पाठको आपको ज्ञात ही होगा कि हमारे शरीर में ग्लूकोज की मात्रा नियंत्रित करने के लिए सबसे महत्वपूर्ण हार्मोन “इन्सुलिन” पैन्क्रियाज में बनता है। किसी भी व्यक्ति को डायबिटीज तभी होती है जब पैन्क्रियाज व्यक्ति की जरूरत के अनुसार इंसुलिन नहीं बना पाती। पैन्क्रियाज शरीर में पेट के ऊपरी हिस्से में पीछे की तरफ पाया जाता है, व इसकी बनावट कॉमा (,) जैसी होती है। इसके चौड़े भाग के आसपास डियोडिनम (आँत का ऊपरी हिस्सा) लिपटा होता है।
पैन्क्रियाज के कार्य :-
पैन्क्रियाज मुख्य रूप से दो प्रकार के काम करता है…..
पैन्क्रियाटाइटिसः
किसी भी कारण से पैन्क्रियाज ग्रंथि में सूजन आ जाने की स्थिति को पैन्क्रियाटाइटिस कहते हैं। जैसा कि हमने पहले भी बताया है कि, इसी स्थिति में पैन्क्रियाज में बनने वाले एंजाइम्स स्वयं पैन्क्रियाज को ही नष्ट करने लगते हैं। एकाएक आने वाली अल्पकालिक सूजन को एक्युट पैन्क्रियाटाइटिस कहते हैं। जबकि लंबे समय तक एवं बार बार आने वाली सूजन को क्रोनिक पैन्क्रियाटाइटिस कहते हैं।
पैन्क्रियाटाइटिस के हर अटैक में पैन्क्रियाज द्वारा बनाए गए एंजाइम्स पैन्क्रियाज में अंदर ही रिस कर क्रियाशील हो जाते है। जिससे पैन्क्रियाज की कोशिकाएं नष्ट होने लगती हैं। इस प्रक्रिया को पैन्क्रियाज का ऑटो डाइजेसन कहते हैं

पैन्क्रियाटाइटिस के कारण :
पैन्क्रियाटाइटिस के लक्षण :
पैन्क्रियाटाइटिस के अटैक के समय मरीज को पेट के ऊपरी भाग में बहुत तीव्र दर्द होता है, यह दर्द अक्सर पीठ की तरफ भी जाता है। इसी के साथ अधिकांश मरीजों को उल्टियां भी होती हैं। कई मरीज चक्कर महसूस करने लगते हैं। डॉक्टर द्वारा परीक्षण करने पर ऊपरी पेट को छूने से दर्द होता है एवं मरीज का ब्लड प्रेशर गिर सकता है। क्रोनिक पैन्क्रियाटाइटिस एवं बार बार होने वाले पैन्क्रियाटाइटिस में मरीज का वजन कम होने लगता है। पैन्क्रियाज में बनने वाले एंजाइम्स की कमी के कारण भोजन पचता नहीं है एवं मरीजों को बदबूदार तेल युक्त मल (Foul smelling and oily stool) होता है। अधिकतर मरीजों को विटामिन एवं मिनरल्स की भी कमी होने लगती है। पैन्क्रियाटाइटिस में आइलेट ऑफ लैंगरहैंस के नष्ट होने के कारण मरीज को तत्काल अथवा आगे चलकर मधुमेह भी हो जाता है। अनेक शोधों में बताया गया है कि पैन्क्रियाटाइटिस के बाद पाँच साल में 30 से 50 प्रतिशत मरीजों को डायबिटीज हो जाती है।
पैन्क्रियाटाइटिस का इलाज :
पैन्क्रियाटाइटिस का अटैक होने पर मरीज को अस्पताल में भर्ती करना लगभग आवश्यक हो जाता है। मरीज को मुँह से खाने पीने की मनाही कर दी जाती है। दर्द निवारक दवाइयाँ इंजेक्शन द्वारा दी जाती हैं। पैन्क्रियाज अथवा उसके आस पास इंफेक्शन न हो उसके लिए एंटीबायोटिक दी जाती हैं। मरीज के पानी, कैलोरीज, विटामिन्स की जरूरत ड्रिप द्वारा पूरी की जाती है। सामान्यतः मरीज को लगभग एक हफ्ते अस्पताल में रहना पड़ता है। पैन्क्रियाज में बनने वाले एंजाइम्स की कमी को देखते हुए मरीज को पैन्क्रियाटिक एंजाइम्स के कैप्सूल अथवा गोलियाँ खाने के साथ लंबे समय तक दी जाती हैं। मरीज को डायबिटीज होने पर अधिकांश मरीजों को इंसुलिन दी जाती है।
पैन्क्रियाटाइटिस के कॉम्प्लिकेशन :
1 . पैन्क्रियाटाइटिस के अटैक के दौरान लीक हुए पैन्क्रियाटिक रस न केवल पैन्क्रियाज बल्कि आस पास के ऊतकों को भी नष्ट कर तरल बना देते हैं। यह तरल पदार्थ पैन्क्रियाज के आस पास जमा होकर एक सिस्ट बना देते हैं जिसे स्युडो सिस्ट कहते हैं। सिस्ट के अंदर इंफेक्शन होने का खतरा हमेशा बना रहता है, अतः ऐसा होने पर इसका इलाज सर्जरी द्वारा करना पड़ता है।
पिछले लेख में हमने जाना कि शक्कर के चक्कर में दुनिया किस तरह उलझती जा रही है। इस लेख में समझेंगे कि, इस चक्कर से निकलने के क्या उपाय हो सकते हैं?
दुनिया भर में बढ़ते चीनी के उपाभोग और उससे जुड़ी स्वास्थ्य समस्याओं (डायबिटीज, मोटापा और हृदय रोग) के कारण चीनी के उपभोग को कम करने के लिए विभिन्न उपाय किए जा रहे हैं।
इसी दिशा में कदम उठाते हुए, कई देशों में प्रोसेस्ड मीठे खाद्य पदार्थों में होने वाले चीनी के उपयोग पर टैक्स लगाया जाता है। जर्मनी में चीनी कर (sugar tax) एक बड़ा राजनैतिक मुद्दा बन चुका है। जर्मनी की सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ जर्मनी और अलायंस के राजनेताओं सहित अन्य समर्थकों ने तर्क दिया कि मीठे पेय पदार्थों पर टैक्स लगाने से चीनी का उपभोग कम किया जा सकता है, जिससे मोटापे और टाइप 2 डायबिटीज (T2D) को रोकने में मदद मिल सकती है। वहीं आलोचक इसे लेकर खाद्य उद्योग के लिए संभावित आर्थिक नुकसान के बारे में चेतावनी देते हैं।
जिन देशों में चीनी टैक्स लगाया गया है, वहां देखा गया है कि निर्माता अक्सर टैक्स की सीमाओं से नीचे रहने के लिए अपने उत्पादों में सुधार (reformulate) करते हैं। अतः कंपनियां मीठे पेय पदार्थों में स्वीटनर्स (मधुरक) या चीनी के विकल्पों का उपयोग बढ़ाते हुए चीनी की मात्रा को कम करती हैं। दशकों से इन शुगर फ्री यौगिकों को चीनी के स्वस्थ विकल्पों के रूप में बढ़ावा दिया गया है, खास तौर पर मोटापे या डायबिटीज से पीड़ित व्यक्तियों में।
वर्तमान में नॉन-न्यूट्रिटिव स्वीटनर्स (NNSs) और चीनी के अन्य विकल्पों की एक बड़ी श्रृंखला उपलब्ध है। जिन्हें पॉलीओल्स (polyols) के रूप में भी जाना जाता है।
NNSs: जैसे कि एस्पार्टेम, सुक्रालोज़, सैकरीन और एसेसल्फेम पोटैशियम, ये पदार्थ बहुत कम या बिना किसी कैलोरी के तीव्र मिठास प्रदान करते हैं। चीनी के अन्य विकल्प, जिसमें एरिथ्रिटोल, जाइलिटोल और सॉर्बिटोल शामिल हैं, यौगिक के आधार पर इनमें कम मात्रा में ऊर्जा (कैलोरी) होती है। इनमें से कुछ आंतों द्वारा आंशिक रूप से ही अवशोषित होते हैं, जबकि अन्य आंत के सूक्ष्म जीवों द्वारा किण्वित (fermented) हो जाते हैं। चीनी के इन सभी विकल्पों के तात्कालिक या अल्पकालिक स्वास्थ्य लाभ भली भांति सिद्ध किए जा चुके हैं। खास तौर पर डायबिटीज और मोटापे में। क्योंकि इनके सेवन से खून में शुगर का स्तर नहीं बढ़ता, साथ ही ये बहुत कम या न के बराबर कैलोरी प्रदान करते हैं।
भले ही इनके तात्कालिक लाभ अच्छी तरह से स्थापित हैं। फिर भी यदि इन यौगिकों का सेवन अधिक मात्रा में किया जाता है, तो ये शरीर में हानिकारक प्रभाव भी पैदा कर सकते हैं। अतः विभिन्न शोध इन नए स्वीटनर्स के लाभ की धारणाओं को चुनौती दे रहे है। मेटाबॉलिज्म पर, आंत के सूक्ष्म जीवों (gut microbiome) पर, और कार्डियोवस्कुलर स्वास्थ्य पर इनके संभावित दुष्प्रभावों की ओर भी ध्यान बढ़ रहा है।
नॉन-न्यूट्रिटिव स्वीटनर्स के तात्कालिक लाभ:
एपेटाइट (Appetite) में प्रकाशित एक अध्ययन में पाया गया कि स्टीविया ने, सुक्रोज की तुलना में, भोजन के बाद ग्लूकोज या इंसुलिन के स्तर को नहीं बढ़ाया। अन्य अध्ययनों के अनुसार भी नॉन-न्यूट्रिटिव स्वीटनर्स अल्पकालिक रूप से फायदेमंद हो सकते हैं। विशेष रूप से अधिक वजन वाले व्यक्तियों में।
नॉन-न्यूट्रिटिव स्वीटनर्स के दीर्घकालिक (Long Term) प्रभाव: इन स्वीटनर्स के दीर्घकालिक प्रभाव अभी तक अस्पष्ट है। द बीएमजे (The BMJ) में प्रकाशित एक समीक्षा (systematic review) ने निष्कर्ष निकाला कि, नॉन-न्यूट्रिटिव स्वीटनर्स के शुरुआत में मधुमेहियों और मोटे लोगों में लाभ दिखाई देते हैं। पर ये दीर्घकालिक रूप से शरीर के वजन या मेटाबॉलिज्म में स्थाई सुधार नहीं दर्शाते।
कई अन्य अध्ययनों (prospective cohort studies) में स्वीटनर के उपयोग और डायबिटीज, हृदय रोगों और मृत्यु दर के बढ़ते जोखिम के बीच संबंध पाया गया है । इन परिणामों के आधार पर शोधकर्ताओं ने आगाह किया कि ये ये स्वीटनर्स मेटाबॉलिक और जैविक क्रियाओं के बीच गंभीर प्रभाव डाल सकते हैं। यह प्रभाव मेटाबॉलिक डीकपलिंग (Metabolic decoupling) के रूप में हो सकते हैं। मेटाबॉलिक डीकपलिंग अंगों के सामान्य कार्य और उससे जुड़ी ऊर्जा खपत (मेटाबॉलिज्म) के बीच का तालमेल टूटना या असंतुलन होना है। मीठे स्वाद वाले खाद्य पदार्थ या पेय जिनमें कोई ऊर्जा स्रोत नहीं होता है, उनके उपयोग से शरीर के विभिन्न रेगुलेटरी तंत्र बाधित हो सकते हैं। और ये compensatory eating behaviors को बढ़ावा दे सकते हैं।
आंतों के माइक्रोबायोम पर प्रभाव (Microbiome Effects):
2014 में नेचर (Nature) में प्रकाशित एक अध्ययन में पाया गया कि कृत्रिम स्वीटनर्स का अत्यधिक उपयोग आंतों के माइक्रोबायोम्स में बदलाव के माध्यम से ग्लूकोज इनटोलरेंस (glucose intolerance) पैदा कर सकते हैं।
न्यूट्रिएंट्स (Nutrients) नामक पत्रिका में प्रकाशित कुछ अध्ययनों के अनुसार सैकरीन, सुक्रालोज़ और एस्पार्टेम के उपयोग से आंतों की बैक्टीरियल विविधता में बदलाव और अनियंत्रित मेटाबॉलिज्म, शॉर्ट-चेन फैटी एसिड का कम उत्पादन और प्रो-इंफ्लेमेटरी सिग्नलिंग पाथवेज का सक्रिय होना पाया गया है। हालांकि इन निष्कर्षों के नैदानिक (clinical) महत्व पर अभी और जांच की आवश्यकता है।
एरिथ्रिटोल, जिसे लंबे समय से मेटाबोलिकली निष्क्रिय और अपेक्षाकृत हानिरहित माना जाता था, नेचर मेडिसिन (Nature Medicine) में प्रकाशित एक अध्ययन में पाया गया है कि उच्च प्लाज्मा एरिथ्रिटोल स्तर कुछ खास कार्डियो वैस्कुलर घटनाओं के बढ़ते जोखिम से जुड़ा हुआ है।
यह प्लेटलेट एक्टिवेशन में वृद्धि और थ्रोम्बोसिस (रक्त का थक्का जमना) के बढ़ते जोखिम से संबंधित है।
अध्ययनों में पाया गया है कि जाइलिटोल भी इसी तरह के प्रभाव पैदा कर सकता है, हालांकि उपलब्ध डेटा अभी सीमित है।
स्वीटनर्स की तुलना
एस्पार्टेम: यह सबसे व्यापक रूप से अध्ययन किए गए NNSs में से एक है। पब्लिक लाइब्रेरी ऑफ साइंस मेडिसिन (PLOS Medicine) में प्रकाशित शोध के अनुसार इसका कैंसर होने के साथ संबंध नहीं पाया गया है। जबकि WHO की कैंसर रिसर्च एजेंसी (IARC ) ने अपने शोध में एस्पार्टेम को संभावित कार्सिनोजेनिक रसायन की श्रेणी में रखा है। जिसका आधार लिवर कैंसर एवं एस्पार्टेम के बारे में प्रकाशित कुछ रिपोर्ट्स से है। हालांकि, संभावित मेटाबॉलिक और माइक्रोबायोम प्रभावों पर अभी और शोध की जरूरत है।
सुक्रालोज़ और सैकरीन: शोधों के अनुसार इनका आंतों के सूक्ष्म जीवों पर दुष्प्रभाव पाया गया है। एसेसल्फेम पोटैशियम मेटाबॉलिज्म पर असर कर सकता है।
स्टीविओल ग्लाइकोसाइड्स (स्टीविया): कई अध्ययनों में ग्लूकोज होमियोस्टैसिस और ब्लड प्रेशर पर स्टीविया के हल्के लाभकारी प्रभाव देखे गए हैं। साथ ही इसकी अधिक अनुकूल मेटाबॉलिक प्रोफाइल भी पाई गई है। कुछ शोध अन्य स्वीटनर्स की तुलना में माइक्रोबायोम पर कम प्रभाव का भी सुझाव देते हैं। हालांकि, ठोस दीर्घकालिक डेटा की कमी है, अतः अभी भी यह शोध के दायरे में बना हुआ है।
आहार संबंधी विकल्प: वर्तमान में, किसी भी स्वीटनर या चीनी के विकल्प को पूरी तरह से जोखिम-मुक्त नहीं माना जा सकता है। जबकि कई शोध प्राकृतिक मिठास वाले खाद्य पदार्थों, विशेष रूप से फलों के सेवन का समर्थन करते हैं। विभिन्न अध्ययनों ने फलों के नियमित सेवन को डायबिटीज के खतरे को कम करने वाला माना है। द बीएमजे (The BMJ) में शोधकर्ताओं की एक रिपोर्ट में पाया है कि बेरीज, सेब और अंगूर का डायबिटीज पर सुरक्षात्मक प्रभाव होता है, जबकि फलों के रस यह प्रभाव नहीं दिखाते हैं। शोधकर्ताओं ने इनमें से कुछ लाभों का श्रेय फूड मैट्रिक्स (food matrix) को दिया है, जैसे कि डाइटरी फाइबर, पॉली फीनोल्स और सूक्ष्म पोषक तत्व, जो ग्लूकोज के अवशोषण को नियंत्रित कर सकते हैं। माइक्रोबायोम के लिए लाभकारी हैं। ताजे और साबुत फल भोजन के बाद ग्लूकोज के स्तर में होने वाली तेज वृद्धि (spikes) को कम कर सकते हैं।
चीनी के उपयोग को कम करने के लिए एक अन्य रणनीति में चीनी की लालसा (sugar cravings) को धीरे-धीरे कम करना शामिल है। अमेरिकन जर्नल ऑफ क्लिनिकल न्यूट्रिशन (American Journal of Clinical Nutrition) में प्रकाशित शोध से पता चलता है, कि स्वाद की सीमाएं (taste thresholds) कुछ ही हफ्तों में अनुकूलित हो सकती हैं। इसके विपरीत, शहद या एगेव सिरप जैसे विकल्पों में ग्लूकोज और फ्रुक्टोज अत्याधिक मात्रा में पाया जाता है, अतः इनकी प्राकृतिक और सकारात्मक छवि के बावजूद कोई महत्वपूर्ण मेटाबॉलिक लाभ नहीं देते।
स्वीटनर्स का उपयोग केवल एक अस्थायी उपाय के रूप में करें। अल्पावधि में, वे चीनी और कैलोरी की मात्रा को कम करने में मदद कर सकते हैं। परन्तु, ये दीर्घकालिक रूप से संतुलित आहार का स्थान नहीं सकते।
चीनी की लालसा में कमी करना: कम चीनी खाने से व्यक्ति के स्वाद की आदत अनुकूलित होने लगती है और मीठा कम खाने की प्रवृत्ति बढ़ने लगती है।
प्राकृतिक खाद्य पदार्थ चुनें: साबुत फल अन्य स्वीटनर्स की तुलना में मेटाबॉलिज्म के लिए अधिक फायदेमंद होते हैं, क्योंकि उनमें फाइबर और फाइटोकेमिकल्स होते हैं।
यदि स्वीटनर का उपयोग कर रहे हैं, तो स्टीविया पसंदीदा विकल्प प्रतीत होता है, वर्तमान निष्कर्ष बताते हैं कि स्टीविया का मेटाबॉलिक प्रोफाइल सबसे अनुकूल है, हालांकि ठोस दीर्घकालिक डेटा की अभी भी कमी है। इसलिए संयम पूर्वक उपयोग करें।
उपरोक्त शोधों और तथ्यों के अनुसार हमने जाना कि शक्कर के चक्कर से बचने के लिए सबसे अच्छा उपाय मीठे की लालसा कम करते जाना एवं साबुत फलों से मिठास की इच्छा पूरी करना है वह भी संयम के साथ। अन्य कोई भी विकल्प पूरी तरह सुरक्षित नहीं हैं।
भोज्य पदार्थों में प्रमुख रूप से मीठा, खट्टा, खारा, तीखा, कड़वा, और कसैला आदि 6 स्वाद होते हैं। इन सभी में सबसे ज्यादा उपयोग किया जाने वाला स्वाद मीठा है। भोज्य पदार्थों में मीठा स्वाद उनमें पाई जाने वाली प्राकृतिक शक्कर के कारण होता है। मनुष्य को मीठा स्वाद सभी स्वादों से ज्यादा पसंद होता है। सबसे ज्यादा खुशी मीठे खाने से ही मिलती है। प्राचीन काल में मीठे भोज्य पदार्थों के रूप में मनुष्य मीठे फलों और शहद पर ही निर्भर था। इस मिठास को बढ़ाने और सहज और सुलभ बनाने के लिए प्राकृतिक स्रोतों से शक्कर को निकालकर परिष्कृत चीनी (शक्कर, मिश्री, गुड, खांड आदि) के रूप में उपयोग किया जाने लगा। इसे ही प्रोसेस्ड शुगर कहा जाता है।
मनुष्य की मिठास की लालसा बढ़ती गई, साथ ही शक्कर का उपभोग भी बढ़ता चला गया। मीठे फलों से तृप्ति नहीं मिली तो शक्कर, मिश्री, गुड, खांड आदि बनाया जाने लगा। और इन मीठे पदार्थों के उपयोग से विभिन्न मधुर व्यंजन बनाए एवं उपभोग किए जाने लगे। हमारे देश के हर प्रदेश, और हर प्रदेश के अलग अलग संभागों के पास अपने तरह के खास व्यंजन, मिठाई और पेय पदार्थ हैं, जो उन क्षेत्रों की खास सांस्कृतिक पहचान के रूप में भी जाने जाते हैं। जैसे..मथुरा का पेड़ा, आगरा का पेठा, ग्वालियर की गजक, बंगाल का रसगुल्ला, राजस्थान के मालपुआ और घेवर, गुजरात के वासुंदी और मोहनथाल, महाराष्ट्र के मोदक, पंजाब की पिन्नी और लस्सी, कर्नाटक के मैसूरपाक आदि।
इनमें कई तरह की मिठाईयां, जैसे मिल्क प्रोडक्ट मावा आदि से निर्मित मिठाईयां, बेसन से निर्मित मिठाईयां, आटे और मैदे से निर्मित मिठाईयां, ड्राई फ्रूट से निर्मित मिठाईयां, आदि। विभिन्न प्रकार की जलेबियां, विभिन्न प्रकार के रसगुल्ले एवं गुलाब जामुन, विभिन्न प्रकार के लड्डू पेड़े जैसे बूंदी के, मोतीचूर के, बेसन के, आटे, मैदे के, गुड के, चूरमे के। विभिन्न प्रकार के हलुवा एवं पाक आदि, विभिन प्रकार की खीरें, कई तरह के पेय जैसे लस्सी, शेक, रबड़ी, कई तरह के खुरमे (कुकीज़, बिस्किट्स आदि), कई तरह के केक। विभिन्न मालपूए, घेवर, बालूशाही आदि। कई तरह की चिक्कियां, पैठे, गजक, रेवड़ी, चिरौंजी, बतासे। कई तरह के ठंडे व्यंजन, जैसे कुल्फी, फालूदा, श्रीखंड, लस्सी, गन्ने एवं फलों के रस एवं शेक, कस्टर्ड, कई तरह के शरबत और ठंडाई, आम पन्ना, शिकंजी एवं बर्फ के गोले आदि। आधुनिक विकास के युग में ये सारे व्यंजन अब हर जगह उपलब्ध हैं, और बहुतायत से उपयोग किए जाने लगे हैं। इनके अलावा दैनिक मीठे पेय जैसे चाय और कॉफी का भी शक्कर के उपभोग को बढ़ाने में प्रमुख योगदान है। इस तरह लगता है जैसे भारत में मीठे व्यंजनों का महासागर हिलोरे लेते रहता है। फिर भी शायद लोगों की तृष्णा शांत नहीं हुई तो, विदेशी कंपनियों के “कुछ मीठा हो जाए” वाले विज्ञापनों एवं कोल्ड ड्रिंक्स के माध्यम से और मिठास बढ़ाई जा रही है।
इन व्यंजनों को ताजे रूप में उपयोग करने पर शक्कर का उपभोग फिर भी सीमित था। पर अब ये सारे व्यंजन रेडी टू कुक, और रेडी टू ईट वाली व्यावसायिक प्रक्रिया के माध्यम से और भी सरल और सुलभ हो गए हैं। इन व्यंजनों के अलावा आधुनिक युग में विभिन्न प्रकार की कैंडी, टॉफी, कुकीज़, क्रीम बिस्किट्स, आइसक्रीम, केक, पेस्ट्रीज, क्रीम रोल, पैक्ड मिठाइयां आदि भी उपलब्ध हैं। अनेकों देशी मीठे व्यंजनों के अलावा कई विदेशी मिठाईयां, मीठे पेय, भी अब दुकानों, रेस्टोरेंटों, और ऑनलाइन स्टोर पर उपलब्ध हैं।
इस तरह हमारे देश में शक्कर का उपभोग निरंतर बढ़ता जा रहा है।
कुछ प्रमुख अध्ययनों के अनुसार हमारे देश में प्रति व्यक्ति शक्कर का उपभोग बढ़ने घटने के ट्रेंड निम्नांकित है…

1968: 4.20 किलोग्राम प्रति व्यक्ति था। (सर्वकालिक निम्न स्तर)।
2005–2009: प्रति व्यक्ति उपभोग (गुड़ सहित) प्रति वर्ष 25-28 किलोग्राम के आसपास उतार-चढ़ाव भरा रहा, जिसमें पारंपरिक गुड़ से रिफाइंड चीनी की ओर एक निरंतर बदलाव देखा गया।
2018–2023: कुल स्वीटनर (मधुरक) उपभोग के साथ, केवल रिफाइंड चीनी का उपभोग 2018 में 22.3 किलोग्राम के चरम पर पहुँच गया और फिर 17-19 किलोग्राम/वर्ष प्रति व्यक्ति के आसपास स्थिर हो गया।
2023–2024: कुल चीनी, गुड़ और खांडसारी का उपभोग प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष लगभग 25.5 किलोग्राम तक पहुँच गया।
कहां और कैसे उपभोग होती है शक्कर?
दैनिक खपत में : औसत भारतीय प्रतिदिन लगभग 52 ग्राम शक्कर का उपभोग करता है, जिसमें मीठे पेय पदार्थों (चाय, कॉफी एवं अन्य कोल्ड ड्रिंक्स) की उच्च खपत महत्वपूर्ण योगदान देती है, विशेष रूप से शहरी क्षेत्रों में। बेंगलुरु, मुंबई, दिल्ली और गुड़गांव जैसे शहरों में शक्कर का उपभोग सबसे अधिक है,
त्योहारों, शुभ अवसर, एवं उत्सवों के दौरान:
विभिन्न त्योहारों, शादियों, अन्य उत्सवों के दौरान शक्कर के उपभोग में 20% से ज्यादा की वृद्धि होती है। हमारे देश में पूरे साल कई त्यौहार मनाए जाते हैं, अतः यह वृद्धि निरंतर बनी रहती है।
साथ ही पारंपरिक गुड़ के उपभोग में गिरावट आई है (2005 में 8.0 किलोग्राम/प्रति व्यक्ति से 2009 में 4.1 किलोग्राम), सफेद चीनी का उपयोग काफी बढ़ गया है।
शक्कर के उपभोग से संबंधित प्रमुख आंकड़े और तथ्य:
जब अत्यधिक मात्रा में शुगर इंटेक होता है तो ब्लड ग्लूकोज बहुत तेजी से बढ़ जाता है। जिसे सामान्य रखने के लिए शरीर में बीटा सेल्स द्वारा इंसुलिन अधिक मात्रा में बनाया जाने लगता है। बार बार ऐसा होने पर बीटा सेल्स पर बुरा असर होता और वे नष्ट होने लगती हैं। आगे चलकर ऐसे बच्चे और व्यक्ति डायबिटीज के शिकार हो जाते हैं।
अत्यधिक मात्रा में शक्कर या मीठे का सेवन करने से रक्त में बढ़ी हुई शक्कर की मात्रा को लिवर द्वारा चर्बी में परिवर्तित कर दिया जाता है, और शरीर के विभिन्न अंगों में यह चर्बी जमा होती रहती है। यही जमा होने वाली चर्बी मोटापे का कारण बनतीं है, और अन्य घातक बीमारियों जैसे मधुमेह, ब्लड प्रेशर, हृदय रोग आदि का खतरा भी बढ़ाती है।
इन सभी बीमारियों और मोटापे से बचने के लिए मीठे भोजन और पेय पदार्थों का सेवन सीमित मात्रा में करना चाहिए। परिष्कृत चीनी या सफेद शक्कर की जगह, प्राकृतिक मीठे भोज्य पदार्थ जैसे फलों का सेवन करना चाहिए।
सफेद शक्कर के कम से कम उपयोग के साथ भोजन में मिठास बनाए रखने के लिए क्या उपाय और विकल्प उपलब्ध हैं? इस विषय पर चर्चा हम अगले लेख में करेंगे।
पृथ्वी पर पाए जाने वाले हर जीव की जन्म से लेकर मृत्यु तक विभिन्न शारीरिक अवस्थाएं होती हैं। जन्म लेते ही सभी विकसित होने लगते हैं। जैसे सूरज उदित होते ही धीरे धीरे आसमान में चढ़ने लगता है और एक निश्चित समय अंतराल के बाद धीरे धीर ढलने लगता है। इसी तरह मनुष्य के जीवन की प्रवृति चढ़ने और ढलने की होती है। जैसे बचपन, जवानी और बुढ़ापा। बुढ़ापे को उम्र ढलने के रूप में देखा जाता है। यह हर प्राणी का परम सत्य है। हमारी उम्र बढ़ रही होती है, पर लगभग 50 वर्ष के ऊपर उम्र बढ़ने पर उम्र ढलना क्यों कहा जाता है?
आइए इस पहेली को समझते हैं…
जीव विज्ञान की दृष्टि से देखें तो हमारा शरीर एक ऐसी मशीन है जो पहले खुद को बनाती है और फिर धीरे-धीरे रखरखाव की अवस्था में चली जाती है, आगे यह धीरे धीरे जीर्णता या ह्रास का रुख कर लेती है। (जीर्णता उम्र बढ़ने के साथ शरीर की कार्यक्षमता में कमी, ऊतकों का ह्रास और धीरे-धीरे मृत्यु की ओर बढ़ने को कहते हैं)। हम जानते हैं कि बचपन से लेकर जवानी तक हमारा शरीर विकसित हो रहा होता है, ऊंचाई बढ़ती है, मांसपेशियों से शरीर भरने लगता है, ताकत बढ़ती है। फिर लगभग 30 वर्ष की आयु के बाद यह सब स्थिर हो जाता है, फिर लगभग 50 से 55 वर्ष की आयु के बाद शरीर की विभिन्न क्षमताएं कम होने लगती हैं।
50 वर्ष या उससे अधिक आयु वाले अधिकांश पाठकों ने अपने शरीर में निम्नांकित बदलाव महसूस किए होंगे…
यह बदलाव मुख्य रूप से मांसपेशियों के क्षरण के कारण होते हैं, जिसका बढ़ती उम्र के साथ सीधा संबंध होता है। इसे ही सार्कोपेनिया के नाम से जाना जाता है। अतः सार्कोपेनिया वह स्थिति है जिसमें उम्र के साथ मांसपेशियों (muscles) का बल और उनका आकार कम होने लगता है। सार्कोपेनिया हमारी ढलती उम्र का प्रमुख कारण है। यह ढलती उम्र का संकेत भी है। कई लोगों में सार्कोपेनिया के लक्षण कम उम्र में दिखने लगते हैं, वहीं कई लोगों में इसके लक्षण बड़ी उम्र में भी काफी कम दिखते हैं।
ऐसा इसलिए होता है क्योंकि सार्कोपेनिया उम्र ढलने से संबंधित तो है ही, पर इसके अन्य कारण भी होते हैं।
आइए जानते हैं सार्कोपेनिया के क्या कारण हैं?
सार्कोपेनिया के प्रमुख कारण :
प्रोटीन की कमी : मांसपेशियों के निर्माण के लिए प्रोटीन मुख्य घटक है। हमारे देश के दैनिक खानपान में अक्सर इसकी मात्रा कम होती है, खास तौर पर शाकाहारी भोजन में। प्रोटीन की कमी से मांसपेशियों का निर्माण और मरम्मत ठीक से नहीं हो पाती। अतः मांसपेशियाँ कमजोर होने लगती हैं।
शारीरिक निष्क्रियता : मांशपेशियों का जितना ज्यादा उपयोग होता उनमें उतनी ही वृद्धि होती है। वहीं मांसपेशियों के उपयोग न होने से ये कमजोर होने लगती हैं, तथा इनका घनत्व (Density) भी कम होने लगता है। USE IT OR LOOSE IT (इस्तेमाल करें वरना खो दें) का नियम यहाँ लागू होता है। व्यायाम या शारीरिक श्रम न करने से मांशपेशियाँ सिकुड़ने लगती हैं।
हार्मोनल बदलाव : उम्र के साथ शरीर में टेस्टोस्टेरोन और ग्रोथ हार्मोन का स्तर कम होने लगता है। इन हार्मोन्स का प्रोटीन मेटाबॉलिज्म में महत्वपूर्ण योगदान होता है। इन हार्मोन्स की कमी से मांसपेशियों (Muscle) के स्वास्थ्य पर खराब असर पड़ता है। यह मांसपेशियों के आकार और मजबूती घटने (Atrophy) का मुख्य कारण है। इन हार्मोन्स की कमी से व्यायाम के बावजूद भी मांसपेशियों के विकास में बाधा आती है। इन हार्मोन्स की कमी से हड्डियों का घनत्व भी कम हो सकता है।
विटामिन “डी” की कमी : विटामिन डी की कमी से भी मांसपेशियों में कमजोरी, दर्द, थकान होना आम बात है। यह मांसपेशियों के सिकुड़ने (Atrophy) का एक बड़ा कारण है। यह हड्डियों के साथ-साथ मांसपेशियों की क्रियाशीलता, संकुचन और ताकत के लिए बहुत जरूरी है, विटामिन डी की कमी से चलने-फिरने में कठिनाई और गिरने का जोखिम बढ़ जाता है।
दवाइयों के कारण : कुछ दवाइयाँ जैसे कॉर्टिकोस्टेरॉइड के लंबे समय तक सेवन से मांसपेशियाँ कमजोर हो जाती हैं। ये दवाइयाँ अक्सर अस्थमा, आर्थराइटिस और एलर्जी आदि बीमारियों के इलाज में उपयोग की जाती हैं।
कुछ शारीरिक स्थितियाँ : किसी लंबी बीमारी जिसमें व्यक्ति बिस्तर से उठ नहीं पाते अथवा ऑर्थराइटिस के कारण व्यायाम नहीं कर पाते। ऐसी स्थितियों में शारीरिक निष्क्रियता भी मांसपेशियों के कमजोर होने का बड़ा कारण है।
मेनोपॉज : महिलाओं में मेनोपॉज के बाद मांसपेशियाँ स्वतः ही कमजोर होने लगती हैं।
अतः हमने देखा कि बढ़ती उम्र के साथ सार्कोपेनिया होने के अन्य कारण भी होते हैं। लोगों के खानपान, जीवन शैली, और शारीरिक स्वास्थ्य की स्थितियाँ अलग अलग होने के कारण ही अलग अलग लोगों में सार्कोपेनिया कम या अधिक आयु में होना पाया जाता है। इन्हीं कारणों को दूर रखकर सार्कोपेनिया से काफी हद तक बचा जा सकता है।
सार्कोपेनिया के प्रमुख परीक्षण एवं जाँचें :
शारीरिक प्रदर्शन परीक्षण (Physical Performance Tests) :
SARC-F प्रश्नावली: यह एक सरल प्रश्नावली है जो ताकत, चलने में कठिनाई, उठने-बैठने की क्षमता, सीढ़ियाँ चढ़ना और गिरने की घटनाएं आदि 5 प्रश्नों पर आधारित होती है। इसको दी गई तालिका से ठीक से समझा जा सकता है

यदि उम्र बढ़ने के साथ (लगभग 50 वर्ष के बाद) चलने में सुस्ती, कमजोरी, या रोजमर्रा के कामों में थकान महसूस हो, तो डॉक्टर से सलाह लेकर जरूरी जाँचें करानी चाहिए।
प्रतिरोध व्यायाम (Resistance excercise) : केवल पैदल चलना काफी नहीं है। मांसपेशियों को मजबूत बनाने के लिए हल्के वजन उठाना या रेजिस्टेंस बैंड का उपयोग करना बहुत प्रभावी है। जब आपकी मांसपेशियाँ किसी प्रतिरोधी बल का प्रयोग करती हैं, तो वे धीरे धीरे मजबूत होने लगती हैं। मांसपेशियों के बढ़ने से चयापचय (metabolism) तेज होता है, जिससे आराम की स्थिति में भी अधिक कैलोरी जलती है।
उदाहरण: डम्बल, बारबेल, रेजिस्टेंस बैंड, या बॉडीवेट एक्सरसाइज (जैसे पुश-अप्स, स्क्वैट्स)।
इसके अतिरिक्त शारीरिक और मानसिक संतुलन ठीक रखने के लिए एरोबिक व्यायाम और योग भी अपनी जीवन शैली में शामिल करें। इससे ढलती उम्र की मानसिकता से निजात मिलने के साथ जिंदादिली बनी रहती है। और यह बढ़ती उम्र की कई समस्याओं को रोकने में सहायक हैं।
आहार : जैसा कि हम जानते हैं मांसपेशियों के निर्माण और मरम्मत में प्रोटीन प्रमुख घटक की भूमिका निभाता है। अतः आहार में उच्च गुणवत्ता के प्रोटीन से भरपूर भोज्य पदार्थों को शामिल करने से मांसपेशियाँ मजबूत होती हैं। अतः अपने भोजन में दालें, पनीर, अंडे, सोयाबीन, और दूध जैसे प्रोटीन स्रोतों को अवश्य शामिल करें। सामान्य तौर पर प्रति किलो वजन पर लगभग 1.0 – 1.2 ग्राम प्रोटीन का सेवन आदर्श माना जाता है। अतः एक 60 किलो वजन वाले व्यक्ति को 60 से 70 ग्राम प्रोटीन अपने दैनिक भोजन में शामिल करना चाहिए। यह अच्छी गुणवत्ता का होना चाहिए।
विटामिन-D : हड्डियों और मांसपेशियों के बीच बेहतर तालमेल के लिए विटामिन-D महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह उम्र के साथ होने वाले सार्कोपेनिया के खतरे को कम करने में सहायक है। अतः धूप सेंकें या अपने डॉक्टर की सलाह पर विटामिन डी एवं कैल्शियम सप्लीमेंट लें।
हार्मोन थेरेपी : कुछ मामलों में टेस्टोस्टेरोन सप्लीमेंटेशन से मांसपेशियों की ताकत में सुधार देखा गया है। आप अपने चिकित्सक की सलाह से उचित हार्मोन थैरपी एवं अन्य अमीनो एसिड सप्लीमेंट ले सकते हैं।
“कहा जाता है कि बुढ़ापा हड्डियों से नहीं, बल्कि मांसपेशियों के कम होने से शुरू होता है। सार्कोपेनिया और शेष जीवन काल के बीच एक गहरा और सीधा आनुपातिक संबंध है। यह जीवन प्रत्याशा (Life Expectancy) के घटने का एक प्रमुख संकेतक है।”
सार्कोपेनिया का प्रबंधन सीधे तौर पर आपकी आयु और जीवन की सक्रियता से जुड़ा है। इसे रोक जा सकता है एवं यह पूरी तरह से रिवर्सिबल भी है। यह केवल बुढ़ापे का हिस्सा नहीं है। बल्कि एक ऐसी स्थिति है जिसे हम अपनी आदतों से बदल सकते हैं। इसके लिए सक्रिय जीवनशैली अपनाना चाहिए, व्यायाम करना चाहिए एवं प्रोटीन युक्त संतुलित आहार लेना चाहिए। जरूरी होने पर चिकित्सक की सलाह अनुसार उचित इलाज भी कराया जा सकता है।
ज़मीन पर मौजूद सभी प्राणियों के क्रमिक विकास में भोजन की कमी एक बड़ी ताकत रहा है। दुनियाँ में कई जानवर साल के उन दिनों में जब भोजन नहीं मिल पाता, हाइबरनेशन (सुप्तावस्था) में चले जाते हैं और वातावरण के अनुकूल होने पर फिर सक्रिय हो जाते हैं।
मानव प्रजाति को भी प्राचीनकाल में बार-बार अकाल का सामना करना पड़ता था। वे व्यक्ति जो अकाल की अवस्था में भूख एवं भोजन की कमी को बर्दाश्त कर जाते थे वे ही जी पाते थे। इस तरह हम देखते हैं कि क्रमिक विकास के दौरान हमने भूखे रहना व भोजन की कमी के दिनों में जीना सीख लिया है। हमारा मेटाबॉलिज्म क्रमिक विकास में इस तरह विकसित हो गया है कि हम कई दिनों की भोजन की कमी को सह सकते हैं।
आधुनिक समय में अकाल नहीं पड़ते एवं भोजन प्रचुर मात्रा में उपलब्ध रहता है और हम इसे प्रचुर मात्रा में खाते रहते हैं। खाने की यही प्रचुरता और व्यायाम की कमी ही आज मधुमेह जैसे अनेक रोगों का मूल कारण है।
दुनियाँ के सभी धर्मों में किसी-न-किसी प्रकार का उपवास/रोज़ा रखने की परम्परा है। शायद यह परम्परा हमें अकाल के उन बुरे दिनों की याद दिलाने के लिये एवं हमारे मेटाबॉलिज्म को भोजन की कमी से अभ्यस्त रखने की एक व्यवस्था है। उपवास अनेक प्रकार के हो सकते हैं। कई धर्मों में उपवास के दौरान विशेष प्रकार के खाद्य पदार्थ खाने की छूट होती है। अक्सर देखा जाता है कि यह सभी खाद्य पदार्थ गरिष्ठ होते हैं, और उपवास के दिन अन्य दिनों की अपेक्षा ज्यादा कैलोरी खा ली जाती हैं।
रमज़ान के पवित्र माह में रोज़ा रखना मुसलमानों का फर्ज़ माना जाता है, परंतु इस्लाम में कुछ परिस्थितियों में रोज़ा न रखने की छूट दी गई है। रोज़े में सुबह सूरज निकलने से शाम को सूरज डूबने तक खाना-पीना झूठ बोलना किसी को बुरा-भला कहना, किसी भी तरह का गुनाह करना वर्जित है। इस्लाम के अनुसार रमज़ान का महीना एक तरह से वह ट्रेनिंग है जो हमें सिखाती है कि आने वाले ग्यारह महीने कैसे गुज़ारने हैं। रोज़े के पीछे एक मक़सद यह भी है कि जब हम भूखे-प्यासे रहेंगे तभी हमें किसी गरीब, मज़दूर, बेरोज़गार, परेशान हाल इन्सान की भूख व प्यास का एहसास होगा और फिर हमारे दिल में उसकी मदद करने का जज़्बा पैदा होगा। यही कारण है कि इस्लाम में यह व्यवस्था की गई है कि यदि किन्हीं हालात में मुसलमान रोज़ा नहीं रख पाता, तब कुछ गरीब, ज़रूरतमंदों को खाना खिलाकर उसका खामियाज़ा दिया जा सकता है।
डॉक्टर की उलझन:
हमारे देश में लगभग सोलह करोड़ मुसलमान हैं। एक अनुमान के हिसाब से इनमें से पचपन लाख मुसलमान मधुमेह रोगी हैं। रमज़ान के दौरान यह सभी मुसलमान दिल से रोज़ा रखना चाहते हैं। इलाज करने वाले डॉक्टर के लिये यह बड़ी उलझन की बात हो जाती है कि क्या वह मधुमेह रोगी मुसलमान मरीज़ों को रोज़ा रखने दें?
इसी संदर्भ में मुस्लिम धार्मिक ग्रंथ (हदीस) के अनुसार मक्का में जब मोहम्मद साहब ने मुसलमानों से कहा कि अल्लाह का आदेश है कि तुम्हें रोज़ा रखना है, उनके ये शब्द सुनते ही उसी समय सबने रोज़ा रख लिया। यहाँ तक कि माताओं ने बच्चों को दूध नहीं पिलाया। सूरज ढलने के बाद जब सबने रोज़ा खोला तो मोहम्मद साहब को पता चला कि दुधमुँहे बच्चों को दूध नहीं पिलाया गया, तो वे बहुत नाराज़ हुये और उन्होंने बताया कि रोज़ा फर्ज़ है मगर सभी पर नहीं।
इस्लाम में नीचे लिखी परिस्थितियों में रोज़ा न रखने की छूट दी जाती है :-
इसी संदर्भ में बीमार व्यक्तियों को खासकर उन्हें जिनकी बीमारी रोज़े से बढ़ सकती है, रोज़े से छूट के हकदार हैं। मधुमेह मरीज़ों को इसी श्रेणी में रखा जा सकता है। जो मधुमेह मरीज़ मधुमेह के विकारों से ग्रस्त हैं, जो इंसुलिन ले रहे हैं, जिन्हें मधुमेह के साथ दिल या गुर्दे की बीमारी भी हो गई है उन्हें अपने डॉक्टर से सलाह कर, उचित जाँचें करवाकर व पूरी सावधानी से ही रोज़ा रखना चाहिये। यहाँ डॉक्टर पर बड़ी ज़िम्मेदारी आ जाती है कि वह मरीज़ को रोज़ा रखने की अनुमति दे या नहीं। यहाँ हम यह भी सलाह देंगे कि हो सके तो मधुमेह मरीज़ रमज़ान के महीने से पहले शाबान के महीने में रोज़े की ट्रायल करके देख लें।
मेडिकल दृष्टि से निम्न परिस्थितियों में रोज़ा नहीं रखना चाहिये:-
रोज़े के दौरान ग्लूकोमीटर से खून में शुगर देखने से रोज़ा नहीं टूटता। यह बात कई इस्लामिक देशों की मधुमेह एसोसिएशन कहती हैं। कुछ मधुमेह एसोसिएशन तो इंसुलिन का इंजेक्शन लगाने को भी रोज़े का उल्लंघन नहीं मानतीं।
अंत में हम यही कहेंगे कि अधिकांश मधुमेह रोगी सुरक्षित रूप से रोज़ा रख कर पुण्य कमा सकते हैं। ज़रूरत सावधानी की है और यह भी ज़रूरी है कि ज़्यादा बीमार व शुगर का कंट्रोल अच्छा न होने पर रोज़ा न रखने की छूट इस्लाम आपको देता है।*
40 वर्षीय श्री रजत अग्रवाल एक सरकारी महकमे में अफसर हैं। एक माह पहले सुबह-सुबह छाती में तीव्र पीड़ा हुई, घर वाले अस्पताल लेकर भागे, जहाँ उन्हें बताया गया कि उन्हें हार्ट अटैक हो गया है एवं स्थिति गंभीर है। लगभग दो हफ्ते अस्पताल में रहने के बाद, उन्हें सलाह दी गई कि उन्हें बायपास ऑपरेशन करा लेना चाहिये।
श्री रजत अग्रवाल के घर परिवार के सदस्य इस बात को लेकर परेशान हैं कि उन्हें इतनी कम उम्र में हार्ट अटैक क्यों हो गया? जबकि उन्हें न तो ब्लड प्रेशर था न ही डायबिटीज थी न ही वो धूम्रपान एवं तम्बाकू का उपयोग करते थे, और न ही वो मोटे थे। उनके परिवार में भी किसी को हार्ट अटैक होने का इतिहास नहीं था। इस प्रश्न का उत्तर जानने के लिये हमें रजत जी की दिनचर्या, स्वभाव एवं मानसिक तनाव को गहराई से समझना पड़ेगा।
रजत जी काफी अंतर्मुखी स्वभाव के व्यक्ति हैं, न किसी की तारीफ कर सकते हैं, न किसी की तारीफ सुन सकते हैं। अक्सर अपने सहकर्मी व सीनियर्स से उनकी पटरी नहीं बैठती। किन्हीं कारणों से उन्हें समय पर पदोन्नति नहीं मिल सकी। घर पर भी वे अपने बच्चों की पढ़ाई एवं व्यवहार से काफी असंतुष्ट रहते हैं। बीवी-बच्चे उनके सामने जाने से कतराते हैं। बच्चों एवं घर पर किसी भी सदस्य का टी.वी. देखना या संगीत सुनना रजत जी को बिल्कुल नहीं सुहाता था। आज तक एक भी ऐसा मौका नहीं आया कि रजत जी, परिवार या दोस्तों के साथ सैर-सपाटे के लिये गये हों या पिक्चर देखने गये हों।
इस तरह हम देखते हैं कि रजत जी के जीवन में उन्होंने मानसिक तनाव को ही अपना जीवनसाथी बना लिया है और उनके जीवन में मनोरंजन एवं खुशी का पूर्ण अभाव है।
आईये देखें मनोरंजन होता क्या है?
मनोरंजन के शब्दकोष की परिभाषा जो भी हो परंतु हम यह कह सकते हैं कि अपनी दिनचर्या में बिताया गया वह समय है जब हम दुनियाँदारी के सब ग़म भूलकर, मन को खुशी देने वाले किसी कार्य में व्यस्त हो जाते हैं। चाहे ये समय हम क्रिकेट मैच देख लें, अच्छा संगीत सुन लें, कोई अच्छी पिक्चर देख लें या दोस्तों के साथ बैठकर गपशप मार लें। कुछ लोग ग़म ग़लत करने के लिये शराब का भी सहारा ले लेते हैं। कुछ लोग ध्यान, योग अथवा खेलकूद द्वारा शारीरिक फिटनेस भी प्राप्त कर लेते हैं।
यदि हम मनोरंजन शब्द का संधि-विच्छेद करके देखें तो हम पायेंगे “मनः+ रंजन” अर्थात मन को खुश करना, रंजन का अर्थ खुश या प्रसन्न करना होता है।
शुद्ध व्याकरण को परे रखकर, अन्य तरीके से इस शब्द को तोड़ने पर हम पाएंगे “मन+रंज+न” यानि वह समय जिसमें मन में कोई रंज न हो।
अनेक शोधों से पता चला है कि मनोरंजन का अभाव हार्ट अटैक के ख़तरे को काफी हद तक बढ़ा देता है।
आईये देखें मनोरंजन का फायदा उठाने के लिये हम क्या-क्या कर सकते हैं :-
खेलकूद : यदि आप अपनी दिनचर्या में आधा से एक घंटा किसी पसंद के खेल के लिये निकाल लें तो यह सोने पे सुहागे की तरह है। इसमें मनोरंजन के साथ व्यायाम भी हो जायेगा और साथ ही दोस्ती और गपशप भी। बेडमिन्टन, टेबिल-टेनिस, टेनिस, तैराकी जैसे खेल अपने आप में बहुत अच्छे व्यायाम भी हैं। इनडोर खेल जैसे- केरम, ताश आदि मनोरंजन का साधन हो सकते हैं परंतु आपको व्यायाम के लिये अलग से समय निकालना होगा।
साहित्य संगीत :- अच्छा मनपसंद साहित्य पढ़ना अथवा परिवार जनों/दोस्तों के साथ संगीत सुनना या अच्छी मूवी देखना भी मनोरंजन का अच्छा तरीका है।
सैर-सपाटा :- सप्ताह में एक बार परिवार के साथ अथवा दोस्तों के साथ सैर-सपाटे पर जाना मनोरंजन का बेहतरीन तरीका है। जिसके दौरान आप अपनी चिंतायें भूल जाते हैं एवं सामाजिक ताल-मेल भी बढ़ेगा। साल में एक बार छुट्टियाँ मनाने अपने शहर के बाहर जाना भी काफी आनंद दायक हो सकता है। अक्सर यह देखा गया है कि छुट्टियाँ मनाते समय गंभीर रोगी भी अपने आप को स्वस्थ महसूस करते हैं। यही नहीं यह भी देखा गया है कि छुट्टियों का आनंद लेते समय गंभीर रोगियों को भी हार्ट अटैक नहीं होते। छुट्टियों से लौटने के बाद भी आनंद की अनुभूति कई दिनों तक बरकरार रहती है व अपने दिन-प्रतिदिन के काम को अच्छे से करने की स्फूर्ति प्रदान करती है।
मेल-मिलाप एवं दोस्ती यारी :- अकेलापन अपने आप में मानसिक तनाव का एक बड़ा कारण है। समाज से कटे लोगों पर बुढ़ापे की मार जल्दी पड़ती है। सामाजिक मेल-मिलाप, मेल-जोल एवं हँसी-मजाक, जीवन का एक ज़रूरी आयाम है। इसका अभाव डिप्रेशन, चिड़चिड़ापन व मानसिक तनाव पैदा करता है। ऐसे व्यक्तित्व वाले लोग दूसरों से शिकायत, निंदा एवं ईर्ष्या कर खुद अपनी सेहत को बिगाड़ते हैं।
यदि आप भी इस तरह का व्यक्तित्व रखते हैं तो इसे धीरे-धीरे बदलिये। इससे आपकी सेहत पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। यदि आप दूसरों की तारीफ करेंगे तो वे भी आपकी तारीफ करेंगे। याद रखिये जिनकी कोई तारीफ नहीं करता उन्हें अपनी तारीफ खुद करनी पड़ती है। अपने मुँह मियाँ मिट्ठू न बनना ही अच्छा है।
तो साथियों, यदि आप स्वस्थ रहना चाहते हैं, तो मनोरंजन को अपने जीवन में अवश्य अपनायें। मनोरंजन स्वास्थ्य के लिये एक बेहतरीन टॉनिक है, जो आपको मानसिक तनाव, हाई बी.पी., हाई शुगर एवं हार्ट अटैक से बचाने में सहायक है। मानसिक तनाव द्वारा उत्पन्न होने वाले अनेक हार्मोन संबंधी परिवर्तनों को हम मनोरंजन द्वारा बेअसर कर सकते हैं। अतः स्वास्थ्य रहने के लिए चिंता छोड़िये और मनोरंजन की कोई गतिविधि अपनाईये। ●●●
शरीर को अपनी विभिन्न कार्य प्रणालियों के लिए वसा (Lipids) की ज़रूरत होती है। स्नायु तंत्र (Nervous System) ख़ासकर दिमाग़ की कार्यप्रणाली के लिए वसा की अहम भूमिका रहती है। शरीर को कई हार्मोन बनाने के लिए कोलेस्ट्रॉल (Cholesterol) चाहिए। शरीर की लगभग सभी कोशिकाओं (Cell) की बाहरी दीवार में भी वसा रहती है।
वसा (Lipids) के दो प्रकार के होते हैं :–
(1) ट्राइग्लिसराइड (Triglyceride)
(2) कोलेस्ट्रॉल (Cholesterol)
ट्राइग्लिसराइड में एक ग्लिसरॉल की रीढ़ होती है जिस पर तीन फैटी एसिड लगे होते हैं। इन फैटी एसिड के प्रकार के अनुसार हम सैचुरेटेड या अनसैचुरेटेड (Saturated or Unsaturated) वसा को वर्गीकृत करते हैं।
दूसरी ओर कोलेस्ट्रॉल एक षट्कोणीय अणु होता है, जिसके कोणों पर लगे रासायनिक समूहों में परिवर्तन द्वारा कई नए रसायन और हार्मोनों का निर्माण शरीर करता है।
तो इस प्रकार हम देखते हैं कि लिपिड दो प्रकार के होते हैं और ये दोनों ही शरीर की सभी कोशिकाओं की ज़रूरत हैं। इन्हें शरीर के सभी भागों में खून द्वारा पहुँचाया जाता है। पर यहाँ समस्या यह आती है कि वसा पानी में अघुलनशील है और खून का आधार पानी ही है।
खून में वसा को लाने-ले जाने के लिए एक विशेष व्यवस्था प्रकृति ने कर रखी है। इसमें लिपिड व प्रोटीन को मिलाकर छोटे-छोटे पैकेट बनाए जाते हैं जो वसा को लाने-ले जाने के लिए वाहन का काम करते हैं। इन पैकेटों को लाइपोप्रोटीन कहते हैं और ये मुख्य रूप से लिवर में बनाए जाते हैं।
हम जो भी वसा का सेवन करते हैं (तेल, घी, चर्बी व अनाज आदि में न दिखने वाली) वह आँतों में पचकर पहले लिवर में पहुँचती है। यहाँ उसकी पैकेजिंग कर उसे लाइपोप्रोटीन में रखा जाता है और खून में छोड़ दिया जाता है।
भोजन में कोलेस्ट्रॉल के मुख्य स्रोत गैर-शाकाहारी भोजन ही हैं जैसे दूध व दूध से बने पदार्थ (Dairy Products), अंडे का पीला भाग व मांस। जबकि ट्राइग्लिसराइड सभी प्रकार के वनस्पति तेलों, अनाज, घी, मक्खन एवं चर्बी युक्त मांसाहारी भोजन से प्राप्त होता है। शरीर स्वयं भी कोलेस्ट्रॉल बनाता है।
खून में वसा को ले जाने वाले लाइपो-प्रोटीन कई प्रकार के होते हैं। इनका वर्गीकरण (Classification) इनके घनत्व (Density) के अनुसार होता है। इनका घनत्व इनमें मौजूद कोलेस्ट्रॉल, ट्राइग्लिसराइड व प्रोटीन के अनुपात के अनुसार बदलता है।
मुख्य रूप से लाइपोप्रोटीन तीन प्रकार के होते हैं :–
1- LDL कोलेस्ट्रॉल (Low Density Lipoprotein – Cholesterol)
2- HDL कोलेस्ट्रॉल (High Density Lipoprotein – Cholesterol)
3- VLDL कोलेस्ट्रॉल (Very Low Density Lipoprotein – Cholesterol)
विभिन्न प्रकार के लाइपोप्रोटीन शरीर में अलग-अलग काम करते हैं। LDL कोलेस्ट्रॉल (LDL-C) का मुख्य काम कोलेस्ट्रॉल व ट्राइग्लिसराइड को ले जाकर शरीर के विभिन्न अंगों व खून की नलियों में छोड़ना है। ये उस प्रकार के ट्रक हैं जो माल (कोलेस्ट्रॉल) ले जाकर गंतव्य पर गिरा आते हैं।
यही वे वाहन हैं जो दिल व दिल की नलियों में भी कोलेस्ट्रॉल जमा कर देते हैं जो आगे जाकर नलियों को चोक कर हार्ट अटैक का खतरा पैदा कर देते हैं। इसी कारण LDL कोलेस्ट्रॉल को खतरनाक कहा जाता है। इसके खून में बढ़ने पर इसे कम करना अत्यंत आवश्यक है और इसके लिए दवाइयाँ लेनी ही चाहिए।
दूसरी ओर HDL कोलेस्ट्रॉल लाइपोप्रोटीन का काम शरीर के विभिन्न ऊतकों (Tissues) और खून की नलिकाओं में जमा कोलेस्ट्रॉल व ट्राइग्लिसराइड को निकाल कर वापस लाने का है। ये नगर निगम के उन ट्रकों जैसे हैं जो कूड़ा-कर्कट उठा कर शहर की सफाई में महत्वपूर्ण योगदान करते हैं।
तो यह साफ है कि यदि HDL कोलेस्ट्रॉल लाइपोप्रोटीन अधिक होगा तो धमनियों की सफाई अच्छे से होती रहेगी और हार्ट-अटैक व पैरालिसिस होने का खतरा कम हो जाएगा। परंतु यदि यह कम हो तो इन बीमारियों का खतरा बढ़ जाएगा।
लिपिड प्रोफाइल टेस्ट से हम खून में मौजूद वसा व लाइपोप्रोटीन की मात्रा की जाँच करते हैं। इस टेस्ट को लिपिडोग्राम भी कहते हैं। सामान्यतः इस टेस्ट में खून में मौजूद कोलेस्ट्रॉल एवं ट्राइग्लिसराइड (स्वतंत्र तथा लाइपोप्रोटीन में मौजूद) की मात्रा तथा विभिन्न लाइपोप्रोटीनों की मात्रा का पता लगाया जाता है।
लिपिड प्रोफाइल टेस्ट से किसी व्यक्ति में हृदय रोग या पैरालिसिस होने के खतरे का काफ़ी सही अनुमान लगाया जा सकता है। साथ ही खून में वसा कम करने वाली दवाइयों के सही चयन के लिए भी यह टेस्ट बहुत ज़रूरी है।
मधुमेह के मरीजों, जिन्हें हार्ट-अटैक व पैरालिसिस का खतरा पहले से ही बहुत बढ़ा हुआ रहता है, यह टेस्ट बहुत ज़रूरी है। शोध द्वारा पता चला है कि अकेले शुगर कंट्रोल से मधुमेही मरीजों में हार्ट-अटैक का खतरा बहुत ज़्यादा कम नहीं किया जा सकता।
इसके लिए कोलेस्ट्रॉल और बी.पी. कंट्रोल करना ज़्यादा ज़रूरी माना गया है।
किसे कराना चाहिए लिपिड प्रोफाइल टेस्ट?
● सभी मधुमेह के रोगियों को साल में दो बार।
● यदि आप मेटाबोलिक सिंड्रोम के दायरे में हैं।
● यदि आपको हाई बी.पी. है।
● यदि आपको इस्केमिक हृदय रोग है।
● यदि आप मोटे हैं और तीस साल की उम्र पार कर चुके हैं।
● उन सभी व्यक्तियों को जिनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि में मधुमेह, हृदय रोग, हाई बी.पी. या कोलेस्ट्रॉल की गड़बड़ी है।
● यदि आपको धूम्रपान की लत है।
● यदि आपकी जीवनशैली शारीरिक श्रम रहित और तनावपूर्ण है।
उपरोक्त सभी व्यक्तियों को साल में दो बार लिपिड प्रोफाइल टेस्ट अवश्य करना चाहिए।
लिपिड प्रोफाइल टेस्ट कराते समय क्या ध्यान रखें?
आजकल पैथोलॉजी टेस्ट करने वाली लैब की बाढ़-सी आ गई है, जिनमें से कई टेस्ट की गुणवत्ता पर ध्यान नहीं देतीं। आइए देखें क्या बातें ध्यान देने की हैं।
लिपिड प्रोफाइल टेस्ट रात के 8–10 घंटे खाली पेट रहने के बाद सुबह 7–9 बजे कराना चाहिए। भारी वसा युक्त भोजन व शराब पीने के बाद खून में वसा खासकर ट्राइग्लिसराइड की मात्रा 10 से 12 घंटे तक बढ़ी रह सकती है।
यदि आपके कोलेस्ट्रॉल और अन्य वसा के प्रकार बढ़े हुए आते हैं तो इसका एक महत्वपूर्ण कारण थायरॉयड हार्मोन की कमी (Hypothyroidism) भी हो सकता है। ऐसी अवस्था में थायरॉयड के इलाज से ही लिपिड प्रोफाइल की गड़बड़ी कुछ ही हफ्तों में ठीक हो सकती है।
यदि हम हार्ट अटैक के खतरे और इलाज की दृष्टि से देखें तो सबसे महत्वपूर्ण है खून में LDL कोलेस्ट्रॉल की मात्रा। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि अधिकतर लैब LDL कोलेस्ट्रॉल को मापती नहीं हैं, बल्कि एक फॉर्मूला का प्रयोग कर अनुमानित मात्रा निकाल देती हैं।
यह फॉर्मूला निम्नानुसार है :–
● LDL Cholesterol = Total Cholesterol – (HDL Cholesterol + VLDL Cholesterol)
● VLDL Cholesterol = Triglyceride / 5
यदि ट्राइग्लिसराइड की मात्रा 300 mg/dl से अधिक हो तो यह फॉर्मूला सही अनुमान नहीं देता। LDL कोलेस्ट्रॉल को सीधे मापना महँगा टेस्ट है।
आप लैब से यह अवश्य जाँच करें कि वे Direct LDL – Cholesterol टेस्ट कर रहे हैं या नहीं। आपके डॉक्टर आपके LDL कोलेस्ट्रॉल को केंद्र बिंदु बनाकर ही दवा का निर्धारण करते हैं।
रिपोर्ट का क्या अर्थ है?
जैसा कि हम पहले ही कह चुके हैं कि इस टेस्ट से हम हृदय रोग खासकर हार्ट अटैक और ब्रेन अटैक (पैरालिसिस) के खतरे का अनुमान लगाने व रोकथाम के लिए इलाज की नीति बनाने में मदद करते हैं।
यदि आप मधुमेह के मरीज हैं तो आपके LDL कोलेस्ट्रॉल का स्तर 100 mg/dl से कम रहना चाहिए। यदि यह इससे अधिक है तो दवाइयों द्वारा इसे 100 से नीचे लाना चाहिए।
स्टैटिन ग्रुप की दवाइयाँ इसमें बहुत कारगर हैं और इनके प्रयोग से हार्ट अटैक का खतरा लगभग 50% तक कम हो जाता है।
ताज़ा शोधों में यह कहा गया है कि यदि मधुमेही व्यक्ति को हृदय रोग हो चुका है या वह धूम्रपान करता है या उसे हाई बी.पी. भी है तो LDL कोलेस्ट्रॉल को 70 mg/dl से भी नीचे रखना चाहिए।
HDL कोलेस्ट्रॉल को दिल का दोस्त कहा जाता है। इसका बढ़ा हुआ होना आपको हार्ट अटैक से बचाता है। इसकी मात्रा पुरुषों में 40 mg/dl से अधिक होनी चाहिए तथा महिलाओं में 50 mg/dl से अधिक होनी चाहिए। नियमित व्यायाम HDL कोलेस्ट्रॉल को बढ़ाने का अच्छा उपाय है। भोजन में ओमेगा–3 फैटी एसिड की मात्रा बढ़ाने से भी HDL कोलेस्ट्रॉल बढ़ता है। इसके लिए भोजन में मछली, सूखे मेवे और सरसों के तेल का प्रयोग करना उपयुक्त होगा। धूम्रपान या तंबाकू का सेवन HDL कोलेस्ट्रॉल को कम करता है। मधुमेह में ट्राइग्लिसराइड की मात्रा खून में अधिकतर बढ़ी हुई पाई जाती है। खून में ग्लूकोज़ पर अच्छा नियंत्रण रखने से यह अपने आप कम हो सकती है। ट्राइग्लिसराइड का बढ़ा होना भी हृदय रोग का खतरा बढ़ाता है।
जब ट्राइग्लिसराइड का स्तर 500 mg/dl से ऊपर हो जाता है तो पैंक्रियाज में सूजन आ सकती है जिससे पैंक्रियाटाइटिस नामक खतरनाक बीमारी भी हो सकती है। शराब के सेवन से ट्राइग्लिसराइड की मात्रा बढ़ जाती है। ट्राइग्लिसराइड को कम करने के लिए फेनोफाइब्रेट नामक दवा का प्रयोग किया जाता है। हार्ट अटैक के खतरे (Risk Factor) का अनुमान लगाने का एक और फॉर्मूला है :–
Total Cholesterol ÷ HDL Cholesterol
यदि यह 5 से अधिक आता है तो खतरा बहुत ज़्यादा है। परंतु LDL कोलेस्ट्रॉल की मात्रा का हृदय रोग से सबसे अधिक संबंध होता है।
तो दोस्तों आज हमने आपको लिपिड प्रोफाइल जाँच की विस्तृत जानकारी देने का प्रयास किया। यदि आप मधुमेह के रोगी हैं और आपके दिल में दिल का ज़रा भी ख़याल है तो ज़रूर साल में दो बार यह जाँच कराएँ।
जब डायबिटीज के मरीज ग्लूकोज नियंत्रण के लिए अपने आहार में परिवर्तन करते हैं, तब उन्हे विभिन्न खाद्य पदार्थों के ग्लाइसेमिक इंडेक्स का ज्ञान होना बहुत आवश्यक है। किसी भी भोजन का ग्लाइसेमिक इंडेक्स निकालने के लिए अभी हमें मानव वोलेंटियर की जरूरत होती है। जिन्हे निर्धारित भोजन देने के बाद बार बार उनके खून के सेंपल लेकर खून में ग्लूकोज की मात्रा मापी जाती है। यह एक कठिन कार्य है। हाल ही में आईआईटी गोहाटी के वैज्ञानिकों ने ऐसी छोटी मशीन का आविष्कार किया है, जिसमें किसी भी भोज्य पदार्थ को डालने के पांच मिनट के अंदर उस भोज्य पदार्थ का ग्लाइसेमिक इंडेक्स बता सकती है। शोध कर्ताओं ने यह दावा किया है कि इस छोटी सी मशीन को कहीं भी ले जाया जा सकता है। इस मशीन के रिजल्ट बहुत सटीक होने का दावा किया गया है। साथ ही यह किफायती भी है।
इस मशीन से डायबिटीज के मरीजों को संतुलित आहार के चयन में बहुत मदद मिलेगी।
डायबिटीज के मरीजों को ये सलाह दी जाती है कि, चावल न खाएं या कम खाएं। इसका मुख्य कारण यह है कि पके हुए सफेद चावल का ग्लाइसेमिक इंडेक्स बहुत ज्यादा होता है। सामान्य रूप से खाए जाने वाले सफेद चावल की ग्लाइसेमिक इंडेक्स 70 से 80 होती है। जिसके कारण चावल खाने के बाद खून में शुगर की मात्रा तेजी से बढ़ती है।
विश्व के अनेक भागों में और हमारे देश में भी चावल मुख्य आहार है। तमिलनाडु सहित दक्षिण के कई प्रांत, एवं बंगाल, असम, कश्मीर, इसके मुख्य उदाहरण हैं।
कृषि वैज्ञानिक काफी समय से चावल की ऐसी किस्म विकसित करने की कोशिश कर रहे थे, जिसमें चावल का ग्लाइसेमिक इंडेक्स कम हो एवं प्रोटीन की मात्रा अधिक हो।
हाल ही में ( IRRI ) इंटरनेशनल राइस रिसर्च इंस्टीट्यूट जिसका मुख्यालय फिलीपींस में है और इसकी एक शाखा वाराणसी में है। IRRI ने घोषणा की है कि उन्होंने चावल की एक ऐसी किस्म विकसित की है जिसका ग्लाइसेमिक इंडेक्स 44 से 47 प्रतिशत है। इसमें फाइबर और प्रोटीन की मात्रा भी अधिक है।
यह शोध न सिर्फ मधुमेह के मरीजों बल्कि किसानों के लिए भी क्रांतिकारी होगा।