहरीली आदतें स्वयं पाल लीं। मानो खुद ही अपनी सुपारी लेकर घूमने लगा।
अगर आप भी मेरी तरह अपनी ही सुपारी लेकर घूम रहे हैं, तो आइए अपनी इन आत्मघाती आदतों पर विस्तार से चर्चा कर लेते हैं….
मेरी रात की शुरुआत तब होती है जब पूरी दुनिया सो चुकी होती है। रात के 2 बजे, जब ‘मेलाटोनिन’ हार्मोन रो-रोकर मुझसे सोने की भीख मांग रहा होता है, तब मैं स्मार्टफोन की जगमग ‘नीली रोशनी’ के चमचमाते माहौल में रील्स स्क्रॉल कर रहा होता हूँ। हफ्तेभर की नींद शनिवार रात से लेकर रविवार दोपहर 2 बजे तक सो कर पूरी करता करता हूँ । मैं इसे कुंभकर्ण थेरेपी’ कहता हूँ। मेरा मेटाबॉलिज्म और बायोलॉजिकल क्लॉक दोनों ही कन्फ्यूज चल रहे हैं।
कभी कुर्सी पर बैठने के समय को लेकर चिंतित रहता था, अभी कुर्सी से चिपका रहता हूँ। डॉक्टर चिल्लाते रहते हैं कि लगातार बैठे रहने से ब्लड सर्कुलेशन धीमा हो जाता है। मैं कहता हूँ, धीमा ही अच्छा है, खून को भी आराम की ज़रूरत है! दिल अंदर से धीरे से धड़ककर कहता है, “साहब, कभी थोड़ा चल भी लिया करो, कहीं मैं हमेशा के लिए न रुक जाऊँ!” पर उसकी सुनता कौन है, अब तो मन का राज चलता है।
खाने के बारे में तो पूछो ही मत! कब, क्या, और क्यों खाना है? इसकी परवाह डस्टबिन में डाल दी। लोग आजकल गीले सूखे आदि कचरे के लिए भी अलग अलग डस्टबिन स्तेमाल करते हैं । मेरा आलम ये है के मैं अपने पेट को एक कॉमन डस्टबिन की तरह स्तेमाल करने लगा हूँ। जब जो भी खाना दिखे गप से गटक जाता हूँ, दांतों और जबड़ों को जरा भी तकलीफ नहीं देता। फिर जो गैस और एसिडिटी के ‘धमाके’ होते हैं, उसे मैं ‘पाचन की निशानी’ मानता हूँ। एंटासिड या पेनकिलर की गोली अब बिना सोचे, बिना डरे गटक जाता हूँ।
पानी को लेकर मेरे जज्बात ही बदल चुके हैं। खाली बेस्वाद पानी क्यों पीना। पानी तो हर तरल पेय में होता ही है। अतः पानी की जगह तरह तरह के खट्टे, मीठे, नमकीन कोल्ड और हॉट ड्रिंक्स जो शक्कर, नमक, एसिड और कई तरह के प्रिजर्वेटिव के जायके का आनंद लेता हूँ। कैफ़ीन का आनंद प्रदान करने वाले अमृततुल्य चाय और कॉफी आदि ने अब पानी का स्थान ले लिया है। अब भूल ही गया हूँ, कि पानी जैसी कोई वस्तु है भी या नहीं इस संसार में।
मैं सोचता हूँ, रात को सोने से पहले ब्रश करना तो अमीरों के चोचले हैं। मुझे किसी ने बताया कि मसूड़ों का संक्रमण सीधे दिल की बीमारी से जुड़ा है। वाह! दांतों की लापरवाही का बदला सीधे दिल से? ऐसा सोचकर इसे इग्नोर कर देता हूँ।
इसका परिणाम ये हुआ, कि मैने बहुत से रिवॉर्ड पा लिए हैं, बीमारियों के रूप में। बीपी, शुगर, मोटापा, फैटी लिवर, कमजोर किडनी, डिप्रेशन, कमजोर और धुंधली नजर, कब्ज, गैस, अपच, घुटनों के दर्द, दिल की बीमारियाँ आदि के सर्टिफिकेट मिल चुके हैं। जिन्हें टेस्ट रिपोर्ट कहा जाता है। खास बात ये है कि हर टेस्ट में अब्बल आया हूँ।
फिर एक विशेषज्ञ डॉक्टर से मिला। और शुरू से आखिरी तक की कहानी बताकर पूछा गलती कहाँ हुई?
उन्होंने सारा वृतांत सुनकर बताया केवल दो गलतियाँ हुईं। और हैं…
पहली: हिदायतों को ठीक से न समझना।
दूसरी: अति हर चीज की बुरी होती है, यह न समझ पाना।
असल में सोशल मीडिया रील्स, शॉर्ट्स, ब्लॉग या आर्टिकल में जो सलाह और हिदायतें होती हैं, उनकी ठोस वैज्ञानिक प्रामाणिकता की जाँच करने के बाद ही सही मानना चाहिए। और उन हिदायतों को ठीक से समझने के बाद ही अमल करना चाहिए। जिस तरह भोजन और जीवन शैली संतुलित होनी चाहिए। उसी तरह हिदायतों को भी संतुलित तरीके से पालन करना होता है। नहीं तो ये हिदायतें गले की फांस होने या आजादी छीनने वाली महसूस हो सकती हैं।
दूसरा अति हर चीज की खराब होती है। यह एक कॉमन सेंस है। इस बात पर लोग अक्सर ध्यान नहीं देते और हिदायतों को गलत मान लेते हैं या कन्फ्यूज हो जाते हैं। जैसे हमारे भोजन के प्रमुख घटक , शुगर, प्रोटीन, और फैट होते हैं। इन्हें अच्छी गुणवत्ता के साथ संतुलित मात्रा में प्रतिदिन लेना बहुत जरूरी है। पर इनमें से किसी भी पदार्थ की अनुशंसित मात्रा से कम या अधिक लेने से लंबे समय में शरीर को नुकसान होता है। इनमें से किसी की भी अति यह अत्यधिक मात्रा खतरनाक होती है।
अतः संतुलित मात्रा में यह जीवन का अमृत भोजन है। इनमें से किसी की भी अति जहर है।
अतः जब भी आपको लगे कि हिदायतें कन्फ्यूज कर रहीं हैं तो, विशेषज्ञ से अपनी पूरी जीवन शैली विस्तार से बताकर, कुछ जरूरी जाँचें करवाने के बाद आपके लिए क्या उचित और अनुचित है, यह समझकर ही हिदायतों पर अमल करें। और बिना कन्फ्यूज हुए अपने स्वास्थ्य की रक्षा करें।
इससे आपको हिदायतें मजबूरी नहीं जरूरी लगेंगी।
