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मनोरंजन… और आपकी सेहत

​40 वर्षीय श्री रजत अग्रवाल एक सरकारी महकमे में अफसर हैं। एक माह पहले सुबह-सुबह छाती में तीव्र पीड़ा हुई, घर वाले अस्पताल लेकर भागे, जहाँ उन्हें बताया गया कि उन्हें हार्ट अटैक हो गया है एवं स्थिति गंभीर है। लगभग दो हफ्ते अस्पताल में रहने के बाद, उन्हें सलाह दी गई कि उन्हें बायपास ऑपरेशन करा लेना चाहिये।
​श्री रजत अग्रवाल के घर परिवार के सदस्य इस बात को लेकर परेशान हैं कि उन्हें इतनी कम उम्र में हार्ट अटैक क्यों हो गया? जबकि उन्हें न तो ब्लड प्रेशर था न ही डायबिटीज थी न ही वो धूम्रपान एवं तम्बाकू का उपयोग करते थे, और न ही वो मोटे थे। उनके परिवार में भी किसी को हार्ट अटैक होने का इतिहास नहीं था। इस प्रश्न का उत्तर जानने के लिये हमें रजत जी की दिनचर्या, स्वभाव एवं मानसिक तनाव को गहराई से समझना पड़ेगा।
​रजत जी काफी अंतर्मुखी स्वभाव के व्यक्ति हैं, न किसी की तारीफ कर सकते हैं, न किसी की तारीफ सुन सकते हैं। अक्सर अपने सहकर्मी व सीनियर्स से उनकी पटरी नहीं बैठती। किन्हीं कारणों से उन्हें समय पर पदोन्नति नहीं मिल सकी। घर पर भी वे अपने बच्चों की पढ़ाई एवं व्यवहार से काफी असंतुष्ट रहते हैं। बीवी-बच्चे उनके सामने जाने से कतराते हैं। बच्चों एवं घर पर किसी भी सदस्य का टी.वी. देखना या संगीत सुनना रजत जी को बिल्कुल नहीं सुहाता था। आज तक एक भी ऐसा मौका नहीं आया कि रजत जी, परिवार या दोस्तों के साथ सैर-सपाटे के लिये गये हों या पिक्चर देखने गये हों।
​इस तरह हम देखते हैं कि रजत जी के जीवन में उन्होंने मानसिक तनाव को ही अपना जीवनसाथी बना लिया है और उनके जीवन में मनोरंजन एवं खुशी का पूर्ण अभाव है।

​ आईये देखें मनोरंजन होता क्या है?

मनोरंजन के शब्दकोष की परिभाषा जो भी हो परंतु हम यह कह सकते हैं कि अपनी दिनचर्या में बिताया गया वह समय है जब हम दुनियाँदारी के सब ग़म भूलकर, मन को खुशी देने वाले किसी कार्य में व्यस्त हो जाते हैं। चाहे ये समय हम क्रिकेट मैच देख लें, अच्छा संगीत सुन लें, कोई अच्छी पिक्चर देख लें या दोस्तों के साथ बैठकर गपशप मार लें। कुछ लोग ग़म ग़लत करने के लिये शराब का भी सहारा ले लेते हैं। कुछ लोग ध्यान, योग अथवा खेलकूद द्वारा शारीरिक फिटनेस भी प्राप्त कर लेते हैं।
​यदि हम मनोरंजन शब्द का संधि-विच्छेद करके देखें तो हम पायेंगे “मनः+ रंजन” अर्थात मन को खुश करना, रंजन का अर्थ खुश या प्रसन्न करना होता है।
शुद्ध व्याकरण को परे रखकर, अन्य तरीके से इस शब्द को तोड़ने पर हम पाएंगे “मन+रंज+न” यानि वह समय जिसमें मन में कोई रंज न हो।
अनेक शोधों से पता चला है कि मनोरंजन का अभाव हार्ट अटैक के ख़तरे को काफी हद तक बढ़ा देता है।

आईये देखें मनोरंजन का फायदा उठाने के लिये हम क्या-क्या कर सकते हैं :-

खेलकूद : यदि आप अपनी दिनचर्या में आधा से एक घंटा किसी पसंद के खेल के लिये निकाल लें तो यह सोने पे सुहागे की तरह है। इसमें मनोरंजन के साथ व्यायाम भी हो जायेगा और साथ ही दोस्ती और गपशप भी। बेडमिन्टन, टेबिल-टेनिस, टेनिस, तैराकी जैसे खेल अपने आप में बहुत अच्छे व्यायाम भी हैं। इनडोर खेल जैसे- केरम, ताश आदि मनोरंजन का साधन हो सकते हैं परंतु आपको व्यायाम के लिये अलग से समय निकालना होगा।
साहित्य संगीत :- अच्छा मनपसंद साहित्य पढ़ना अथवा परिवार जनों/दोस्तों के साथ संगीत सुनना या अच्छी मूवी देखना भी मनोरंजन का अच्छा तरीका है।
सैर-सपाटा :- सप्ताह में एक बार परिवार के साथ अथवा दोस्तों के साथ सैर-सपाटे पर जाना मनोरंजन का बेहतरीन तरीका है। जिसके दौरान आप अपनी चिंतायें भूल जाते हैं एवं सामाजिक ताल-मेल भी बढ़ेगा। साल में एक बार छुट्टियाँ मनाने अपने शहर के बाहर जाना भी काफी आनंद दायक हो सकता है। अक्सर यह देखा गया है कि छुट्टियाँ मनाते समय गंभीर रोगी भी अपने आप को स्वस्थ महसूस करते हैं। यही नहीं यह भी देखा गया है कि छुट्टियों का आनंद लेते समय गंभीर रोगियों को भी हार्ट अटैक नहीं होते। छुट्टियों से लौटने के बाद भी आनंद की अनुभूति कई दिनों तक बरकरार रहती है व अपने दिन-प्रतिदिन के काम को अच्छे से करने की स्फूर्ति प्रदान करती है।
मेल-मिलाप एवं दोस्ती यारी :- अकेलापन अपने आप में मानसिक तनाव का एक बड़ा कारण है। समाज से कटे लोगों पर बुढ़ापे की मार जल्दी पड़ती है। सामाजिक मेल-मिलाप, मेल-जोल एवं हँसी-मजाक, जीवन का एक ज़रूरी आयाम है। इसका अभाव डिप्रेशन, चिड़चिड़ापन व मानसिक तनाव पैदा करता है। ऐसे व्यक्तित्व वाले लोग दूसरों से शिकायत, निंदा एवं ईर्ष्या कर खुद अपनी सेहत को बिगाड़ते हैं।
​यदि आप भी इस तरह का व्यक्तित्व रखते हैं तो इसे धीरे-धीरे बदलिये। इससे आपकी सेहत पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। यदि आप दूसरों की तारीफ करेंगे तो वे भी आपकी तारीफ करेंगे। याद रखिये जिनकी कोई तारीफ नहीं करता उन्हें अपनी तारीफ खुद करनी पड़ती है। अपने मुँह मियाँ मिट्ठू न बनना ही अच्छा है।
​तो साथियों, यदि आप स्वस्थ रहना चाहते हैं, तो मनोरंजन को अपने जीवन में अवश्य अपनायें। मनोरंजन स्वास्थ्य के लिये एक बेहतरीन टॉनिक है, जो आपको मानसिक तनाव, हाई बी.पी., हाई शुगर एवं हार्ट अटैक से बचाने में सहायक है। मानसिक तनाव द्वारा उत्पन्न होने वाले अनेक हार्मोन संबंधी परिवर्तनों को हम मनोरंजन द्वारा बेअसर कर सकते हैं। अतः स्वास्थ्य रहने के लिए चिंता छोड़िये और मनोरंजन की कोई गतिविधि अपनाईये। ●●●

लिपिड प्रोफाइल टेस्ट

शरीर को अपनी विभिन्न कार्य प्रणालियों के लिए वसा (Lipids) की ज़रूरत होती है। स्नायु तंत्र (Nervous System) ख़ासकर दिमाग़ की कार्यप्रणाली के लिए वसा की अहम भूमिका रहती है। शरीर को कई हार्मोन बनाने के लिए कोलेस्ट्रॉल (Cholesterol) चाहिए। शरीर की लगभग सभी कोशिकाओं (Cell) की बाहरी दीवार में भी वसा रहती है।
वसा (Lipids) के दो प्रकार के होते हैं :–
(1) ट्राइग्लिसराइड (Triglyceride)
(2) कोलेस्ट्रॉल (Cholesterol)

ट्राइग्लिसराइड में एक ग्लिसरॉल की रीढ़ होती है जिस पर तीन फैटी एसिड लगे होते हैं। इन फैटी एसिड के प्रकार के अनुसार हम सैचुरेटेड या अनसैचुरेटेड (Saturated or Unsaturated) वसा को वर्गीकृत करते हैं।
दूसरी ओर कोलेस्ट्रॉल एक षट्कोणीय अणु होता है, जिसके कोणों पर लगे रासायनिक समूहों में परिवर्तन द्वारा कई नए रसायन और हार्मोनों का निर्माण शरीर करता है।
तो इस प्रकार हम देखते हैं कि लिपिड दो प्रकार के होते हैं और ये दोनों ही शरीर की सभी कोशिकाओं की ज़रूरत हैं। इन्हें शरीर के सभी भागों में खून द्वारा पहुँचाया जाता है। पर यहाँ समस्या यह आती है कि वसा पानी में अघुलनशील है और खून का आधार पानी ही है।
खून में वसा को लाने-ले जाने के लिए एक विशेष व्यवस्था प्रकृति ने कर रखी है। इसमें लिपिड व प्रोटीन को मिलाकर छोटे-छोटे पैकेट बनाए जाते हैं जो वसा को लाने-ले जाने के लिए वाहन का काम करते हैं। इन पैकेटों को लाइपोप्रोटीन कहते हैं और ये मुख्य रूप से लिवर में बनाए जाते हैं।
हम जो भी वसा का सेवन करते हैं (तेल, घी, चर्बी व अनाज आदि में न दिखने वाली) वह आँतों में पचकर पहले लिवर में पहुँचती है। यहाँ उसकी पैकेजिंग कर उसे लाइपोप्रोटीन में रखा जाता है और खून में छोड़ दिया जाता है।

भोजन में कोलेस्ट्रॉल के मुख्य स्रोत गैर-शाकाहारी भोजन ही हैं जैसे दूध व दूध से बने पदार्थ (Dairy Products), अंडे का पीला भाग व मांस। जबकि ट्राइग्लिसराइड सभी प्रकार के वनस्पति तेलों, अनाज, घी, मक्खन एवं चर्बी युक्त मांसाहारी भोजन से प्राप्त होता है। शरीर स्वयं भी कोलेस्ट्रॉल बनाता है।
खून में वसा को ले जाने वाले लाइपो-प्रोटीन कई प्रकार के होते हैं। इनका वर्गीकरण (Classification) इनके घनत्व (Density) के अनुसार होता है। इनका घनत्व इनमें मौजूद कोलेस्ट्रॉल, ट्राइग्लिसराइड व प्रोटीन के अनुपात के अनुसार बदलता है।
मुख्य रूप से लाइपोप्रोटीन तीन प्रकार के होते हैं :–
1- LDL कोलेस्ट्रॉल (Low Density Lipoprotein – Cholesterol)
2- HDL कोलेस्ट्रॉल (High Density Lipoprotein – Cholesterol)
3- VLDL कोलेस्ट्रॉल (Very Low Density Lipoprotein – Cholesterol)
विभिन्न प्रकार के लाइपोप्रोटीन शरीर में अलग-अलग काम करते हैं। LDL कोलेस्ट्रॉल (LDL-C) का मुख्य काम कोलेस्ट्रॉल व ट्राइग्लिसराइड को ले जाकर शरीर के विभिन्न अंगों व खून की नलियों में छोड़ना है। ये उस प्रकार के ट्रक हैं जो माल (कोलेस्ट्रॉल) ले जाकर गंतव्य पर गिरा आते हैं।
यही वे वाहन हैं जो दिल व दिल की नलियों में भी कोलेस्ट्रॉल जमा कर देते हैं जो आगे जाकर नलियों को चोक कर हार्ट अटैक का खतरा पैदा कर देते हैं। इसी कारण LDL कोलेस्ट्रॉल को खतरनाक कहा जाता है। इसके खून में बढ़ने पर इसे कम करना अत्यंत आवश्यक है और इसके लिए दवाइयाँ लेनी ही चाहिए।

दूसरी ओर HDL कोलेस्ट्रॉल लाइपोप्रोटीन का काम शरीर के विभिन्न ऊतकों (Tissues) और खून की नलिकाओं में जमा कोलेस्ट्रॉल व ट्राइग्लिसराइड को निकाल कर वापस लाने का है। ये नगर निगम के उन ट्रकों जैसे हैं जो कूड़ा-कर्कट उठा कर शहर की सफाई में महत्वपूर्ण योगदान करते हैं।
तो यह साफ है कि यदि HDL कोलेस्ट्रॉल लाइपोप्रोटीन अधिक होगा तो धमनियों की सफाई अच्छे से होती रहेगी और हार्ट-अटैक व पैरालिसिस होने का खतरा कम हो जाएगा। परंतु यदि यह कम हो तो इन बीमारियों का खतरा बढ़ जाएगा।
लिपिड प्रोफाइल टेस्ट से हम खून में मौजूद वसा व लाइपोप्रोटीन की मात्रा की जाँच करते हैं। इस टेस्ट को लिपिडोग्राम भी कहते हैं। सामान्यतः इस टेस्ट में खून में मौजूद कोलेस्ट्रॉल एवं ट्राइग्लिसराइड (स्वतंत्र तथा लाइपोप्रोटीन में मौजूद) की मात्रा तथा विभिन्न लाइपोप्रोटीनों की मात्रा का पता लगाया जाता है।
लिपिड प्रोफाइल टेस्ट से किसी व्यक्ति में हृदय रोग या पैरालिसिस होने के खतरे का काफ़ी सही अनुमान लगाया जा सकता है। साथ ही खून में वसा कम करने वाली दवाइयों के सही चयन के लिए भी यह टेस्ट बहुत ज़रूरी है।
मधुमेह के मरीजों, जिन्हें हार्ट-अटैक व पैरालिसिस का खतरा पहले से ही बहुत बढ़ा हुआ रहता है, यह टेस्ट बहुत ज़रूरी है। शोध द्वारा पता चला है कि अकेले शुगर कंट्रोल से मधुमेही मरीजों में हार्ट-अटैक का खतरा बहुत ज़्यादा कम नहीं किया जा सकता।
इसके लिए कोलेस्ट्रॉल और बी.पी. कंट्रोल करना ज़्यादा ज़रूरी माना गया है।

किसे कराना चाहिए लिपिड प्रोफाइल टेस्ट?
● सभी मधुमेह के रोगियों को साल में दो बार।
● यदि आप मेटाबोलिक सिंड्रोम के दायरे में हैं।
● यदि आपको हाई बी.पी. है।
● यदि आपको इस्केमिक हृदय रोग है।
● यदि आप मोटे हैं और तीस साल की उम्र पार कर चुके हैं।
● उन सभी व्यक्तियों को जिनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि में मधुमेह, हृदय रोग, हाई बी.पी. या कोलेस्ट्रॉल की गड़बड़ी है।
● यदि आपको धूम्रपान की लत है।
● यदि आपकी जीवनशैली शारीरिक श्रम रहित और तनावपूर्ण है।
उपरोक्त सभी व्यक्तियों को साल में दो बार लिपिड प्रोफाइल टेस्ट अवश्य करना चाहिए।

लिपिड प्रोफाइल टेस्ट कराते समय क्या ध्यान रखें?
आजकल पैथोलॉजी टेस्ट करने वाली लैब की बाढ़-सी आ गई है, जिनमें से कई टेस्ट की गुणवत्ता पर ध्यान नहीं देतीं। आइए देखें क्या बातें ध्यान देने की हैं।
लिपिड प्रोफाइल टेस्ट रात के 8–10 घंटे खाली पेट रहने के बाद सुबह 7–9 बजे कराना चाहिए। भारी वसा युक्त भोजन व शराब पीने के बाद खून में वसा खासकर ट्राइग्लिसराइड की मात्रा 10 से 12 घंटे तक बढ़ी रह सकती है।
यदि आपके कोलेस्ट्रॉल और अन्य वसा के प्रकार बढ़े हुए आते हैं तो इसका एक महत्वपूर्ण कारण थायरॉयड हार्मोन की कमी (Hypothyroidism) भी हो सकता है। ऐसी अवस्था में थायरॉयड के इलाज से ही लिपिड प्रोफाइल की गड़बड़ी कुछ ही हफ्तों में ठीक हो सकती है।

यदि हम हार्ट अटैक के खतरे और इलाज की दृष्टि से देखें तो सबसे महत्वपूर्ण है खून में LDL कोलेस्ट्रॉल की मात्रा। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि अधिकतर लैब LDL कोलेस्ट्रॉल को मापती नहीं हैं, बल्कि एक फॉर्मूला का प्रयोग कर अनुमानित मात्रा निकाल देती हैं।
यह फॉर्मूला निम्नानुसार है :–
● LDL Cholesterol = Total Cholesterol – (HDL Cholesterol + VLDL Cholesterol)
● VLDL Cholesterol = Triglyceride / 5
यदि ट्राइग्लिसराइड की मात्रा 300 mg/dl से अधिक हो तो यह फॉर्मूला सही अनुमान नहीं देता। LDL कोलेस्ट्रॉल को सीधे मापना महँगा टेस्ट है।
आप लैब से यह अवश्य जाँच करें कि वे Direct LDL – Cholesterol टेस्ट कर रहे हैं या नहीं। आपके डॉक्टर आपके LDL कोलेस्ट्रॉल को केंद्र बिंदु बनाकर ही दवा का निर्धारण करते हैं।

रिपोर्ट का क्या अर्थ है?
जैसा कि हम पहले ही कह चुके हैं कि इस टेस्ट से हम हृदय रोग खासकर हार्ट अटैक और ब्रेन अटैक (पैरालिसिस) के खतरे का अनुमान लगाने व रोकथाम के लिए इलाज की नीति बनाने में मदद करते हैं।
यदि आप मधुमेह के मरीज हैं तो आपके LDL कोलेस्ट्रॉल का स्तर 100 mg/dl से कम रहना चाहिए। यदि यह इससे अधिक है तो दवाइयों द्वारा इसे 100 से नीचे लाना चाहिए।
स्टैटिन ग्रुप की दवाइयाँ इसमें बहुत कारगर हैं और इनके प्रयोग से हार्ट अटैक का खतरा लगभग 50% तक कम हो जाता है।
ताज़ा शोधों में यह कहा गया है कि यदि मधुमेही व्यक्ति को हृदय रोग हो चुका है या वह धूम्रपान करता है या उसे हाई बी.पी. भी है तो LDL कोलेस्ट्रॉल को 70 mg/dl से भी नीचे रखना चाहिए।

HDL कोलेस्ट्रॉल को दिल का दोस्त कहा जाता है। इसका बढ़ा हुआ होना आपको हार्ट अटैक से बचाता है। इसकी मात्रा पुरुषों में 40 mg/dl से अधिक होनी चाहिए तथा महिलाओं में 50 mg/dl से अधिक होनी चाहिए। नियमित व्यायाम HDL कोलेस्ट्रॉल को बढ़ाने का अच्छा उपाय है। भोजन में ओमेगा–3 फैटी एसिड की मात्रा बढ़ाने से भी HDL कोलेस्ट्रॉल बढ़ता है। इसके लिए भोजन में मछली, सूखे मेवे और सरसों के तेल का प्रयोग करना उपयुक्त होगा। धूम्रपान या तंबाकू का सेवन HDL कोलेस्ट्रॉल को कम करता है। मधुमेह में ट्राइग्लिसराइड की मात्रा खून में अधिकतर बढ़ी हुई पाई जाती है। खून में ग्लूकोज़ पर अच्छा नियंत्रण रखने से यह अपने आप कम हो सकती है। ट्राइग्लिसराइड का बढ़ा होना भी हृदय रोग का खतरा बढ़ाता है।

जब ट्राइग्लिसराइड का स्तर 500 mg/dl से ऊपर हो जाता है तो पैंक्रियाज में सूजन आ सकती है जिससे पैंक्रियाटाइटिस नामक खतरनाक बीमारी भी हो सकती है। शराब के सेवन से ट्राइग्लिसराइड की मात्रा बढ़ जाती है। ट्राइग्लिसराइड को कम करने के लिए फेनोफाइब्रेट नामक दवा का प्रयोग किया जाता है। हार्ट अटैक के खतरे (Risk Factor) का अनुमान लगाने का एक और फॉर्मूला है :–
Total Cholesterol ÷ HDL Cholesterol
यदि यह 5 से अधिक आता है तो खतरा बहुत ज़्यादा है। परंतु LDL कोलेस्ट्रॉल की मात्रा का हृदय रोग से सबसे अधिक संबंध होता है।
तो दोस्तों आज हमने आपको लिपिड प्रोफाइल जाँच की विस्तृत जानकारी देने का प्रयास किया। यदि आप मधुमेह के रोगी हैं और आपके दिल में दिल का ज़रा भी ख़याल है तो ज़रूर साल में दो बार यह जाँच कराएँ।

अब मिनटों में पता करें खाद्य पदार्थों का ग्लाइसेमिक इंडेक्स।

जब डायबिटीज के मरीज ग्लूकोज नियंत्रण के लिए अपने आहार में परिवर्तन करते हैं, तब उन्हे विभिन्न खाद्य पदार्थों के ग्लाइसेमिक इंडेक्स का ज्ञान होना बहुत आवश्यक है। किसी भी भोजन का ग्लाइसेमिक इंडेक्स निकालने के लिए अभी हमें मानव वोलेंटियर की जरूरत होती है। जिन्हे निर्धारित भोजन देने के बाद बार बार उनके खून के सेंपल लेकर खून में ग्लूकोज की मात्रा मापी जाती है। यह एक कठिन कार्य है। हाल ही में आईआईटी गोहाटी के वैज्ञानिकों ने ऐसी छोटी मशीन का आविष्कार किया है, जिसमें किसी भी भोज्य पदार्थ को डालने के पांच मिनट के अंदर उस भोज्य पदार्थ का ग्लाइसेमिक इंडेक्स बता सकती है। शोध कर्ताओं ने यह दावा किया है कि इस छोटी सी मशीन को कहीं भी ले जाया जा सकता है। इस मशीन के रिजल्ट बहुत सटीक होने का दावा किया गया है। साथ ही यह किफायती भी है।
इस मशीन से डायबिटीज के मरीजों को संतुलित आहार के चयन में बहुत मदद मिलेगी।

मधुमेह में फायदेमंद चावल की हुई खोज।

डायबिटीज के मरीजों को ये सलाह दी जाती है कि, चावल न खाएं या कम खाएं। इसका मुख्य कारण यह है कि पके हुए सफेद चावल का ग्लाइसेमिक इंडेक्स बहुत ज्यादा होता है। सामान्य रूप से खाए जाने वाले सफेद चावल की ग्लाइसेमिक इंडेक्स 70 से 80 होती है। जिसके कारण चावल खाने के बाद खून में शुगर की मात्रा तेजी से बढ़ती है।
विश्व के अनेक भागों में और हमारे देश में भी चावल मुख्य आहार है। तमिलनाडु सहित दक्षिण के कई प्रांत, एवं बंगाल, असम, कश्मीर, इसके मुख्य उदाहरण हैं।

कृषि वैज्ञानिक काफी समय से चावल की ऐसी किस्म विकसित करने की कोशिश कर रहे थे, जिसमें चावल का ग्लाइसेमिक इंडेक्स कम हो एवं प्रोटीन की मात्रा अधिक हो।

हाल ही में ( IRRI ) इंटरनेशनल राइस रिसर्च इंस्टीट्यूट जिसका मुख्यालय फिलीपींस में है और इसकी एक शाखा वाराणसी में है। IRRI ने घोषणा की है कि उन्होंने चावल की एक ऐसी किस्म विकसित की है जिसका ग्लाइसेमिक इंडेक्स 44 से 47 प्रतिशत है। इसमें फाइबर और प्रोटीन की मात्रा भी अधिक है।
यह शोध न सिर्फ मधुमेह के मरीजों बल्कि किसानों के लिए भी क्रांतिकारी होगा।

आपके सवाल विशेषज्ञ के जवाब

प्रश्न – डॉक्टर साहब मेरी उम्र 22 साल है। मुझे कुछ महीने पहले ही मधुमेह डिटेक्ट हुई है। पहले डॉक्टर साहब ने मुझे इसके लिए कुछ गोलियां लेने की सलाह दी थी। अभी पिछली बार के परामर्श में उन्होंने मुझे इंसुलिन लेने को कहा है। क्या डायबिटीज होते ही एक दो साल में ही इंसुलिन इंजेक्शन लेने की जरूरत पड़ सकती है?
मुकेश गौर, इंदौर मध्यप्रदेश।

उत्तर – मधुमेह कई प्रकार की होती हैं। टाइप 2 डायबिटीज जो अक्सर मोटापे से संबंधित होती है, इस डायबिटीज में पहले कुछ वर्षों में खानपान, व्यायाम एवं गोलियों से डायबिटीज नियंत्रित रह सकती है। दूसरी ओर टाइप 1 डायबिटीज में इंसुलिन बनाने वाली कोशिकाएं नष्ट हो जाती हैं, अतः शुरुआत से ही इंसुलिन का उपयोग करना पड़ता है। एक अन्य प्रकार की डायबिटीज होती है, जो इन दोनों प्रकार की डायबिटीज का मिला जुला रूप है जिसे लाडा कहते हैं। जिसमें इंसुलिन बनाने वाली कोशिकाए धीरे धीरे नष्ट होती हैं। एवं मधुमेह की शुरुआत होने के 6 महीने के अंदर ही इंसुलिन लेना आवश्यक हो जाता है। ऐसे मरीज दुबले होते हैं। इस तरह की डायबिटीज में कुछ समय तक ही गोलियां असरकारक रहती हैं। ऐसा लगता है आप इसी श्रेणी में आते हैं। इसलिए आपके डायबिटीज नियंत्रण के लिए इंसुलिन लेना जरूरी है।

प्रश्न – डॉक्टर साहब मेरी उम्र 19 वर्ष है। मुझे बचपन से मोटापे की समस्या है। अभी एक साल पहले मुझे डायबिटीज भी हो गई है। मेरे पापा को भी डायबिटीज है। मैंने कुछ पत्रिकाओं में पढ़ा है कि वजन कम करने से मधुमेह ठीक हो सकती है। क्या यह सच है? यदि हाँ तो कृपया बताएं मैं अपना वजन कैसे कम करूं?
जीवन मंडल, झांसी उत्तर प्रदेश।

उत्तर – पिछले कुछ वर्षों से यह देखा जा रह है कि टाइप 2 डायबिटीज कम उम्र के लोगों में भी होने लगी है। इसका सीधा संबंध मोटापे एवं निष्क्रिय जीवन शैली से है। यदि आप मोटे हो रहे हैं एवं आपको अपने पिताजी से टाइप 2 डायबिटीज के जींस भी मिले हैं तो आपको टाइप 2 डायबिटीज होने का यही कारण है। शरीर का वजन जैसे जैसे बढ़ता है, शरीर की इंसुलिन की जरूरत बढ़ती जाती है। जब इंसुलिन बनाने वाली ग्रंथि इस बढ़ी हुई इंसुलिन की डिमांड को पूरा नहीं कर पाती तो खून में शुगर बढ़ने लगती है। यदि आप अपना वजन 15 प्रतिशत कम कर लें तो हो सकता है कि आपकी डायबिटीज बिना दवाइयों के नॉर्मल रहने लगे। वजन कम करने के लिए आपको आहार विशेषज्ञ की सलाह से अपने आहार में बदलाव के साथ व्यायाम करना होगा। साथ ही आजकल वजन कम करने वाली नई दवाइययाँ भी उपलब्ध हैं, अपने डॉक्टर की सलाह से उन्हें आप ले सकते हैं। वजन कम करने का एक अच्छा उपाय बेरियाट्रिक सर्जरी भी है।

प्रश्न – डॉक्टर साहब मेरी उम्र 33 साल है, मुझे पिछले 5 सालों से मधुमेह है। पिछली कुछ जाँचों में मेरा HbA1c बढ़ा हुआ आ रहा है। जबकि मेरी फास्टिंग ग्लूकोज की जाँच हमेशा नॉर्मल आ रही है। कृपया बताएं इसका क्या कारण हो सकता है? मुझे क्या करना चाहिए?
नरेंद्र विश्वकर्मा, जबलपुर, मध्यप्रदेश

उत्तर – HbA1c पिछले तीन महीने के ग्लूकोज का एवरेज होता है। यदि आपकी सुबह की फास्टिंग ग्लूकोज नॉर्मल आती है परन्तु खाने के बाद की शुगर दिनभर बढ़ी रहती है तो यह बिल्कुल संभव है कि आपकी फास्टिंग ग्लूकोज नॉर्मल हो परन्तु HbA1c बढ़ा हुआ हो।
आपके HbA1c बढ़े होने का वास्तविक कारण पता करने के लिए आपको CGMS जाँच करानी चाहिए। CGMS, को कंटीन्यूअस ग्लूकोज मॉनिटरिंग सिस्टम कहते हैं। यह यंत्र हर पाँच से दस मिनट में ग्लूकोज की मात्रा को मापता है व अपनी मेमोरी में रिकॉर्ड कर लेता है। इस रिकॉर्ड में हम हर दिन का ग्राफ अलग अलग भी देख सकते हैं, एवम् पाँच, दस या पंद्रह दिन का मिला जुला पैटर्न भी देख सकते हैं।
इससे आपके क्या व कितना खाने से, व्यायाम, एवं अन्य शारीरिक गतिविधियों से, शुगर कितना और कब बढ़ता है, इसका पता चलता है। इससे आपके बढ़े हुए HbA1c का स्पष्ट कारण पता चलने के साथ उचित दवाई एवं उसकी सटीक मात्रा निर्धारित करने में भी मदद मिलेगी।

प्रश्न – डॉक्टर साहब मेरी उम्र 53 वर्ष है, मुझे पिछले 8 सालों से मधुमेह है। मेरे मधुमेह चिकित्सक मेरी ब्लड ग्लूकोज नियंत्रित न रहने पर अक्सर टेबलेट बढ़ा देते हैं। अतः लगभग हर साल मेरी दवाइयों में 1 टेबलेट बढ़ जाती है। इस तरह मुझे अभी दिन में लगभग 8 से 10 गोलियाँ लेनी पड़ रही हैं। फिर भी मेरा मधुमेह नियंत्रण संतोषजनक नहीं है। क्या इतनी सारी दवाइयाँ लेने से मेरी किडनी और लिवर पर खराब असर नहीं पड़ेगा? मुझे क्या करना चाहिए?
दिनेश भार्गव, ग्वालियर, मध्यप्रदेश।

उत्तर – दिनेश जी आपकी डायबिटीज 8 साल पुरानी है, डायबिटीज में देखा जाता है कि समय के साथ शरीर में इंसुलिन बनाने वाली कोशिकाएं धीरे धीरे नष्ट होती रहती हैं। क्योंकि खून में ग्लूकोज की मात्रा अधिक होने से उन्हें बहुत ज्यादा काम करना पड़ता है। ऐसी स्थिति में अधिकांश गोलियाँ शुगर नियंत्रण में कारगर नहीं रह जातीं। आपको अब बाहर से से इंसुलिन लेने की आवश्यकता है। ऐसा लगता है कि आपके डॉक्टर या आप इंसुलिन लेने से हिचकिचा रहे हैं। इसीलिए आपकी गोलियां बढ़ती जा रही हैं।
जहां तक गोलियों से किडनी खराब होने का प्रश्न है, यह एक बहुत बड़ी भ्रांति है। किडनी खराब होने का सबसे बड़ा कारण सालों साल खून में ग्लूकोज बढ़ा रहना है। जो आपकी किडनी को धीरे धीर चौक करती जाती हैं। गोलियाँ अगर शुगर नियंत्रण कर रही हैं तो वो निश्चित रूप से आपकी किडनी को खराब होने से बचाएंगी।

जानिए अपनी जाँचों को…कंटीन्यूअस ग्लूकोज मॉनिटरिंग सिस्टम (C.G.M.S.)

डायबिटीज के विभिन्न विकारों से बचने के लिए खून में ग्लूकोज की मात्रा को नियंत्रण में रखना बहुत जरूरी है। इसीलिए डॉक्टर अपने मरीजों को बार बार शुगर नियंत्रण के लिए सलाह एवं प्रोत्साहन देते रहते हैं। अतः ग्लूकोज के बेहतर नियंत्रण के लिए निम्नांकित तथ्यों को जानना बहुत जरूरी है…

  1. आपके खून में ग्लूकोज का स्तर भिन्न भिन्न समय पर कैसा चल रहा है?
  2. आपके खान पान, और दैनिक गतिविधियों का आपके खून में ग्लूकोज के स्तर पर क्या प्रभाव पड़ रहा है?
  3. दवाइयों का असर कैसा हो रहा है?
  4. कौन कौन से जाँचें कराई जाएं?

डॉक्टर लगभग 30 वर्ष पहले मरीज के यूरिन में ग्लूकोज की मात्रा की जाँच किया करते थे। इससे डॉक्टर यह अनुमान लगाते थे कि पिछले कुछ घंटों में मरीज के खून में ग्लूकोज का क्या स्तर रहा होगा। परन्तु जल्द ही यह समझ में आ गया कि इस तरीके से हम सिर्फ अनुमान ही लगा सकते हैं, एवं समय समय पर खून में ग्लूकोज के उतार चढ़ाव को पेशाब में जाँच करके नहीं परखा जा सकता। साथ ही यूरिन में ग्लूकोज की जाँच से हाइपोग्लाइसीमिया (खून में ग्लूकोज का बहुत कम हो जाना) को भी नहीं जाना जा सकता। डायबिटीज की वजह से गुर्दे खराब होने लगते हैं, तब खून में शुगर की मात्रा बहुत अधिक होने पर भी पेशाब में शुगर नहीं आती। साथ ही मधुमेह के उपचार के लिए आईं कुछ दवाइयाँ जिन्हें SGLT 2 इन्हिबिटर कहते हैं, पेशाब में ग्लूकोज का निकास बढ़ा देती है। ऐसी स्थिति में इन दवाओं को लेने वाले मरीजों की पेशाब में ग्लूकोज अत्यधिक बढ़ी हुई होती है। चाहे खून में ग्लूकोज की मात्रा कम ही क्यों न हो। यही कारण है कि अब डॉक्टर मरीजों को पेशाब में ग्लूकोज/शुगर की जाँच करने की सलाह नहीं देते।

खून में ग्लूकोज की मात्रा एवं नियंत्रण की स्थिति जानने का एक और बहुत अच्छा टेस्ट HbA1C है। यह टेस्ट खून में पिछले 3 माह के ग्लूकोज के स्तर का औसत बताता है। अनेक शोधों में पाया गया है कि इसका सीधा संबंध मधुमेह से होने वाले विकारों से है। अर्थात HbA1C जितना ज्यादा होगा विकार होने का खतरा उतना ही ज्यादा होगा। अधिकांश डॉक्टर मरीजों को तीन से छह महीने में यह टेस्ट करने की सलाह देते हैं, और इसके अनुसार उपचार में फेर बदल करते हैं। प्रायः देखा गया है कि मरीज खून में ग्लूकोज का टेस्ट कराने के एक दो दिन पहले परहेज, नियमित दवाई आदि लेकर अच्छी रिपोर्ट आने से खुश हो जाते है, परन्तु जब HbA1C करवाया जाता है तब उनकी पोल खुल जाती है। क्योंकि बढ़ा हुआ HbA1C यह बता देता है कि पिछले तीन माह में ग्लूकोज नियंत्रण कितना खराब चल रहा था। HbA1C टेस्ट की भी कुछ सीमाएं हैं,
जैसे.. यदि खून में ग्लूकोज की मात्रा कभी बहुत कम रही हो या कभी बहुत अधिक तो भी तीन माह का औसत सामान्य के लगभग आ सकता है। परन्तु ऐसा उतर चढ़ाव वाला ग्लूकोज स्तर मरीज के लिए घातक हो सकता है। दूसरा इस टेस्ट के द्वारा दिनभर के अंदर होने वाले ग्लूकोज स्तर में उतार चढ़ाव का पता ही नहीं लगाया जा सकता। न ही इस टेस्ट द्वारा हाइपोग्लाइसीमिया को जाना जा सकता है। यह टेस्ट थोड़ा महँगा भी है। इस टेस्ट को मरीज दिन में कभी भी करवा सकते हैं। इसे करवाते समय खाली पेट या भरे पेट होने से कोई फर्क नहीं पड़ता।

ग्लूकोमीटर (SMBG): आजकल ग्लूकोमीटर काफी सस्ते एवं सटीक परिणाम देने वाले वाले उपकरण हैं, जिनसे मरीज स्वयं अपने खून में ग्लूकोज की मात्रा दिन में किसी भी समय घर बैठे देख सकता है। सही तकनीक से इसका उपयोग कर हम दिन के अलग अलग समय खून में ग्लूकोज की मात्रा की सही जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। परन्तु प्रायः देखा गया है कि मरीज सुबह खाली पेट की शुगर की जाँच कर संतुष्ट हो जाते हैं। इससे रात्रि में होने वाले ब्लड ग्लूकोज के स्तर में होने वाले उतर चढ़ाव को भी नहीं पकड़ा जा सकता, जबकि अक्सर हाइपोग्लाइसीमिया रात को 2 बजे से सुबह 6 बजे के बीच होने का खतरा सबसे ज्यादा होता है। कई ग्लूकोमीटरों की जाँच स्ट्रिप 10 रुपए से 30 रुपए तक आती है, इसलिए भी मरीज बार बार टेस्ट करने से बचते हैं। ग्लूकोमीटर द्वारा टेस्ट करने में स्वयं की उंगली में सुई चुभती होती है, जिससे होने वाल दर्द इस टेस्ट को न करने का कारण बन जाता है।

विज्ञान की प्रगति के साथ अब यह संभव है कि डायबिटीज के मरीज लगातार 15 दिन का खून में ग्लूकोज के स्तर का ग्राफ प्राप्त कर सकते हैं। इस प्रकार के उपकरण को सी .जी. एम. एस. (CGMS, कंटीन्यूअस ग्लूकोज मॉनिटरिंग सिस्टम) कहते हैं।
यह यंत्र हर पाँच से दस मिनट में ग्लूकोज की मात्रा को मापता है व अपनी मेमोरी में रिकॉर्ड कर लेता है। मरीज एक एप द्वारा अपने मोबाइल फोन पर ग्लूकोज की मात्रा को कभी भी देख सकता है। यही नहीं वह अपने पिछले दिनों के प्रतिदिन का ग्लूकोज का ग्राफ भी इसी ऐप में देख सकता है। यही जानकारी मरीज के डॉक्टर के पास इंटरनेट द्वारा भी पहुँचती रहती है।
इस रिकॉर्ड में हम हर दिन का ग्राफ अलग अलग भी देख सकते हैं, एवम् पाँच, दस या पंद्रह दिन का मिला जुला पैटर्न भी देख सकते हैं। इस उपकरण के खास फायदे निम्नानुसार हैं…

  1. मरीज द्वारा क्या व कितना खाने से शुगर कितना बढ़ता है? मरीज उसकी जानकारी स्वयं प्राप्त कर सकता है।
  2. मरीज द्वारा किए जाने वाले व्यायाम, एवं अन्य शारीरिक गतिविधियों द्वारा होने वाले ग्लूकोज स्तर के प्रभाव को भी सटीकता से जाना जा सकता है।
  3. इससे रात में सोते समय आपके खून में ग्लूकोज के स्तर में होने वाले उतार चढ़ाव, एवं हाइपोग्लाइसीमिया जैसी स्थितियों को भी सटीकता से जाना जा सकता है।
  4. ग्राफ की सहायता से डॉक्टर इंसुलिन की मात्रा, प्रकार एवं समय को ज्यादा सटीक तरह से निर्धारित कर सकते हैं।
  5. इससे मरीज की दवाइयाँ, खान पान, एवं व्यायाम आदि को सटीक रूप निर्धारित करने में बहुत सहायता मिलती है।

इस उपकरण में दस रुपए के सिक्के के बराबर एक सेंसर जिसके मध्य में एक बारीक सुई होती है, इस सुई को त्वचा में अंदर लगाकर सेंसर को चिपका दिया जाता है। इसको लगाकर मरीज सारे दैनिक कार्य बिना किसी परेशानी के कर सकता है, यहाँ तक कि मरीज नहा सकता है एवं तैराकी भी कर सकता सकता है। डॉक्टर एवं मरीज एक एप द्वारा अपने मोबाइल फोन या कंप्यूटर पर सेंसर द्वारा भेजा गया डाटा समय समय पर देख सकते हैं। साथ ही यह डाटा सेंसर एवं मोबाइल फोन की मेमोरी में भी स्टोर होता है।

इस उपकरण को 15 दिन तक लगाने की कीमत लगभग 3000 से 5000 रुपए तक आती है। 15 दिन में यह उपकरण 1344 बार ग्लूकोज टेस्ट करता है एवं इसके परिणाम अपने मेमोरी में स्टोर करता है। इस उपकरण का प्रचलन विदेशों में बहुत तेजी से बढ़ रहा है और सौभाग्य से यह हमारे देश में भी उपलब्ध है। इस उपकरण का अपग्रेडेड वर्जन ग्लूकोज की मात्रा कम होने (हाइपोग्लाइसीमिया) का अलार्म भी देता है।

सी .जी. एम. एस. (CGMS) उपकरण आपके मधुमेह के बेहतर नियंत्रण में बहुत सहायक है। अपने चिकित्सक से सलाह लेकर हर मधुमेही को इस उपकरण का उपयोग अवश्य करना चाहिए। खासकर वे मरीज जो इंसुलिन ले रहे हैं, या जिनके खून में ग्लूकोज के स्तर में बहुत अधिक उतार चढ़ाव आने की समस्या है। उनके लिए यह उपकरण विशेष रूप से बहुत उपयोगी है। गर्भवती महिलाएं जिन्हें डायबिटीज है उनके ग्लूकोज का नियंत्रण बहुत अच्छा होना चाहिए, ऐसी महिलाओं में भी यह उपकरण बहुत उपयोगी है।

जानिए अपनी दवाइयों को : मोटापे की नई दवाई, (Tirzepatide) टिर्जेपेटाइड।

 

जैसा कि हम जानते हैं हमारे देश में मोटापा बहुत तेजी से बढ़ रहा है। इसका सीधा संबंध तेजी से बदलती जीवन शैली है। आजकल के मशीनी युग में शारीरिक श्रम बहुत कम हो गया है। साथ ही गरिष्ठ, हाई कैलोरी एवं उच्च वसा युक्त आहार बहुतायत से लिया जा रहा है। इस तरह कम श्रम और गरिष्ठ भोजन महिलाओं, पुरुषों और बच्चों में मोटापा बढ़ाने का प्रमुख कारण है।
यही मोटापा जीवन शैली संबंधित कई बीमारियों का जनक है। मोटे लोगों में डायबिटीज, ब्लड प्रेशर, हार्ट अटैक, जोड़ों के दर्द, कैंसर आदि का खतरा सामान्य वजन वाले व्यक्ति से कई गुना अधिक होता हैं।

डाइटिंग व एक्सरसाइज़ से कई लोग 5 से 8 किलो तक वजन कम कर पाते हैं। परन्तु इस वजन को कम बनाए रखना लगभग असंभव होता है, और कुछ की महीनों में घटाया गया वजन फिर से बढ़ने लगता है।

वजन कम करने के लिए जीवन शैली में सुधार के अलावा बेरियाट्रिक सर्जरी भी एक अच्छा उपाय है। परन्तु अधिकांश लोग सर्जरी से बचना चाहते हैं। ऐसे ही लोगों के वजन को कम करने के लिए बाजार में विभिन्न प्रकार की दवाइयां उपलब्ध हैं।

भारतीय बाजार में मोटापे और वजन कम करने के लिए बहुत पहले से दवाइयां उपलब्ध हैं। वजन कम करने में इन दवाइयों का मिला जुला असर देखा जाता है। साथ ही इनमें से कुछ दवाइयों के गंभीर साइड इफेक्ट भी पाए गए हैं।

वर्तमान में कई शोधों के पश्चात वजन कम करने के लिए कुछ नई दवाइयां स्वीकृत की गई हैं, और भारतीय बाजारों में उपलब्ध भी हैं। यह दवाइयां न केवल वजन कम करने में कारगर हैं बल्कि टाइप 2 मधुमेह के मरीजों में ग्लूकोज की मात्रा भी नियंत्रित करती हैं। ये दवाइयां इन्क्रेटिन वर्ग में आती हैं।

क्या हैं इन्क्रेटिन?
वैज्ञानिकों ने सालों पहले यह देखा कि मुंह से ग्लूकोज देने पर शरीर में पैदा होने वाले इंसुलिन की मात्रा नस में इंजेक्शन द्वारा ग्लूकोज देने से कहीं ज्यादा होती है। इससे यह सिद्ध हुआ कि इंसुलिन बनाने वाले बीटा सेल्स को ग्लूकोज के अलावा आंतों से आने वाले कुछ अन्य पदार्थ इंसुलिन बनाने के लिए उत्तेजित करते हैं। आगे चल कर शोधों में पाया गया कि आतें ग्लूकोज या भोजन के संपर्क में आने पर दो हार्मोन बनती हैं, जिनका नाम GLP 1 एवं GIP है। इन्हीं हार्मोन्स को इन्क्रेटिन कहते हैं। ये हार्मोन इंसुलिन बनने की प्रक्रिया को नियंत्रित करते हैं, साथ ही मस्तिष्क में भूख को नियंत्रित करने की प्रक्रिया में प्रमुख भूमिका निभाते हैं। यदि हम इस प्रकार के हार्मोन्स इंजेक्शन द्वारा शरीर में दें तो भूख कम लगती है, और गरिष्ठ भोजन की तलब कम हो जाती है। इन सभी क्रियाओं से इन्क्रेटिन हार्मोन न केवल खून में ग्लूकोज की मात्रा घटाते हैं बल्कि मोटापा भी कम करते हैं। कम मात्रा में दिए जाने पर ये हार्मोन शुगर नियंत्रण के लिए काम में लाए जाते हैं। वहीं अधिक मात्रा में देने पर ये मोटे लोगों का वजन कम करते हैं।

क्या है टिर्जेपेटाइड (Mounjaro) मुंजारो ?
मुंज़ारो एक इन्क्रेटिन मॉलिक्यूल है जो GLP 1 और GIP दोनों की तरह काम करता है। बाजार में उपलब्ध वजन कम करने वाली दवाइयों में यह सबसे ज्यादा प्रभावी है। इसे सबक्यूटेनियस (चमड़े के नीचे इंसुलिन की तरह) इंजेक्शन द्वारा लेना होता है। इसके इंजेक्शन को हफ्ते में एक बार लेना होता है। इस इंजेक्शन से मतली, उल्टी, दस्त या कब्ज आदि पेट संबंधी समस्याएं हो सकती हैं। इसलिए इसको शुरुआत में बहुत कम डोज से शुरू किया जाता है। एवं डोज को चार हफ्तों के अंतराल से धीरे धीरे बढ़ाया जाता है। इसके पूरे डोज पर पहुंचने में 3 से 4 महीने लग जाते हैं।
यदि यह इंजेक्शन लगातार लिया जाता रहे तो लगभग डेढ़ साल में 20 से 25 प्रतिशत तक वजन कम हो जाता है।

टिर्जेपेटाइड के क्या फायदे हैं?
जैसा कि ऊपर बताया गया है, यह दवाई मोटे लोगों में वजन कम करने के साथ साथ मधुमेह नियंत्रण में भी काफी असरकारक है। इन दोनों विकारों के नियंत्रण से होने वाले सारे फायदे टिर्जेपेटाइड इंजेक्शन लेने से मरीज को प्राप्त होते हैं। जैसे...
1. मधुमेह नियंत्रित रहने से बार बार लगने वाली भूख, प्यास एवं पेशाब की समस्या दूर होती है।
2. बार बार होने वाले इन्फेक्शन की समस्या दूर होती है।
3. घाव जल्दी ठीक होने में मदद मिलती है।
4. मधुमेह द्वारा होने वाली विकृतियों जैसे, रेटीनोपैथी, नेफ्रोपैथी, न्यूरोपैथी आदि का खतरा टल जाता है।
5. वजन कम होने से ब्लड प्रेशर नियंत्रण में मदद मिलती है।
6. हार्ट अटैक का खतरा कम होता है।
7. वजन कम होने से घुटनों के दर्द और गठिया में आराम मिलता है।
8. खून में खराब कोलेस्ट्रॉल कम होता है।
9. मोटापे और मधुमेह से होने वाली समस्याओं का खतरा कम होता है।
10. नए शोधों में पाया गया है कि हृदय एवं किडनी संबंधित मधुमेह विकार कम होते हैं।
11. मोटापे की वजह से कई लोगों में सोते समय खर्राटे आते हैं व उनकी नींद रात में बार बार उचट जाती है। इस दवाई से इस समस्या से भी छुटकारा पाया जा सकता है।

इस दवाई की कीमत अभी बाजार में बहुत ज्यादा है। इसे लेने का एक माह का खर्च लगभग 10 से 18 हजार तक पड़ता है। आने वाले समय में इससे मिलती जुलती दवाइयां भी बाजार में आने वाली हैं, जिससे इस दवाई का मूल्य कम होने की उम्मीद है। यह दवाई मोटापा कम करने में कारगर है, परन्तु दवाई छोड़ने के बाद वजन फिर बढ़ने लगता है। इसीलिए डॉक्टर इस दवाई को निरंतर लेने की सलाह देते हैं।

इसके विकल्प के रूप में मोटापा कम करने के लिए एक सर्जरी भी बहुत लोकप्रिय हो रही है इस सर्जरी को बेरियाट्रिक सर्जरी कहते हैं। यह सर्जरी दूरबीन (लेप्रोस्कॉपी) द्वारा की जाती है। इसमें स्टमक (भोजन की थैली/आमाशय) के आकर को छोटा कर दिया जाता है, एवं आंतों में बायपास बना दिया जाता है। इस सर्जरी द्वारा 30 प्रतिशत तक वजन कम हो जाता है, एवं फिर से वजन बढ़ने की संभावना कम रहती है। इस प्रकार हम देखते हैं कि, इस सर्जरी को कराने पर होने वाला खर्च लगभग 2 से 3 लाख होता है। जो कि मुंजारो इंजेक्शन से एक साल के उपचार पर होने खर्च के बराबर है।

नॉन एल्कोहॉलिक फैटी लिवर डिसीज

पाठको, आपको ज्ञात ही होगा कि हमारे शरीर के पाचन तंत्र का एक मुख्य अवयव लिवर होता है। लिवर एक अंग और ग्रंथि दोनों है। यह सैकड़ों महत्वपूर्ण शारीरिक कार्य करता है जो मानव जीवन के लिए महत्वपूर्ण हैं। यह पेट के दाहिने-ऊपरी हिस्से में डायाफ्राम के नीचे स्थित होता है, और मानव शरीर की सबसे बड़ी ग्रंथि है, जो पित्त (Bile) का निर्माण करती है। पित्त (Bile) हीपेटिक डक्ट द्वारा गॉल ब्लैडर में पहुंच कर संचित होता रहता है। यहां से Bile डक्ट द्वारा आँतों में पहुँचकर भोजन के पाचन में सहायक होता है।
आँतों में भोजन के पाचन से प्राप्त भोज्य पदार्थों के सूक्ष्म रूप को पोर्टल वैन द्वारा अवशोषित कर लिवर में ही पहुँचाया जाता है। लिवर में ही सभी भोज्य पदार्थों के रस का मेटाबॉलिज्म संपन्न होता है, जिससे शरीर के लिए जरूरी प्रोटीन, फैट, और कार्बोहाइड्रेट का संश्लेषण, संचय, और उत्सर्जन होता है। इस कार्य के लिए लिवर में अनेकों एंजाइम्स का उपयोग होता है, ये एंजाइम्स भी लिवर स्वयं निर्मित करता है।
अतः हम जो भोजन ग्रहण करते हैं वह हमारे रक्त में एवम् अन्य अंगों तक लिवर से होकर ही गुजरता है, एवम् प्रसंस्कृत होता है। इस तरह शरीर का पोषण पूरी तरह लिवर पर ही निर्भर है, अतः यह हमारे जीवनीय अंगो (Vital Organ) में से एक महत्वपूर्ण अंग है।

हमारे शरीर के विभिन्न अंगों में जिस तरह विकृति, एवम् बीमारियां होती हैं, उसी तरह लिवर में भी विभिन्न तरह के विकार या बीमारियां हो सकती हैं। उन्ही में से एक है फैटी लिवर डिसीज।
आइए जानते हैं क्या है फैटी लिवर डिसीज?
इस बीमारी के नाम से ही स्पष्ट हो जाता है कि यह क्या समस्या है, फैटी लिवर की स्थिति में लिवर में अत्यधिक मात्रा में वसा का जमाव हो जाता है। जिससे लिवर का आकार बड़ा हो जाता है, सूजन आ जाती है। इससे लिवर के ऊतकों को क्षति पहुंचती है, और लिवर के सामान्य कार्य में अवरोध उत्पन्न होने लगता है। फैटी लिवर के कारणों के आधार पर इसे दो प्रकारों से जाना जाता है…..

  1. एल्कोहॉलिक फैटी लिवर डिसीज…
    लिवर की इस समस्या का कारण अत्यधिक शराब सेवन है। ऐसे में रोगी शराब का सेवन जारी रखता है तो उसके लिवर को अत्यधिक क्षति हो सकती है, लिवर खराब भी हो सकता है
  2. नॉन एल्कोहॉलिक फैटी लिवर डिसीज…
    पिछले कुछ वर्षों में यह पाया गया है, कि बड़ी संख्या में ऐसे रोगी हैं जो बहुत कम शराब पीते हैं या शराब नहीं पीते हैं, लेकिन फिर भी उनके लिवर में अतिरिक्त वसा का जमाव हो रहा है। अतः शराब के सेवन न करने पर भी अन्य कारणों से फैटी लिवर हो रहा है, इस विकार को नॉन-एल्कोहॉलिक फैटी लिवर डिजीज (NAFLD) के रूप में जाना जाता है। इस प्रकार के फैटी लिवर से लिवर में सूजन (सूजन), लिवर स्कारिंग (सिरोसिस), लिवर कैंसर, लिवर की विफलता और मृत्यु भी हो सकती है। आजकल नॉन-एल्कोहॉलिक फैटी लिवर डिजीज के मामले बहुत तेजी से बढ़ रहे हैं। विभिन्न अध्यनों का निष्कर्ष है कि लगभग 5 से 20 प्रतिशत तक भारतीय नॉन-एल्कोहलिक फैटी लिवर डिजीज से पीड़ित हैं।

क्यों होती है नॉन-एल्कोहॉलिक फैटी लिवर डिजीज?
नॉन-एल्कोहॉलिक फैटी लिवर डिजीज हर उम्र के पुरुषों एवं महिलाओं को हो सकती है। बच्चों से लेकर बुजुर्गो सभी को यह समस्या हो सकती है।
नॉन-एल्कोहॉलिक फैटी लिवर डिजीज के प्रमुख कारण हैं….
वजन का बढ़ना
अत्यधिक वसा युक्त भोजन
अधिक कार्बोहाइड्रेट युक्त भोजन
सुस्त जीवन शैली
मधुमेह आदि।
इन सभी में मोटापा एवं मधुमेह नॉन-एल्कोहॉलिक फैटी लिवर डिजीज के बड़े कारण माने जाते हैं। मोटापा और मधुमेह जिस तेजी से बढ़ रहे हैं उससे लगता है कि, आने वाले वर्षों में फैटी लिवर डिज़ीज मौत का एक प्रमुख कारण बन सकता है।

फैटी लिवर आमतौर पर निम्नलिखित चरणों के माध्यम से आगे बढ़ता है:

साधारण फैटी लिवर
सूजन के साथ फैटी लिवर (NASH या नॉन-अल्कोहिलक स्टेटोहेपेटाइटिस के रूप में जाना जाता है
फैटी लिवर जिसमे लिवर की स्कार्रिंग हो या लिवर सख्त हो जाये (जिसे लिवर सिरोसिस भी कहा जाता है।

ऐसी फैटी लिवर डिज़ीज जो कि मोटापे से सम्बन्धित होती है, इसका प्रमुख कारण इन्सुलिन रेजिस्टेंस को माना जाता है। इंसुलिन रेजिस्टेंस का संबंध अनेक दूसरी जीवन शैली संबंधित बीमारियों जैसे डायबिटीज टाइप 2, बीपी, हृदय रोग पैरालिसिस एवं पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम से भी है। जब कोई व्यक्ति जरूरत से ज्यादा खाना खाता है एवं शारीरिक व्यायाम नहीं करता तो ग्रहण की गई अतिरिक्त कैलोरीज़ चर्बी के रूप में लिवर में इकट्ठी होने लगती हैं। यह अतिरिक्त चर्बी (फैट) लिवर की कार्यक्षमता को प्रभावित करने लगती है एवं इंसुलिन रेजिस्टेंस को और बढ़ाने लगती है। इंसुलिन रेजिस्टेंस बढ़ने से फैटी लिवर से ग्रसित मरीज को डायबिटीज, बीपी एवं हार्ट अटैक का खतरा बढ़ जाता है।
वहीं लिवर में मौजूद अतिरिक्त चर्बी लिवर में सूजन पैदा करने लगती है जिसे ठीक करने के लिए लिवर में फाइब्रोसिस होने लगती है। जो धीरे धीरे लिवर सिरोसिस जैसी जानलेवा बीमारी का रूप ले लेती है। यही नहीं अतिरिक्त चर्बी लिवर में कैंसर का कारण भी बन सकती है।
डायबिटीज के 60 से 70 प्रतिशत लोगों में फैटी लिवर डिज़ीज पाई जाती है।
मोटे लोगों में भी लगभग 60 से 70 प्रतिशत लोगों में फैटी लिवर डिज़ीज पाई जाती है।
दुर्भाग्य से मोटे बच्चों में भी फैटी लिवर देखा जा रहा है, जो इन बच्चों को आगे चलकर डायबिटीज एवं हार्ट अटैक का कारण बनता है।

फैटी लिवर डिज़ीज के लक्षण
आम तौर पर इसके कोई लक्षण नहीं दिखते, जब तक कि लिवर बहुत ज्यादा खराब न हो जाए या सिरोसिस न हो जाए।
फैटी लिवर डिज़ीज होने का खतरा मोटापे एवं डायबिटीज के मरीजों को अधिक होता है। अतः ऐसे मरीजों को विशेषज्ञ की निगरानी में नियमित जाँच कराते रहना चाहिए, ताकि गंभीर समस्या होने से पहले ही लिवर डिज़ीज का पता चल सके।

फैटी लिवर डिज़ीज का निदान (जाँचें):
फैटी लिवर डिजीज (Fatty Liver Disease) की जाँचों के लिए, आपके चिकित्सक खून की जाँच, इमेजिंग टेस्ट (जैसे अल्ट्रासाउंड, सीटी स्कैन, एमआरआई) और कभी-कभी लिवर बायोप्सी (Liver Biopsy) कराने की सलाह दे सकते हैं। आजकल फाइब्रो स्कैन नामक एडवांस जाँच भी उपलब्ध हैं।
जाँच प्रक्रिया:

  1. खून की जाँच:
    लिवर फंक्शन टेस्ट (Liver Function Tests) नामक खून की जाँच और अन्य जाँचों के माध्यम से लिवर की स्थिति और कार्य क्षमता का पता किया जाता है।
  2. Fib4 स्कोर टेस्ट:
    यह एक फॉर्मूला होता है जिसमें खून में की जाने वाली जाँचें SGOT, SGPT और प्लेटलेट काउंट का उपयोग होता है। यह स्कोर लिवर खराब होने व लिवर में फाइब्रोसिस होने की स्थिति को दर्शाता है।
  3. फाइब्रो स्कैन:
    फाइब्रो स्कैन लिवर की जाँच का सबसे सटीक टेस्ट मन जाता है। जिसमें लिवर में बढ़ी हुई चर्बी की मात्रा और फाइब्रोसिस की स्थिति का सटीकता से पता चलता है।
  4. इमेजिंग टेस्ट:
    अल्ट्रासाउंड: यह जाँच लिवर में वसा की मात्रा और लिवर के आकार का पता लगाने के लिये कि जाती है। इसे अल्ट्रा सोनोग्राफी भी कहा जाता है।
    सीटी स्कैन: अल्ट्रासाउंड द्वारा लिवर की स्थिति स्पष्ट न होने पर लिवर की विस्तृत और अधिक स्पष्ट तस्वीरें प्राप्त करने के लिए इस जाँच की जरूरत पड़ती है।
    एमआरआई: यह और अधिक उन्नत जाँच है, जिससे लिवर में वसा और फाइब्रोसिस (निशान) का पता लगाया जाता है।
  5. लिवर बायोप्सी: यदि आवश्यक हो, तो लिवर का एक छोटा सा नमूना निकालकर माइक्रोस्कोप से जाँच की जाती है।

फैटी लिवर डिज़ीज का उपचार:
इसका उपचार रिस्क फैक्टर्स को कम करना और जीवन शैली में सुधार करने से आरंभ होता है जैसे…
वजन का नियंत्रण, वसा रहित भोजन करना, भोजन में कम कार्बोहाइड्रेट लेना, सक्रिय जीवन शैली अपनाना, व्यायाम करना, एवं मधुमेह नियंत्रण रखना आदि शामिल हैं।
पांच से 10 प्रतिशत वजन कम करने से लिवर में फैट की मात्रा घटने लगती है। 10 प्रतिशत से अधिक वजन कम करने से फाइब्रोसिस की स्थिति भी सुधरने लगती है।
मधुमेह में उपयोग की जाने वाली नई दवाइयाँ जैसे GLP 1 एगोनिस्ट एवं SGLT2 इन्हिबिटर आदि मरीज का वजन कम करने में सहायक होती हैं और फैटी लिवर को कम करती हैं।
मधुमेह का प्रभावी नियंत्रण भी फैटी लिवर डिज़ीज को कम करने में सहायक होता है।

जैसा कि हम सभी जानते हैं, बीमारी से बचाब बीमारी के उपचार से बेहतर होता है। अतः फैटी लिवर डिज़ीज से बचे रहते के लिए हमें वजन और मधुमेह को नियंत्रण में रखना चाहिए। कम वसा और कम कार्बोहाइड्रेट वाला संतुलित आहार लेना चाहिए। साथ ही नियमित व्यायाम करना चाहिए।

डॉ. सुशील जिंदल

हमारा स्वास्थ्य और अंधविश्वास “एक समीक्षा”

चिकित्सा विज्ञान निरंतर विकसित हो रहा है, और रोगों की बेहतर समझ और प्रबंधन के लिए आगे बढ़ रहा है। हालांकि, इतने विकास के बावजूद भी कई लोग अंधविश्वास, गैर-वैज्ञानिक सोच और दैवीय शक्तियों में विश्वास रखते हैं। हम अभी भी सांस्कृतिक रूप से निर्धारित बंधनों और आस्थाओं से बंधे हुए हैं। आधुनिक युग में अंधविश्वास भी आधुनिक हो रहा है, जैसे अंधविश्वास युक्त सामग्री सोशल मीडिया प्लेटफार्मों पर भी भरपूर देखने को मिलती है और बखूबी प्रचारित की जाती है। इन प्रचारों से प्रेरित होकर लोग कई तरह के अवैज्ञानिक नुस्खे अपनाते हैं, जिससे कई बीमारियों के उपचार और नियंत्रण पर खराब असर होता है।

अंधविश्वास ही गैर-वैज्ञानिक व्यवहार का कारण है। चिकित्सा विज्ञान को लेकर अंधविश्वास से जुड़ी कई धारणाएं एवं घटनाएं हास्यास्पद तो हैं ही, स्वास्थ्य के लिए अत्यंत घातक भी हैं। क्योंकि यह लोगों को प्रामाणिक या विज्ञान सम्मत चिकित्सा के लाभ से वंचित रखती हैं। जिससे बीमारियां गंभीर और जानलेवा हो जाती हैं।

यह सच है कि कई आधुनिक वैज्ञानिक अवधारणाएं प्राचीन परंपराओं पर आधारित हैं, और उनके प्राचीन तरीकों में समानताएं हैं। “युक्ति व्यापाश्रय बनाम दैव व्यापाश्रय” की अवधारणाओं और उपायों द्वारा चरक ने प्राचीन चिकित्सा को एक व्यवस्थित और तर्क संगत रूप में स्थापित करने का प्रयास किया था। परन्तु दुर्भाग्यवस इसे वैज्ञानिक रूप से और अधिक विकसित नहीं किया जा सका।

आधुनिक चिकित्सा के दौरान अंधविश्वास और पारंपरिक उपचार पद्धतियों, नुस्खे आदि का हस्तक्षेप अक्सर देखा जाता है। इसलिए यह जानना बहुत जरूरी है कि विभिन्न संस्कृतियों की ये प्रथाएं और अंधविश्वास स्वास्थ्य समस्याओं को कैसे बढ़ावा देती हैं। किस तरह इलाज में देरी और लापरवाही की ओर धकेलती हैं।

दैवीय शक्तियों पर आस्था एवं अंधविश्वास
अंधविश्वास उन घटनाओं एवं तथ्यों पर विश्वास करना, एवं उन तर्कहीन सामाजिक प्रथाओं एवं धारणाओं में बंधे रहना है, जो वैज्ञानिक रूप से सिद्ध नहीं किए जा सकते। विज्ञान से परे घटनाओं को अक्सर दैवीय शक्तियों या चमत्कारों का नाम देकर लोगों के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है। यही अंधविश्वास युक्त आस्था और धारणा लोगों के सोचने और व्यवहार करने के तरीके को नियंत्रित और प्रभावित करते हैं।

सन 2000 में वैज्ञानिकों ने मस्तिष्क में एक ऐसे केंद्र की खोज की जो भगवान, दैवीय शक्तियों एवं अंधविश्वास में आस्था रखने को प्रेरित करता है। मनुष्य जब भी ऐसी परिस्थिति में आ जाता है जहां वह अपने आप को असहाय एवं लाचार पाता है तो, तर्क संगत एवं वैज्ञानिक व्यवहार की जगह अंधविश्वासों की तरफ आकर्षित होता है।

विभिन्न आस्थाओं या धारणाओं में विरोधाभास है, तथा ये एक दूसरे का खंडन करते हैं। इसलिए इनकी सत्यता संदेहास्पद है।
उदाहरण के लिए, भगवान में विश्वास! कुछ लोगों का मानना है कि एक ही ईश्वर है; अन्य जैसे कि मैनिचियन मानते हैं कि दो ईश्वर हैं; अन्य का मानना है कि देवताओं के समूह हैं, या कई देवता होते हैं।
यह जानते हुए भी लोग अशिक्षा, भय, गलत धारणाओं, चिंता, प्राचीन परंपराओं एवं प्रथाओं के कारण इन बातों पर भरोसा कर लेते हैं।

चिकित्सा प्रणाली पर अंधविश्वास के प्रभाव पर शोध
चिकित्सा विज्ञान की प्रगति के साथ अंधविश्वास का स्तर कम तो हो रहा है, फिर भी इसका आधुनिक वैज्ञानिक चिकित्सा प्रक्रिया को प्रभावित करना जारी है।

जापान में हुए एक अध्ययन के अनुसार, अंधविश्वासी धारणाओं ने अस्पताल से छुट्टी के निर्णय को प्रभावित किया, जिससे उपचार के खर्च में वृद्धि हुई। मरीजों ने डॉक्टर से परामर्श करने और अस्पतालों से छुट्टी लेने के लिए किसी खास या शुभ दिन को चुना, और निर्धारित दिनों से अधिक समय तक अस्पताल में रहने को प्राथमिकता दी।

चंडीगढ़ के एक अध्ययन के अनुसार, लगभग दो-तिहाई लोगों ने अपने मानसिक बीमारी के लक्षणों को जादू-टोना,
ग्रह नक्षत्र, पिछले जीवन में बुरे कर्म, आत्मा के प्रवेश (ओपारी कसर), बुरी आत्माओं, भूत-प्रेत और देवी देवता का प्रकोप आदि के कारण माना। और यह भी माना कि उपचार के लिए केवल प्रार्थना करना या जादुई-धार्मिक अनुष्ठान करना ही पर्याप्त है, अतः कई मरीज उचित उपचार से वंचित रहे।

इसी तरह के निष्कर्ष छत्तीसगढ़ के एक अध्ययन में भी पाए गए, जिसमें सिज़ोफ्रेनिया के रोगियों के उपचार में देरी के लिए कई अन्य कारकों के साथ अंधविश्वास को एक कारक के रूप में पहचाना गया।

गाम्बिया के एक अध्ययन के अनुसार, कई लोगों का अभी भी मानना है कि मलेरिया अलौकिक या दैवीय प्रकोप (जादू-टोना या जिन्न) या दूषित हवा के कारण होता है।

इसी तरह कई अज्ञात कारणों से होने वाले एंडोक्राइन विकारों के इलाज के लिए वैज्ञानिक दिशानिर्देश उपलब्ध हैं, लेकिन अंधविश्वास के कारण उपचार में लापरवाही एवं विलंब देखा जाता है।

अंधविश्वास कई चिकित्सा विशेषज्ञों द्वारा सामना की जाने वाली एक आम समस्या है। अतः इस लेख में हम स्वास्थ्य पर इनके प्रभावों पर चर्चा करेंगे।

अंधविश्वास का स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव
रोजमर्रा के संघर्षों के साथ दीर्घकालिक विकारों की भावनात्मक चुनौतियां पीड़ित लोगों को अंधविश्वासों की ओर खींच सकती हैं। साथ ही अंधविश्वासों के कारण कई बीमारियों के उचित इलाज में लापरवाही एवं विरोध भी देखा जाता है।
एंडोक्राइन विकार दीर्घकालिक होते हैं, अतः इनके इलाज में अंधविश्वास का हस्तक्षेप अक्सर देखा जाता है।
उदाहरणतः डायबिटीज जैसी दीर्घकालिक बीमारियों में उचित इलाज छोड़कर लोग गुड़मार एवं कड़वी चीजें, करेले का जूस, जामुन की गुठली आदि का स्तेमाल करने लगते हैं, कई लोग झाड़ फूंक, या टोने टोटके आदि के चक्करों में भी पड़ जाते हैं। इससे उचित इलाज में देरी होती है, और ये लोग डायबिटीज जनित कॉम्प्लिकेशन के शिकार हो जाते हैं। प्रायः देखा गया है कि डायबिटीज के मरीज इंसुलिन की आवश्यकता होने पर भी इसे स्वीकार नहीं करते। उनके मन में यह भ्रांति होती है कि इंसुलिन अंतिम उपचार है अथवा एक बार इंसुलिन लेने पर उसकी आदत लग जाएगी।

थायरॉइड विकार और गॉइटर आम एंडोक्राइन विकार हैं। परन्तु इसे ठीक करने के लिए पारंपरिक उपचार जैसे थायरॉइड की बीमारी में सुबह खाली पेट धनिए का पानी पीने से लाभ होने का भ्रम फैलाया जाता है।

इसके अलावा, जानकारी का अभाव और सामाजिक शर्मिंदगी कुछ ऐसी बाधाएं हैं, जिनके कारण लोग अपनी बीमारी या समस्या के लक्षणों को छुपाते हैं, और आवश्यक उपचार कराने से भागते हैं। इसलिए इन एंडोक्राइन विकारों जैसे डीएसडी, बांझपन और जेनेटिक सिंड्रोम को लेकर यह नासमझी उपचार में देरी या लापरवाही का प्रमुख कारण है। इससे जटिलताओं और मृत्यु दर में वृद्धि हो सकती है।

कई लोगों में यह भ्रम है कि डायबिटीज की दवाइयों के सेवन से गुर्दे खराब हो सकते हैं।

थायरॉइड की बीमारी में ली जाने वाली दवाइयों के बारे में कई लोगों को भ्रम होता है कि, इन दवाइयों को लंबे समय तक लेने से शरीर पर खराब असर पड़ता है।

संतान न होने के कारण उपचार के लिए आई दंपति में पुरुष में शुक्राणु की कमी या अभाव बांझपन का एक प्रमुख कारण होता है। परन्तु समाज की प्रथानुसार हमेशा महिला को ही रोगी मान लिया जाता है।

आज विज्ञान ने हमें कई जानलेव बीमारियों से बचाव के लिए टीके /वैक्सीन उपलब्ध करा दिए हैं। परन्तु दुर्भाग्य बस देश के कई हिस्सों में खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में लोग बच्चों को वैक्सीन नहीं लगवाते। उनका मनना है कि इनमें से कई बीमारियां दैवीय प्रकोप या भगवान की इच्छा है। यही कारण है जिससे चेचक (स्मॉल पॉक्स) को दशकों तक दैवीय प्रकोप माना जाता रहा। एवं ग्रामीणों द्वारा चेचक के टीके का विरोध किया गया।

आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में मानसिक रोगों एवं मिर्गी जैसे रोगों का बहुत अच्छा इलाज उपलब्ध है। फिर भी प्रायः देखा गया है कि लोग इस प्रकार के रोगों को दैवीय प्रकोप मानकर झाड़ फूंक, जादू टोना, एवं पीर फकीर से इलाज करवाने को प्राथमिकता देते हैं। वे इलाज के रूप में ताबीज देना, भभूती (अनुष्ठान/हवन आदि की राख) देना आदि गैर वैज्ञानिक तरीके अपनाते हैं। कई स्थानों पर तो मिर्गी के झटके आने पर लोग मरीज को इलाज के तौर पर गंदे जूते या मोजे सुंघाने जैसे घृणित तरीके बताते हैं। साथ ही मिर्ची जलाकर रोगी को धूनी देना, एवं गर्म धातु की रॉड से शरीर को दागने जैसे खतरनाक कृत्य भी किए जाते हैं।

खून की कमी/एनीमिया के मरीजों में अक्सर यह भ्रांति पाई जाती है कि, लाल रंग के फल एवम सब्जियों जैसे चुकंदर के जूस और अनार का जूस आदि के सेवन से खून की कमी दूर हो सकती है।

स्वास्थ्य पर अंधविश्वास के मिले जुले प्रभाव
कुछ मनोविकार एवं अज्ञात कारणों से होने वाली बीमारियों को अक्सर भाग्य जनित व्याधि या दैवीय प्रकोप मान लिया जाता हैं। इन प्रकोपों को शांत करने के लिए जादू टोना, झाड़ फूंक या अन्य अनुष्ठान आदि में कई लोग विश्वास रखते हैं। इससे बीमारी के नियंत्रण का भ्रम पैदा हो सकता है या किया जाता है।
इससे निम्नांकित लाभ हो सकते हैं…
अनिश्चितताओं और खतरों की स्थिति में सुरक्षा और सांत्वना, आत्मिक संतुष्टि और भावनात्मक शांति आदि मिलना।
उन चीजों के लिए काल्पनिक स्पष्टीकरण मिलना, जो हमें समझ में नहीं आतीं।
कुछ मनोवैज्ञानिक लाभ, जिससे बीमारी के नकारात्मक प्रभाव में कमी देखी जाती है।

साथ ही दैवीय दंड या पाप पुण्य की धारणा “जिसका तात्पर्य है, कि देवी देवताओं द्वारा लोगों को अपराधों या नियमों का उल्लंघन करने के लिए दंडित किया जाएगा। यह विश्वास विभिन्न धर्मों और संस्कृतियों में व्यापक रूप से देखा जाता है, जो अक्सर सामाजिक व्यवहार को आकार देने और सहयोग को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
ठीक इसी तरह यह धारणा बीमार व्यक्ति को वैज्ञानिक दिशानिर्देशों का पालन करने के लिए प्रेरित और अनुशासित कर सकती है।
मनोबल बढ़ाकर आंतरिक होमियोस्टेसिस में मदद कर सकती है। अज्ञात कारणों से होने वाले एंडोक्राइन विकारों के नियंत्रण में सहयोगी हो सकती है।
हालांकि यह सब केवल प्लेसीबो इफेक्ट की तरह होता है, एवं
कभी कभी इन धारणाओं से अवसाद और तनाव भी पैदा हो सकता है। इसलिए इन सभी के चक्कर में न पड़कर, प्रामाणिक चिकित्सा को प्राथमिकता देना चाहिए।

मधुमेह का उपचार वैश्विक स्तर पर सामाजिक और आर्थिक बोझ से जुड़ा हुआ है। विभिन्न अध्ययनों के अनुसार विश्वास-आधारित दृष्टिकोण जैसे कि धार्मिक प्रथाएं एवं आध्यात्मिक क्रियाकलाप और स्वास्थ्य परिणामों के बीच एक सकारात्मक संबंध है। परन्तु इस विषय पर और सटीक शोधों की आवश्यकता है।
यह विशेष रूप से मधुमेह जैसी स्वास्थ्य समस्याओं में मरीज को संयमित आहार विहार के लिए प्रेरित कर मधुमेह नियंत्रण में सहयोगी हो सकता है।

निष्कर्ष
स्वास्थ्य से संबंधित गलत जानकारी जानलेवा भी हो सकती हैं। इसलिए, चिकित्सकों और मरीजों का इन अंधविश्वासों को समझना महत्वपूर्ण है, ताकि गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवा सुनिश्चित की जा सके।
आधुनिक चिकित्सा व्यवस्था में उपचार के लिए निरंतर शोध व वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर दवाईयां एवं उपचार पद्धतियां विकसित की जाती हैं। इसीलिए यह उपचार पद्धतियां सबसे ज्यादा विश्वशनीय, प्रभावकारी एवम् सुरक्षित मानी जाती हैं। हम पाठकों से यही चाहेंगे कि आधुनिक चिकित्सा पद्धति पर भरोसा करें व अंधविश्वासों के चक्कर में अपनी बीमारी को बिगड़ने न दें।

यह तो घर का बना है

हमारी जिंदगी का वह सब से कड़वा दिन था जब डॉक्टर ने हम से कहा कि आप की शुगर बहुत हाई हो गई है अब मीठा खाना बंद करना पड़ेगा। हमारे तो होश उड़ गए। बताइए, एक हिन्दुस्तानी व्यक्ति को आपने फरमान सुना दिया कि मीठा खाना बंद कर दे? मीठे के बिना जीना भी कोई जीना है? पर क्या करते ? घर वालों ने भी सारी मीठी वस्तुएँ हम से छुपा कर रखनी और खानी शुरू कर दी। हमारी जीभ ही नहीं आँखें भी मीठी वस्तुएँ देखने को तरस गईं। हमारी हालत उस प्रेमी की भाँति हो गई जिसे उसकी प्रेमिका से मिलने की मनाही हो गई हो। लैला-मजनू, शीरी-फरहाद, आदि प्रेमी जनों के दर्द को अब हम अपने दिल में महसूस कर रहे थे।

खैर! डॉक्टरों की चेतावनी और घर वालों का कड़ा रूख धीरे-धीरे असर करने लगा। हम जलेबी, रसगुल्ले, मालपूए का स्वाद ठीक उसी तरह भूलने लग गए जैसे हारा हुआ प्रेमी अपनी प्रेमिका के चेहरे को भुलाने की व्यर्थ कोशिश में लगा रहता है। हमारे घर वाले भी उसी तरह खुश हो रहे थे जैसे हारे हुए प्रेमी के घर वाले मन ही मन यह सोच कर प्रफुल्लित होते हैं कि चलो अब लड़का लाइन पर आ गया है, मगर दिल ही दिल में यह सोचकर डरते रहते हैं कि यह नादान कहीं सीता मैया की तरह हमारी खींची लक्ष्मण रेखा पार न कर जाए। इसीलिये घर में ही नहीं ब्याह – शादी, पार्टी वगैरह में हम पर गिद्ध नज़र रखी जाती, इन लोगों की इन्ही बेजा हरकतों की वजह से हमारे चेहरे पर लाचारी का भाव परमानेंट होता जा रहा था।

इस लाचारगी के भाव का हमें एक बहुत बड़ा सामाजिक लाभ प्राप्त होने लगा, ठीक वैसे ही जैसे आप को बचत पूँजी पर ब्याज मिलता है। हमारी लाचारगी को देखकर लोग हम से खूब सिम्पेथी यानि दयाभाव रखने लगे। जहाँ जाते लोग मीठे का सब्सीट्यूड ढूंढ़ने में लग जाते, उन भोले प्राणियों को यह समझ में नहीं आता था कि मीठे का स्थान कौन ले सकता है? यह तो हमारे भोजन में भगवान का स्थान रखता है। एकदम उच्च। सर्वोच्च।

लेकिन हमारे शुभेच्छुओं में कुछ ऐसे भी हैं जो हमारे सामने कचौड़ी- समोसा, रसगुल्ला, जलेबी परोस कर बड़े प्रेम से आग्रह करते, ‘अरे खा लो इससे कोई नुकसान नही होगा, यह तो सब घर में बना है, बाहर से कुछ भी नही मँगवाया है, हमें मालुम है तुम्हे शुगर की बीमारी है, तुम्हे तला हुआ और मीठा खाने की मनाही है–‘

जब हम उनकी बात काट कर कहते, ‘अजी घर का हो या बाहर का, है तो तला हुआ और मीठा’। पूछने को बहुत मन होता – ‘क्यों जी, क्या आपका तेल तेल नहीं पानी है, क्या आप के यहाँ की शक्कर मीठी नहीं – नमकीन होती है?’ मगर चुप्पी लगा जाते।

हमें चुप देख वह पुनः आग्रह करते, ‘बताया न! इससे नुकसान नहीं होगा, यह घर का बना है, हमने इतनी मेहनत से बनाया है, अब खा भी लो- कुछ नही होगा तुम्हे….’

‘कुछ नहीं होगा,’ शब्द हमारे दिल पर तीर की तरह चुभ गये! वातावरण को हल्का करने के लिए हमने हंस कर कहा- ‘यह क्या गारण्टी है कि हमे कुछ नहीं होगा? हम हाई शुगर से मर गये तो?’

सुनते ही मेजबान नाराज हो गये। बोले, ‘वाह, आज तक कोई मीठा खाने से मरा है क्या? हम ने तो तुम्हारे लिये इसलिए यह सब बनाया क्यों कि हमें डायबेटिक लोगों पर बड़ी दया आती है। देखो न, बाकी सब बीमारियों में मीठा खाने पर रोक नहीं होती, एक यह ही ऐसी बीमारी है जो बंदे को तरसा-तरसा कर मारती है। कितना दिल दुखता है यह देखकर कि जब सब लोग मीठा और तला हुआ लपालप भकोस रहे होते हैं शुगर वाला बंदा बेचारा भूखे भिखारी की तरह उन्हें देख रहा होता है। मीठे के लिए कोई इतना तरस कर दुनिया से जाए हम से तो नहीं देखा जाता। इसीलिए तो हम तुम्हे खिला रहे हैं ताकि तुम्हारी आत्मा तृप्त हो कर दुनिया से जाए—,

मैं भोचक्का हो उनकी तरफ देख रहा था। अचानक मुझे लगा कि मैं विश्वामित्र हूँ और वह मेनका, जो मेरी मीठा खाने की तपस्या को भंग करने के लिए भाँति-भाँति के प्रलोभन दे रही है, या कि यह आजमा रही है कि मैं उनके मोहक जाल में फंसता हूँ या नहीं। स्थिति गंभीर थी। मीठा देखकर जीभ लपलपा रही थी, सैलाइवा मुख में समा नहीं रहा था। मेरी अतृप्त आत्मा हाथ पसारे खड़ी थी। मगर मेरे घर वालों की आँखे मुझे घूर रही थीं। डॉक्टर की चेतावनियाँ सिर पर तलवार बन लटक रही थीं। मेजबान की मनुहार बड़ती जा रही थी। उनके मंत्रजाप की आवाजें लगातार कानों में बज रहीं थीं-

घर का बना है, खालो कुछ नहीं होगा,
घर का बना है, खालो कुछ नहीं होगा —

मैं तो कानों पर हाथ रखकर, सिर पर लटकी तलवारों से बचता-बचाता उनके घर से भागा ।

आप को भी सलाह दे रहा हूँ, जहाँ आप को यह कह-कह कर खिलाया जा रहा हो- ‘घर का बना है खा लो, कुछ नहीं होगा–‘, वहाँ से सिर पर पैर रख कर भागने में ही भलाई है।